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ओलंपिक के लिए जाते समय महज 3 लोगों ने दी थी भारतीय हॉकी टीम को विदाई, वापसी पर हजारों लोगों ने किया स्वागत

1928 ओलंपिक में किसी को भी भारतीय हॉकी टीम की जीत की उम्‍मीद नहीं थी (फाइल फोटो)

1928 ओलंपिक में किसी को भी भारतीय हॉकी टीम की जीत की उम्‍मीद नहीं थी (फाइल फोटो)

1928 ओलंपिक में जयपाल सिंह मुंडा की कप्तानी में भारतीय हॉकी टीम उतरी थी. टीम जब लंदन के रास्ते एम्सटरडम रवाना हो रही थी तो किसी को उसके पदक जीतने की उम्मीद नहीं थी और तीन लोग उसे विदाई देने आये थे, लेकिन स्वर्ण पदक के साथ लौटने पर बॉम्‍बे पोर्ट पर हजारों की संख्या में लोग उसका स्वागत करने के लिये जमा थे.

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    नई दिल्ली. यूं तो हॉकी 1908 और 1920 ओलंपिक में भी खेली गई थी लेकिन 1928 में एम्सटरडम में हुए खेलों में इसे ओलंपिक खेल का दर्जा मिला और इन्ही खेलों से दुनिया ने भारतीय हॉकी का लोहा माना और ध्यानचंद के रूप में भारतीय हॉकी के सबसे बड़े सितारे ने पहली बार अपनी चमक बिखेरी. ओलंपिक में सबसे ज्यादा आठ स्वर्ण पदक जीतने वाली भारतीय हॉकी टीम के सफर की शुरुआत एम्सटरडम से ही हुई.

    इससे पहले भारत में हॉकी के इतिहास के नाम पर कलकत्ता में बेटन कप और बॉम्‍बे ( मुंबई ) में आगा खान कप खेला जाता था. भारतीय हॉकी महासंघ का 1925 में गठन हुआ और 1928 ओलंपिक में जयपाल सिंह मुंडा की कप्तानी में भारतीय टीम उतरी.

    लगातार छह ओलंपिक में भारत ने जीता स्‍वर्ण

    भारतीय टीम जब लंदन के रास्ते एम्सटरडम रवाना हो रही थी तो किसी को उसके पदक जीतने की उम्मीद नहीं थी और तीन लोग उसे विदाई देने आये थे. लेकिन स्वर्ण पदक के साथ लौटने पर बॉम्‍बे पोर्ट पर हजारों की संख्या में लोग उसका स्वागत करने के लिये जमा थे. भारतीयों पर हॉकी का खुमार अब चढ़ना शुरू हुआ था और इसके बाद लगातार छह ओलंपिक में स्वर्ण के साथ ओलंपिक में भारत के प्रदर्शन का सबसे सुनहरा अध्याय हॉकी ने लिखा.

    सुपरस्‍टार बनकर सामने आए थे ध्‍यानचंद 

    ध्यानचंद के बेटे अशोक कुमार ने भाषा से कहा कि दरअसल ओलंपिक में हॉकी को शामिल करने की नींव 1926 में भारतीय सेना की टीम के न्यूजीलैंड दौरे से पड़ी. दर्शकों का उत्साह और भारतीयों के खेल की खबरें यूरोपीय देशों तक पहुंची और इसने अहम भूमिका निभाई. ध्यानचंद ने एम्सटरडम ओलंपिक में सबसे ज्यादा 14 गोल किये, जिनमें फाइनल में नीदरलैंड के खिलाफ दो गोल शामिल थे.

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    भारत ने टूर्नामेंट में एक भी गोल नहीं गंवाया. ध्यानचंद के कौशल ने विरोधी टीमों को भी मुरीद बना लिया था और खेल खत्म होने के बाद हर किसी की जुबां पर इस दुबले पतले भारतीय खिलाड़ी का नाम था.अशोक ने कहा कि पहला मैच देखने महज 100-150 लोग जमा थे लेकिन फाइनल में 20 हजार से ज्यादा दर्शक स्टेडियम में थे. ध्यानचंद को हॉकी के जादूगर की संज्ञा, लोगों का उनकी हॉकी स्टिक को छूना और भारतीय हॉकी के दबदबे की शुरूआत वहीं से हुई.

    ऐसा था 1928 ओलंपिक में भारत का सफर

    नौ देशों ने 1928 ओलंपिक हॉकी स्पर्धा में भाग लिया था जिन्हें दो समूहों में बांटा गया था. समूह के विजेता को फाइनल और उपविजेता को कांस्य पदक के मुकाबले में जगह मिली. भारत ने ग्रुप चरण में सारे मैच जीते. पहले मैच में भारत का सामना ऑस्ट्रिया से था, जिसमें ध्यानचंद ने चार, शौकत अली ने एक और मौरिस गेटली ने एक गोल किया.

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    भारत ने वह मैच 6- 0 से जीता. इसके बाद बेल्जियम को 9- 0 से मात दी जिसमें फिरोज खान ने पांच और ध्यानचंद ने एक गोल किया. तीसरे मैच में सामना डेनमार्क से था और ध्यानचंद के चार गोल से भारत ने 5- 0 से जीत दर्ज की. आखिरी मैच में स्विटजरलैंड को छह गोल से हराया जिसमें से आधे गोल ध्यानचंद के थे. भारतीय टीम ने फाइनल में मेजबान नीदरलैंड को 3-0 से शिकस्त दी जिनमें से दो गोल ध्यानचंद ने और एक जॉर्ज मार्टिंस ने किया.

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