फिल्‍मी पर्दा: 4 साल की उम्र में वर्ल्‍ड रिकॉर्ड, दौड़ने पर रोक, फिर कोच की हत्‍या, ऐसे खोया बुधिया सिंह

फिल्‍मी पर्दा: 4 साल की उम्र में वर्ल्‍ड रिकॉर्ड, दौड़ने पर रोक, फिर कोच की हत्‍या, ऐसे खोया बुधिया सिंह
बुधिया सिंह ने 4 साल की उम्र में सभी को हैरान कर दिया था (फाइल फोटो)

4 साल की उम्र में रिकॉर्ड बनाने वाले बुधिया सिंह को उनकी जिंदगी पर बनी फिल्‍म ने गुमनामी के अंधेरे से बाहर निकाला था, मगर इसके बाद वह फिर से खो गए

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नई दिल्‍ली. चार साल पहले बड़े पर्दे पर एक फिल्‍म आई थी बुधिया सिंह बॉर्न टू रन (Budhia Singh Born To Run). शायद आज लोग इस फिल्‍म को ठीक उसी तरह से भूल गए , जिस तरह से इस फिल्‍म के आने से पहले उस सितारे को भूल गए थे. जिसके नाम वर्ल्‍ड रिकॉर्ड है. सोमेन्‍द्र पढी की फिल्‍म उस खोए हुए सितारे को दुनिया से मिलवाने में कामयाब रही, मगर अब चार साल बाद फिर से वह युवा रनर गुमनाम हो गया. मनोज बाजपेयी (Manoj Bajpai) अभिनीत यह फिल्‍म दुनिया के सबसे युवा रनर की कहानी पर आधारित है, जिसने 2016 में नेशनल अवॉर्ड में बेस्‍ट चिल्‍ड्रंस फिल्‍म का अवॉर्ड जीता था.

कौन है बुधिया सिंह
2002 में जन्‍में बुधिया सिंह (Budhia Singh) पूर्व भारतीय लंबी दूरी के धावक हैं. जिन्‍होंने मात्र 4 साल की उम्र में दुनिया को उस समय हिला दिया था, जब वह सात घंटे दो मिनट में पुरी से भुवनेश्‍वर करीब 65 किलोमीटर तक दौड़े. लिम्‍का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स के 2006 एडिशन में उनका नाम दुनिया के सबसे युवा धावक के रूप में दर्ज हुआ. भारत का भविष्‍य माना जाने वाला यह सितारा आज कहीं गुम हो गया. 2016 में फिल्‍म रिलीज के समय एक बार फिर हर किसी को बुधिया का नाम याद आया जरू था, मगर वो सिर्फ कुछ समय की बात थी. आखिर कैसे ये सितारा गुम हुआ. जिसमें ओलिंपिक की उम्‍मीद दिख रही थी, उम्र और समय के बाद वो उम्‍मीद भी मर गई. 2006 में कोच बिरंची दास का यह शिष्‍य रातोंरात स्‍टार बन गया था. हर जगह बुधिया और उनके कोच का सम्‍मान होने लगा. मगर कुछ ही समय में उनकी इस चकाचौंध दुनिया में अंधेरा छा गया.

बड़े पर्दे पर दुनिया ने देखी एक टैलेंट की कहानी
बुधिया सिंह का कोच से मिलना और फिर हमेशा के लिए बिछड़ जाना और फिर इस भीड़ में कहीं गुम जाने की कहानी बिल्‍कुल फिल्‍मी थी. जिसे डायरेक्‍टर सोमेन्‍द्र ने बड़े पर्दे पर दुनिया को दिखाया. बुधिया जब दो साल के थे, तब दूसरों के घर का काम करने वाली उनकी मां ने मजबूर होकर बुधिया को 800 रुपये में एक फेरीवाले को बेच दिया था. उस समय जूडो कोच बिरंची भुवनेश्‍वर की सबसे बड़ी झोपड़पट्टी के अध्‍यक्ष हुआ करते थे. बुधिया को बेचने वाली खबर सुनकर उन्‍होंने अपनी जेब से 800 रुपये देकर बुधिया को छुड़ाया और तब से वें ही बुधिया के सब कुछ बन गए. जल्‍द ही बिरंची को बुधिया की प्रतिभा का पता चला और फिर इसके बाद उस धावक की खास ट्रेनिंग शुरू हुई.



हालांंकि 2006 में वर्ल्‍ड रिकॉर्ड बनाने के बाद बुधिया स्‍टार तो बन गए, मगर 2007 में बाल कल्‍याण विभाग ने बुधिया के मैराथन दौड़ने पर रोक लगा दी. कोच ने इसके खिलाफ हाईकोर्ट में अपील भी की थी, मगर कोई फायदा नहीं हुआ. दरअसल सरकार ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि बुधिया इतनी कम उम्र में मैराथन दौड़े तो वह बर्नआउट के शिकार हो जाएंगे. 2007 में ही बुधिया को कोच से अलग कर दिया गया और साई हॉस्‍टल भेज दिया गया. इसके अगले ही साल किसी पुराने झगड़े के कारण कोच बिरंची की दो लोगों ने हत्‍या कर दी. दूसरी तरफ बुधिया के लिए सरकार ने पहल की, मगर कोच से हमेशा के लिए अलग होने के साथ ही एक सूरज उगने से पहले अस्‍त हो गया.

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