डॉक्टर की सलाह पर क्रिकेट एकेडमी में हुआ था अजिंक्य रहाणे का एडमिशन!

अजिंक्य रहाणे ने रणजी ट्रॉफी के पांच सीजन में लगातार एक हजार से ज्यादा रन बनाए हैं. (AP)

अजिंक्य रहाणे ने रणजी ट्रॉफी के पांच सीजन में लगातार एक हजार से ज्यादा रन बनाए हैं. (AP)

अजिंक्य रहाणे आज भारतीय टीम की बल्लेबाजी की रीढ़ हैं. उनकी कप्तानी में ही भारत ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ पिछली टेस्ट सीरीज जीता था. हालांकि, रहाणे के लिए टीम इंडिया का सफर आसान नहीं रहा. उन्होंने पहले डोम्बिवली से आजाद मैदान तक का सफऱ तय किया और फिर मुंबई और टीम इंडिया का टिकट कटाया. अपने इस सफर से जुड़े खास किस्से उन्होंने हाल में एक इंटरव्यू में साझा किए.

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नई दिल्ली. अजिंक्य रहाणे आज टीम इंडिया की बल्लेबाजी की अहम कड़ी हैं. विदेशी दौरों पर उनका बल्ला खूब बोलता है. उनके रिकॉर्ड इस बात की गवाही देते हैं. उन्होंने अब तक टेस्ट में 12 शतक लगाए हैं और इसमें से 8 विदेशी पिचों पर आए हैं. पिछले ऑस्ट्रेलिया दौरे पर रेगुलर कप्तान विराट कोहली की गैरमौजूदगी में उन्होंने जिस तरह टीम इंडिया को टेस्ट सीरीज जिताई, उससे बतौर कप्तान उनकी साख काफी बढ़ गई है. वो इंग्लैंड दौरे के लिए चुनी गई टीम इंडिया में भी शामिल हैं.

रहाणे ने हाल ही में ईएसपीएन क्रिकइंफो के खास शो क्रिकेटबाजी पर दीप दासगुप्ता के साथ बातचीत में अपने खेल, कराते, सचिन और द्रविड़ से मिली सलाह के अलावा कई पहलुओं पर खुलकर बात की. इस बातचीत के दौरान रहाणे ने बताया कि कैसे गली क्रिकेट से क्लब क्रिकेट खेलने की शुरुआत हुई. इसके अलावा दीपदास गुप्ता ने रहाणे से उनके शुरुआती क्रिकेट से लेकर टीम इंडिया के सफर

से जुड़े सवाल पूछे.

पेश है रहाणे के इस इंटरव्यू से जुड़े कुछ खास हिस्से:
दीप दासगुप्ता: आपको 10 साल हो चुके हैं अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खेलते हुए. लेकिन आपके बारे में ज्यादा लिखा नहीं गया ऐसा क्यों ?

रहाणे: क्रिकेट के अलावा कुछ दिमाग में नहीं आता है. आज जो भी हूं, इसी खेल के बदौलत हूं. मैंने कभी ये जानने की कोशिश नहीं कि मेरे बारे में बाहर क्या लिखा-बोला जा रहा है. मेरे लिए सिर्फ ये अहम है कि मैं मेहनत करते हूं और खेल पर फोकस बनाए रखूं.

दीप दासगुप्ता: आप डोम्बिवली से आजाद मैदान तक कैसे पहुंचे?



रहाणे: मैंने डोम्बिवली से गली क्रिकेट खेलने की शुरुआत की. पड़ोस में डॉक्टर साहब रहते थे. उन्होंने पापा को कहा कि रहाणे की तकनीक अच्छी है, उसका खेल अच्छा लगता है. उन्होंने पापा से मुझे क्रिकेट एकेडमी में डालने के लिए कहा. एकेडमी में मैं सबसे छोटा लड़का था. कोच ने तब मुझे सचिन तेंदुलकर और विनोद कांबली का फोटो दिखाया था. उन्होंने मुझसे पूछा था कि क्या आप इनके साथ खेलना चाहोगे. मैंने तब हां कहा था. लेकिन सोचा नहीं था कि ऐसे दिग्गजों के साथ खेलने का मौका मिलेगा.


दीप दासगुप्ता: आप कराते में ब्लैक बेल्ट है. इससे क्रिकेट में क्या फायदा हुआ?

रहाणे: कराते से शरीर लचीला हुआ, तेजी आई. कराते जाने का मतलब था कि घर से बाहर निकलूं और दिन भर कुछ न कुछ करता रहूं. इसी खेल के कारण मैं खुद को सीमा से परे धकेल पाया और ये क्रिकेट में भी मेरे काम आ रहा है.

दीप दासगुप्ता: अंडर-19 टीम में विराट के साथ कैसा रहा था न्यूजीलैंड का दौरा?

रहाणे: मुझे आज भी याद है कि विराट, इशांत और रविंद्र हम सब उस टीम का हिस्सा थे. पीयूष चावला हमारे कप्तान थे. न्यूजीलैंड टीम में केन विलियमसन, टिम साउदी, कोरी एंडरसन जैसे खिलाड़ी थे. उस दौरे पर मेरा प्रदर्शन अच्छा रहा था. मैंने तीन शतक लगाए थे. 6 मैच में 560 रन बनाए थे.


दीप दासगुप्ता: आपने पाकिस्तान में मोहम्मद निसार ट्रॉफी के जरिए फर्स्ट क्लास डेब्यू किया था. ये कैसे खास रहा ?

रहाणे: डेब्यू मैच में मुंबई के लिए शतक लगाना वाकई अच्छा अनुभव था.वो भी पाकिस्तान में. ये लम्हा कभी नहीं भूलूंगा. तब पहली बार ऐसा हुआ था कि भारत की घरेलू क्रिकेट की चैम्पियन टीम का पाकिस्तान की टीम से मुकाबला हुआ था. हम कराची में मैच खेले थे. वहां खेलना वाकई खास रहा.


दीप दासगुप्ता: लगातार पांच रणजी सीजन में आपने हजार से ज्यादा रन बनाए हैं. क्या कभी लगा कि अब टीम इंडिया में मौका मिलना चाहिए?

रहाणे: पहले सीजन में शुरुआती चार-पांच मैच अच्छे नहीं गए. बातें होने लगी कि ड्रॉप करना चाहिए. प्रवीण आमरे सर हमारे कोच थे. उन्होंने कहा कि अगर टीम में चुना है, तो खिलाड़ी को 6-7 मैच खेलने का मौका देना चाहिए. आखिरी तीन मैच में मैंने अच्छे रन बनाए थे. तब सात लीग मैच होते थे. फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा.

रहाणे ने टीम इंडिया में सेलेक्शन से जुड़ी अपनी बेताबी से जुड़ा किस्सा भी साझा किया और कैसे राहुल द्रविड़ ने उनकी हौसलाअफजाई की. उन्होंने बताया कि हम दिलीप ट्रॉफी के फाइनल में हम साउथ जोन के खिलाफ खेल रहे थे, राहुल भाई(राहुल द्रविड़) भी थे. फाइनल में मैंने 169 रन बनाए. तब द्रविड़ ने मैच के बाद फोन किया था और कहा था कि मैंने आपके बारे में सुना है. आप कई सीजन से हजार रन बना रहे हो. दिमाग में आ रहा होगा कि भारत के लिए खेलने का मौका मिलना चाहिए. सिर्फ खेल पर ध्यान दो. जल्द मौका मिल जाएगा. पीछे मत भागो. राहुल भाई की ये सलाह काम आई और दो साल बाद मुझे भारत के लिए खेलने का मौका मिला

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