Cricket Diary: सैयद मुश्ताक अली की तूफानी बैटिंग से डरते थे विदेशी गेंदबाज, विदेश में शतक जड़ने वाले पहले भारतीय

1933-34 में इंग्लैंड के खिलाफ कोलकाता में सैयद मुश्ताक अली ने अपने करियर का पहला मैच खेला.

#Cricket Diary: क्रिकेट जब शुरुआती दिनों में दुनिया भर में अपने पैर जमाने की कोशिश कर रहा था, उस समय सैयद मुश्ताक अली (Syed Mushtaq Ali) ने अपने गैर पारंपरिक शॉट्स से न केवल फैंस का मनोरंजन किया, बल्कि गेंदबाजों को चकित भी कर दिया. गेंद चाहे स्टंप पर आने वाली हो या बाहर जाने वाली मुश्ताक अली ने उस पर कोई रहम नहीं दिखाया. ऐसे में गेंदबाजों का उनसे खौफ खाना तो बनता ही था.

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    टी 20 और आईपीएल में तूफानी बल्लेबाजी देखकर खुश होने वाले भारतीय फैंस इस बात पर और ज्यादा इतरा सकते हैं कि नसों में सनसनाहट भर देने वाली ताबड़तोड़ बल्लेबाजी की नींव रखने वाले खिलाड़ियों में सबसे प्रमुख नाम एक भारतीय खिलाड़ी का ही है. ये थे भारतीय टीम के सलामी बल्लेबाज सैयद मुश्ताक अली (Syed Mushtaq Ali). इंदौर में पैदा हुए मुश्ताक अली की बल्लेबाजी का नशा कुछ इस तरह का था कि हर कोई उनका फैन था. शायद यही कारण रहा कि घरेलू क्रिकेट में टी 20 फॉर्मेट के सबसे बड़े टूर्नामेंट का नाम उनके ही नाम पर रखा गया. सैयद मुश्ताक अली टी 20 टूर्नामेंट.

    आज हम फटाफट क्रिकेट में अपने जिन क्रिकेटरों के खेल को देखकर सन्न रह जाते हैं, उनकी पहली नींव आजादी से पहले सैयद मुश्ताक अली ने रख दी थी. क्रिकेट चयनकर्ता संजय जगदाले के शब्द उनकी बल्लेबाजी को बखूबी बयां करते हैं, वह कहते हैं 'वह टेस्ट क्रिकेट को वनडे के अंदाज में खेलते थे. उन्होंने उस दौर में ही जो शॉट खेले, उन्हें आज इनोवेटिव शॉट्स कहते हैं.' मुश्ताक अली के बेटे सैयद गुलरेज अली जो खुद क्रिकेटर रह चुके हैं, बताते हैं कि वह अपनी पहली बॉल को आखिरी बॉल समझकर खेलते हैं. रिस्क लेकर खेलते थे, जब बॉलर अपना रन अप लेता तो वह आधी क्रीज पर आ जाते थे, ऐसे में कई बार बॉलर रुक जाता था, लेकिन वह कहते आई एम रेडी.

    1936 में इंग्लैंड़ दौरे पर लिखी कामयाबी की नई इबारत
    टीम इंड़िया1936 में इंग्लैंड के दौरे पर गई. इसी दौरे में सैयद मुश्ताक अली ने भारतीय क्रिकेट के इतिहास की किताब में ऐसा सुनहरा पन्ना जोड़ दिया, जो उससे पहले कोई भी क्रिकेटर नहीं कर पाया था. उन्होंने इंग्लैंड में पहला शतक जमाया. इस तरह से वह विदेश में शतक जड़ने वाले पहले खिलाड़ी बन गए. उनके आक्रामक खेल का मुजाहिरा इस शतक के दौरान भी देखने को मिला. जब वह 90 रन पर खेल रहे थे, उसी सयम उनके पास इंग्लैंड़ टीम के कप्तान आए और उनसे कहा, आप शतक के नजदीक हैं, अब धैर्य से खेलिए, लेकिन मुश्ताक कहां रुकने वाले थे, उन्होंने तीन चौके जड़कर अपना शतक पूरा किया.

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    मैं अपना हिंदुस्तान नहीं छोड़ूंगा
    देश में जब बंटवारा हुआ तो जाहिर इसका असर खेल पर भी पड़ा. देश बंटा तो टीमें भी बंट गईं. सैयद गुलरेज अली बताते हैं कि उस समय जुल्फिकार अली भुट्टो मुश्ताक अली के अच्छे दोस्त थे और उम्र में छोटे थे. जुल्फिकार ने उनसे कहा, आप पाकिस्तान आ जाइए, तो कुछ भी भारत में आपको मिला है, मैं यहां आपको दिलवाऊंगा. इस पर मुश्ताक अली ने कहा, देख जुल्फी जो मोहब्बत और इज्जत मुझे इंदौर और हिंदुस्तान से मिली है, ऐसी कहीं नहीं मिल सकती, मैं अपना हिंदुस्तान नहीं छोड़ूंगा.

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    नो मुश्ताक नो टेस्ट
    मुश्ताक अली का मानना था कि दर्शक सुबह से शाम तक स्टेडियम में रहते हैं, ऐसे में अगर उन्हें अच्छी बल्लेबाजी देखने को न मिले तो ये उनके साथ नाइंसाफी होगी. इसलिए वह अपनी बल्लेबाजी से दर्शकों का मनोरंजन करने में पीछे नहीं रहते थे. यही कारण था कि उनकी बल्लेबाजी का हर कोई दीवाना था कोलकाता में तो उनके दीवानों का ये आलम था कि एक बार जब उन्हें किसी कारण से टीम से ड्रॉप कर दिया गया और टीम उनके बगैर कोलकाता में मैच खेलने उतरी तो दर्शकों ने विद्रोह कर दिया. मैदान पर उन्होंने साफ कर दिया कि नो मुश्ताक नो टेस्ट. बाद में जब टीम में उन्हें शामिल किया गया उसके बाद ही मैच हो सका.

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    कर्नल सीके नायडू की खोज थे मुश्ताक अली
    सैयद मुश्ताक अली का जन्म 17 दिसंबर 1914 को हुआ. अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में उन्हें लाने का श्रेय कर्नल सीके नायडू को जाता है. कर्नल सीके नायडू जब मुश्ताक अली के घर के बाहर से निकलते तो उन्हें क्रिकेट खेलते देखते. एक दिन जब उनसे नहीं रहा गया तो उन्होंने मुश्ताक अली के पिता से कहा, खान साहब मैं आपके बेटे को हैदराबाद ले जाना चाहता हूं. यहीं से उनका क्रिकेट करियर शुरू हो गया. 1936 में उन्होंने एक भारतीय खिलाड़ी के रूप में पहली बार विदेशी धरती पर टेस्ट शतक लगाया था. यह कारनामा उस समय किया जब जब उन्होंने ओल्ड़ ट्रैफर्ड़ में इंग्लैंड़ के खिलाफ 112 रनों की पारी खेली थी. मुश्ताक आली दाएं हाथ से बल्लेबाजी किया करते थे जबकि गेंदबाजी बाएं हाथ से ऑर्थोडॉक्स स्पिन गेंद फेंकते थे. 18 जून 2005 को इंदौर में उनका देहांत हो गया.

     

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