IND vs ENG: तीन दशक में भी नहीं बदले अंग्रेज, अब तो उनसे बिल्कुल ना हो पाएगा!

इंग्लैंड टीम को अंतिम दोनों टेस्ट में हार मिली है. मोटेरा में वह टीम इंडिया को कभी नहीं हरा सकी है.

इंग्लैंड टीम को अंतिम दोनों टेस्ट में हार मिली है. मोटेरा में वह टीम इंडिया को कभी नहीं हरा सकी है.

India vs England: भारत और इंग्लैंड के बीच चौथा टेस्ट गुरुवार से होने जा रहा है. यह पिच भी स्पिन गेंदबाजों को मदद दे सकती है. इंग्लैंड के कप्तान जो रूट ने इस ओर इशारा भी किया है.

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नई दिल्ली. चेतेश्वर पुजारा, अक्षर पटेल, रोहित शर्मा, आर अश्विन, अंजिक्य रहाणे और आखिर में एक बार फिर से कप्तान विराट कोहली ने फिर से वही बात दोहराई, जिससे इंग्लैंड को चौथा टेस्ट शुरू होने से पहले  डर लग सकता है. बारी-बारी से दूसरे टेस्ट मैच के बाद से ही हर दिन प्रेस काॅन्फ्रेंस में अलग-अलग भारतीय खिलाड़ी आते हैं और अलग-अलग सवालों का जवाब अलग-अलग अंदाज में देते हैं. लेकिन, जो एक सवाल और एक जवाब बिलकुल नहीं बदलता है वो है पिच को लेकर टीम इंडिया का रवैया. चेन्नई से लेकर अहमदाबाद तक हर खिलाड़ी ने इसी बात को दोहराया है कि आखिर पिच को लेकर इतना बवाल क्यों हो रहा है? अगर कमी है तो खेलने वाली की तकनीक में.

‘देखिये, कहने को आप यह तर्क जरूर दे सकते हैं कि बेहतर फुटवर्क, उम्दा शॉट सेलेक्शन और निर्णायक नजरिए से शायद इंग्लैंड के लिए सीरीज में नतीजे बदल सकते थे. लेकिन, मैं ऐसे तर्कों से असहमत हूं, क्योंकि अगर चेन्नई में पहले टेस्ट में भी अगर इंग्लैंड ने टॉस नहीं जीता होता तो वो मैच वहां भी हारते.’  ऐसा कहना है कि भारत के पूर्व स्पिनर राजेश चौहान का, जिन्होंने 1993 में इंग्लैंड के खिलाफ 3-0 की जीत में अहम भूमिका निभाई थी.

54 साल के हो चुके चौहान को इस बात पर हैरानी है कि आखिर जिस देश ने पूरी दुनिया पर राज किया, वह सोच में इतना पीछे कैसे रह सकता है, क्योंकि जैसा करीब 3 दशक पहले भारत में उनकी टीम के साथ हुआ करता था, वही आज भी हो रहा है. तब भी भारत की टर्निंग पिचों को लेकर अंग्रेज मुंह बना लेते थे और आज भी कमोबेश वैसे ही हालात हैं. आज के दौर में जब इतनी अधिक टेक्नोलॉजी की मदद है, लंबा चौड़ा स्पोर्ट स्टॉफ है तब भी इंग्लैंड बुनियादी चूक कैसे कर सकता है? ‘अब आप उनकी टीम के खिलाड़ियों को देखकर बताएं कि आखिर में से इनमें से कितने टर्निगं ट्रैक पर घूमती गेंदों के खिलाफ अनुभव रखतें हैं? इनको कौन समझाता है कि भारत में टेस्ट मैच में 4 तेज गेंदबाज लेकर जाना है.’ व्यंग्यात्मक लहजे में चौहान पूछते हैं.



शायद इंग्लैंड की तैयारी वाली बात को लेकर आप चौहान के तर्क से पूरी तरह से सहमत ना हो, क्योंकि चेन्नई में दूसरा टेस्ट मैच हारने से पहले यही इंग्लैंड टीम एशिया में लगातार 6 टेस्ट जीत चुकी थी. ऐसी सफलता ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीक को भी नहीं मिली थी. ‘मुझे लगता है कि इंग्लैंड पहले से एक तय रणनीति बनाकर आया और उसपर चलने की कोशिश की. उन्हें नतीजों से कोई फर्क नहीं पड़ रहा था. उन्होंने पहले ही तय कर लिया था कि इस मैच में यह खेलेगा और दूसरे मैच में वो. इस मैच के बाद वो आराम करेगा और उस मैच के बाद वो घर जाएगा. मुझे ये समझ में नहीं आता है कि आप इटंरनेशनल क्रिकेट खेल रहे हो या मजाक कर रहे हो.’ ये कहना है भारत के एक और पूर्व स्पिनर मनिंदर सिंह का, जिन्होंने 1986 में इंग्लैंड की धरती पर 2-0 की जीत में अहम भूमिका निभाई थी.
मनिंदर आपको एक और उदाहरण देते हैं- ‘अच्छा मुझे ये बताएं कि क्या आप अपनी कार को 60 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से लगातार चलाने के बारे में सोच सकते हैं, अगर बीच रास्ते में कार ब्रेक डाउन हो जाए. ऐस नहीं हो सकता. फिर इंग्लैंड ने कैसे सोच लिया कि हारें या जीतें, हम वही करेंगे जो हमने पहले से ही तय किया है? देखिये, ये तो बेहद बुनियादी समझ है कि बदलती जरूरत और मौके की नजाकत के लिहाज से आपको रणनीति में बदलाव लाना पड़ता है, लेकिन इंग्लैंड पता नहीं क्यों इतना बेफिक्र रहा.’

तो ऐसे में क्या मान लिया जाए कि इंग्लैंड से तो अब बिल्कुल हो ना पाएगा! चौथे टेस्ट में भी मैच का नतीजा वही होगा जो पिछले 2 टेस्ट में हुआ है. ‘कुछ भी नहीं बदलेगा’ इस पर चौहान कहते हैं- ‘रातों-रात आप तकनीक में बदलाव तो नहीं कर सकते हैं ना. हां, इंग्लैंड को अपने पुराने खिलाड़ियों से सीखना चाहिए. हमारे के खिलाफ चेन्नई में 1993 में पहले ग्रीम हिक ने और बाद में क्रिस लुईस ने आक्रामक तेवर दिखा करकर हम सारे स्पिनर्स के होश उड़ा दिए थे. वैसा ही कुछ करने की जरूरत है.’

चौहान की बातों में दम दिखता है, क्योंकि 2012 के दौरे पर मुंबई टेस्ट के दौरान केविन पीटरसन ने भी कुछ ऐसा ही किया था. इस कारण इंग्लैंड ना सिर्फ मैच जीता, बल्कि 3 दशक में पहली बार सीरीज जीतने में भी कामयाब रहा था. ‘चेन्नई में पहले टेस्ट की पिच पर काउंटर-अटैक तो आप कर सकते हैं, लेकिन अहमदाबाद जैसी पिचों पर इतना आसान नहीं है यह काम दोहराना. मैं मानता हूं कि ऐसी पिचों पर टिककर खेलना संभव नहीं है, लेकिन काउंटर- अटैक भी तो हर किसी के बस की बात नहीं. उसके लिए भी तो सॉलिड तकनीक चाहिए और आत्म-विश्वास.’ मनिंदर कहते हैं.

भारत में किसी टेस्ट सीरीज में 1-0 की बढ़त लेना बड़ी बात है, लेकिन उससे ये तय नहीं होता है कि आप सीरीज भी जीत जाएं. सीरीज में पिछड़ने के बाद टीम इंडिया घायल शेर की तरह पलटवार करती है. 2017 में ऑस्ट्रेलिया को ये बात बखूबी पता चली थी जब पुणे में उन्होंने बढ़त तो बनाई लेकिन फिर बेंगलुरु और धर्मशाला में धड़ाम से गिरे. पिछले 15 सालों में भारत ने सिर्फ एक सीरीज गंवाई है और इंग्लैंड ही आखिरी टीम थी जिन्होंने भारत को भारत में अंतिम बार 2012 में हराया था.

अब इंग्लैंड सीरीज तो जीत नहीं सकता है, लेकिन टीम इंडिया भी सीरीज हारेगी नहीं. लेकिन 2-2 की बराबरी करके इंग्लैंड अपना खोया आत्मविश्वास तो पा ही सकती है, साथ भारत के वर्ल्ड टेस्ट चैंपियनशिप के फाइनल में खेलने के मंसूबों पर पानी भी फेर सकती है. ‘ऐसा कुछ भी नहीं होगा. इंग्लैंड की अगर बुनियादी सोच में ही नकारात्मकता भरी है तो वो कैसे इतने मुश्किल हालात में वापसी करेंगे. अगर ऐसा होता है तो वाकई ये चमत्कार ही होगा.’ मनिंदर सिंह ने बातचीत खत्म करने से पहले यह बोल गए. उनके तर्क से असहमत होना मुश्किल दिख रहा है.
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