HBD Duleep Singhji: इंग्लैंड का वह क्रिकेटर जिसके नाम पर भारत में आज भी खेला जाता है बड़ा टूर्नामेंट

HBD Duleep Singhji: दिलीप सिंहजी पैदा तो भारत में हुए थे, लेकिन टेस्ट क्रिकेट इंग्लैंड के लिए खेली. खराब सेहत के कारण वो 2 साल ही टेस्ट क्रिेकेट खेल पाए. (Fans Cricket twitter)

Happy Birthday Duleep Singhji: दिलीप सिंहजी आज ही के दिन 1905 में काठियावाड़ के सरोदर गांव में पैदा हुए थे. राजघराने से तालुल्क होने के कारण वो भी बचपन में ही पढ़ाई के लिए इंग्लैंड चले गए. पहले स्कूल क्रिकेट, फिर काउंटी और बाद में इंग्लैंड के लिए टेस्ट खेले. उनका टेस्ट करियर तो 2 साल लंबा ही रहा. लेकिन उनका कद कितना बड़ा था इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि आज भी भारत में उनके नाम पर दिलीप ट्रॉफी का आयोजन होता है.

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    नई दिल्ली. पैदा भारत में हुए, लेकिन अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट इंग्लैंड के लिए खेले, वो भी सिर्फ 12 टेस्ट. लेकिन क्रिकेट में इतना बड़ा कद की उनके नाम पर आज भी भारत में बड़ा घरेलू टूर्नामेंट दिलीप ट्रॉफी खेला जाता है. हम बात कर रहे हैं, दिलीप सिंहजी की. आज ही के दिन 1905 में कठियावाड़ में दिलीप सिंहजी का जन्म हुआ था. यानी ठीक 116 साल पहले. राजघराने से जुड़े दिलीप सिंहजी का पूरा परिवार ही क्रिकेट से जुड़ा रहा. उनके चाचा रणजीत सिंहजी भी ता उम्र इंग्लैंड के लिए क्रिकेट खेले. भारत में आज जो रणजी ट्रॉफी खेली जाती है, उसका नाम रणजीत सिंहजी पर ही रखा गया है.

    राजघराने की परंपरा के मुताबिक, दिलीप सिंहजी को भी बचपन में ही पढ़ने के लिए इंग्लैंड भेज दिया गया था. वहां पढ़ने के साथ-साथ उन्होंने स्कूल क्रिकेट खेली. शुरुआत में उनकी पहचान एक लेग ब्रेक गेंदबाज के रूप में थी. 1922 में वे इंग्लैंड की स्कूल क्रिकेट में 13.66 के औसत के साथ 50 विकेट लेकर शीर्ष पर थे. लेकिन स्कूल के आखिरी साल तक आते-आते उन्होंने गेंदबाज़ी छोड़कर बल्लेबाजी शुरू कर दी.

    दिलीप सिंहजी इंग्लैंड के लिए ही टेस्ट क्रिकेट खेले
    महाराजा दिलीप सिंह अपने चाचा की तरह ही हमेशा ब्रिटिश क्रिकेटर बनकर रहे. दिलीप के चाचा नवानगर के तत्कालीन महाराजा रणजीत सिंह थे, जिन्हें क्रिकेट की दुनिया ‘रणजी’ के नाम से जानती है. अपने समय में उन्हें इंग्लैंड की ज़मीन पर खेलने वाला सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाज़ गिना गया. साल 1926 में दिलीप सिंहजी ने भी इंग्लैंड की काउंटी टीम ससेक्स के लिए खेलना शुरू किया और अपने क्रिकेट करियर के आखिरी सीज़न में उसके कप्तान भी बने. 1930 में उन्होंने ससेक्स की ओर से खेलते हुए नॉर्थथप्टनशर के खिलाफ साढ़े पांच घंटे में 333 रन की पारी खेली थी. इस दौरान उन्होंने अपने ही चाचा रणजीत सिंहजी के 285 रन की पारी के रिकॉर्ड को तोड़ा और उनका 333 का स्कोर आज भी ससेक्स के लिए बनाया गया सबसे बड़ा स्कोर है.

    स्कूल क्रिकेट में ही दिलीप सिंहजी ने अपना लोहा मनवा दिया था
    दिलीप सिंहजी का टेस्ट करियर भले ही ज्यादा लंबा न रहा. लेकिन गिनती आज भी इंग्लैंड के सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाजों में होती है. दिलीप सिंहजी ने स्कूल क्रिकेट के दौरान ही अपनी बल्लेबाजी का लोहा मनवा दिया था. उस समय क्रिकेट का संचालन करने वाली संस्था एमसीसी के तत्कालीन अध्यक्ष ने उनका खेल देखकर मशहूर क्रिकेट पत्रिका विज्डन में लिखा था कि आंखों, कलाई और फुटवर्क के शानदार तालमेल के कारण वो वाकई खास खिलाड़ी हैं. उनका लेट कट खूबसूरत है और उनकी बल्लेबाजी में जो सहजता और परिपक्वता नजर आती है, वो उन्हें दूसरे स्कूली बल्लेबाजों से अलग स्तर पर ले जाती है.

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    दिलीप सिंहजी ने न्यूजीलैंड के खिलाफ पहला टेस्ट शतक लगाया
    जब किसी खिलाड़ी की शुरुआत ऐसी हो, तो उसे कौन टेस्ट क्रिकेट खेलने से रोक सकता है. दिलीप सिंहजी को 24 साल की उम्र में इंग्लैंड के लिए पहला टेस्ट खेलने का मौका है. विपक्षी टीम थी दक्षिण अफ्रीका. पहले टेस्ट में तो दिलीप सिंहजी 13 रन ही बना सके. लेकिन करियर के चौथे टेस्ट में उन्होंने न्यूजीलैंड के खिलाफ पहला शतक ठोका. इसके बाद उन्होंने ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ एशेज सीरीज की अपनी पहली पारी में ही 173 रन बनाए, लेकिन डॉन ब्रैडमैन की 254 रन की पारी के कारण इंग्लैंड वो टेस्ट हार गया. लेकिन दिलीप सिंहजी की बल्लेबाजी का हर कोई कायल हो गया.

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    उन्होंने इंग्लैंड के लिए 12 टेस्ट में 58 से ज्यादा के औसत से 995 रन बनाए. उन्होंने 3 शतक और 5 अर्धशतक लगाए. फर्स्ट क्लास क्रिकेट में उन्होंने 205 मैच में 50 के औसत से 15485 रन बनाए. शतकों का आंकड़ा 50 रहा.

    दिलीप सिंहजी भारत के हाई कमिश्नर रहे
    खराब सेहत के कारण उनका टेस्ट करियर सिर्फ दो साल चला और 1931 में उन्होंने इंग्लैंड के लिए आखिरी टेस्ट खेला. दिलीप सिंहजी ने 1949 में भारतीय विदेश सेवा में शामिल हुए. वो ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में भारत के हाई कमिश्नर रहे. 1954 में उन्हें सौराष्ट्र की पब्लिक सर्विस कमीशन का चेयरमैन बनाया गया. वो निधन से पहले कुछ महीनों तक ऑल इंडिया स्पोर्ट्स काउंसिल के चेयरमैन भी रहे.

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