Happy Birthday Sachin: सचिन तेंदुलकर की जिंदगी के वो 5 किस्‍से, जो सभी को जानने चाहिए

सचिन तेंदुलकर शनिवार को 48 साल के हो गए हैं 
(sachintendulkar/Instagram)

सचिन तेंदुलकर शनिवार को 48 साल के हो गए हैं (sachintendulkar/Instagram)

Happy Birthday Sachin tendulkar: सचिन तेंदुलकर आज यानी 24 अप्रैल को 48 साल के हो गए हैं. जानिए उनकी जिंदगी के कुछ खास किस्से

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  • Last Updated: April 24, 2021, 6:09 AM IST
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नई दिल्‍ली. क्रिकेट के भगवान कहे जाने वाले भारतीय दिग्‍गज सचिन तेंदुलकर (Sachin Tendulkar) आज यानी 24 अप्रैल को 48 साल के हो गए हैं. 2014 में अपने लंबे इंटरनेशनल करियर को अलविदा कहने वाले सचिन की मौजूदगी आज भी में एक नया उत्‍साह भर देती है. उनकी जिंदगी एक खुली किताब की तरह रही, मगर इसके बावजूद कुछ ऐसे किस्‍से हैं, जो काफी कम लोग ही जानते हैं. ये हैं सचिन की जिंदगी के ऐसे ही कुछ खास किस्से

भगवान में सचिन की गहरी आस्था

जब टीम इंडिया 02 अप्रैल 2011 को मुंबई के वानखेडे स्टेडियम में फाइनल जीतने की ओर आगे बढ़ रही थी तब सचिन आंख बंद करके भगवान की पूजा में जुटे हुए थे. यही नहीं उन्होंने भारतीय टीम की जीत की दुआ के लिए अपनी दाढी भी बढ़ा रखी थी. जब टीम जीत गई तो न केवल भगवान सिद्धिविनायक के दर्शन के लिए गये बल्कि अपनी दाढ़ी भी साफ की. वैसे सचिन को जानने वाले बताते हैं कि वह बेहद धार्मिक हैं, भगवान में गहरी आस्था रखते हैं. लिहाजा नियमित तौर पर वह पूजा अर्चना तो करते ही हैं. जब उन्होंने एशिया कप में अपना सौवां शतक लगाया था तो वहां से लौटकर गुड़ी पड़वा के दिन सुबह तड़के भगवान विनायक के दर्शनों के लिए गये. उनके साथ पूरा परिवार भी था.

गलती से छपा था नाम पहली बार 
पहली बार सचिन का नाम अखबार में स्कोरर की गलती से छपा. ये 1987 की बात है. मुंबई में लोकल मैचों के लिए अखबारों ने नियम बना रखा था कि वो उसी क्रिकेटर का नाम प्रकाशित करेंगे, जिसने कम से कम 30 रन बनाये हों. सचिन ने मुंबई के स्थानीय लोकल मैच में बिना आउट हुए 24 रन बनाये थे, तभी मैच खत्म हो गया क्योंकि उनकी टीम मैच जीत चुकी थी. टीम को अतिरिक्त रन के रूप में वाइड, लेग बाई और नो बाल के रूप में भी काफी रन मिले थे.

स्कोरर ने तय किया कि वो अतिरिक्त के छह रनों को सचिन के खाते में डाल देगा और उसने ऐसा किया भी. टीम के कुल रनों में बिना हेर फेर किये बगैर अतिरिक्त में से स्कोरर ने छह रन घटाये और सचिन के खाते में इसे दिखाकर उनका स्कोर अविजित 30 रन कर दिया. स्कोरर की अपनी सोच बहुत साफ थी. चूंकि टीम ने ये मैच जीत लिया था, लिहाजा इससे किसी को कोई आपत्ति नहीं होने वाली थी. अगले दिन जब पहली बार सचिन का नाम अखबार में छपा तो उनकी खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा.

सचिन की पहली कार



आज तो सचिन के पास एक से बढक़र एक कारें हैं. कम लोग ही जानते होंगे कि उनकी पहली सेंकड हैंड मारुति 800 थी. ये वर्ष 1990 की बात है सचिन इंग्लैंड दौरे से अपना पहला टेस्ट शतक लगाकर लौटे थे. पूरे देश में उनका नाम हो चुका था. इस दौरे से लौटते ही उन्होंने सेकंड हैंड मारुति 800 कार खरीदी. तब उनके पास ड्राइविंग लाइसेंस भी नहीं था. बांद्रा में साहित्य सहवास कालोनी में रहने वाले उनके एक दोस्त सुनील याद करते हैं कि इंग्लैंड से लौटते ही सचिन अपनी इस कार के साथ उनके पास आये और वो दोनों ड्राइविंग पर निकल गये.

बचपन के दोस्त अभी तक साथ

मुंबई के बांद्रा की जिस साहित्य सहवास कॉलोनी में सचिन तेंदुलकर का बचपन बीता, जिनके साथ वह बचपन में खेले, वह अभी उनके दोस्त बने हुए हैं. बेशक सचिन का परिवार अब उस कॉलोनी में नहीं रहता लेकिन उस मकान को उन्होंने अपने पास रखा हुआ है. इस कॉलोनी में सचिन अपने दो दोस्तों फोटोग्राफर अविनाश गोवारिकर और कांटै्रक्टर सुनील हर्षे के साथ काफी मस्ती करते थे. ये तिकड़ी कालोनी में काफी विख्यात थी. ये घरों में लगे पेड़ों से चोरीचुपके फल तोडऩे से नहीं चूकते थे. एक रविवार जब पूरी कालोनी टीवी पर गाइड फिल्म देखने में मशगूल थी. ये टोली पेड़ पर चढक़र आम तोड़ रही थी. पेड़ की डाली टूट गई. आवाज हुई. जब तक घर के लोग समझ पाते तब तक सचिन की मंडली वहां से भाग चुकी थी. सचिन की पत्नी अंजलि 'साहित्य सहवास' में होने वाले सभी कार्यक्रमों में शरीक होती है. सचिन की बेटी सारा का पहला बर्थ-डे भी इसी कालोनी में मनाया गया. जिसमें पूरी कॉलोनी के लोग शरीक हुए थे.

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चैरिटी वर्क भी कम नहीं

आमतौर पर कम ही लोगों को पता होगा कि सचिन तेंदुलकर जमकर चैरिटी वर्क भी करते हैं. वह तमाम ऐसी संस्थाओं के जुड़े हैं जो कल्याण का काम करती हैं. अपनी कमाई का एक हिस्सा वह ऐसे कामों पर खर्च करना नहीं भूलते. यही नहीं ऐसे कामों के लिए वह समय भी निकालते हैं. सचिन मुंबई के एनजीओ अपनालय के करीब 200 बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाते हैं. एक चैरिटी प्रोग्राम के दौरान उन्होंने याद किया कि किस तरह पिता कम वेतन में इस तरह के काम करते थे. वह कॉलेज में प्रोफेसर थे और घर में अखबार देने वाले की पढ़ाई का खर्च उठाते थे.
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