World Cup Final: इस दिग्गज के कारण इतिहास रचने की दहलीज पर खड़े हैं विलियमसन और मॉर्गन

वर्ल्डकप फाइनल में पहुंची दोनों टीमों के कप्तानों की सफलता के पीछे एक ही इंसान का बहुत बड़ा योगदान है. देखना रोचक होगा कि जीत किसे नसीब होती है.

News18Hindi
Updated: July 14, 2019, 9:25 AM IST
World Cup Final: इस दिग्गज के कारण इतिहास रचने की दहलीज पर खड़े हैं विलियमसन और मॉर्गन
इंग्लैंड और न्यूजीलैंड पहली बार विश्व विजेता बने के इरादे से मैदान पर उतरेगी.
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Updated: July 14, 2019, 9:25 AM IST
दो टीमें, दो कप्तान, 22 खिलाड़ी और एक खिताब. आईसीसी क्रिकेट वर्ल्डकप 2019 का फाइनल रविवार को लॉर्ड्स के मैदान पर खेला जाएगा. जब इंग्लैंड और न्यूज़ीलैंड की टीमें इतिहास रचने के लिए मैदान पर उतरेंगी, तो दो ऐसे खिलाड़ियों पर आज नजरें होंगी, जिनमें से कोई एक इतिहास के पन्नों में अपना नाम दर्ज करवा लेगा. उनपर ना सिर्फ अपनी टीम, बल्कि पूरे देश की उम्मीदों को पार लगाने का दबाव होगा. ऑयन मॉर्गन और केन विलियम्सन. दो ऐसे कप्तान जो शायद अपने बयानों और तेज तर्रार व्यवहार के कारण कभी चर्चा में नहीं आए, लेकिन हकीकत में आज इनमें से कोई एक विश्व विजेता बनने वाला है.

अगर आज कीवी और इंग्लिश टीम के पास ये मॉर्गन और विलियमसन ना हाेते तो शायद ये दोनों टीमों आज उस मुकाम पर भी नहीं दिखती. लेकिन क्या आप जानते हैं कि दोनों कप्तानों की सफलता के पीछे सिर्फ एक ही इंसान का हाथ है.



न्यूजीलैंड के पूर्व कप्तान ब्रेंडन मैक्कलम अपनी टीम के ट्रेनिंग सेशन में


पूर्व कप्तान बने दोनों के बीच लिंक

दोनों खिलाड़ियों की सफलता के पीछे जिस एक दिग्‍ग्ज का हाथ है, वो हैं न्यूजीलैंड के पूर्व कप्तान ब्रेंडन मैक्कलम. दोनों ही मैक्कलम के ज़िंदगी को लेकर नज़रिए से बहुत प्रभावित हैं. मैदान पर हमेशा कूल रहने वाले विलियमसन ने ज़िंदगी और खेल की तरफ अपने नज़रिए को मैक्कलम से प्रभावित होकर बदला. वहीं मॉर्गन और मैक्कलम पुराने दोस्त हैं और उनके काफी शौक मिलते जुलते हैं. यही वजह है कि मॉर्गन ने अपनी शादी में मैक्कलम को बेस्ट मैन बनने का न्यौता दिया था.

ऑस्ट्रेलिया के सलामी बल्लेबाज़ फिलिप ह्यूज़ के निधन के बाद मैक्कलम ने अपनी टीम को क्रिकेट को एक खेल की तरह ना देखने की बजाया इसे एक ऐसे अनुभव की तरह देखने की सलाह दी थी जो उनकी ज़िंदगी और बेहतर बना सकता है. इस बात को मॉर्गन और विलियमसन ने अपनी टीम और खेल पर लागू करते हुए वो मुकाम हासिल किया जहां वे आज हैं.

विलियमसन की सादगी है उनकी सफलता का कारण
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केन विलियमसन


विलियमसन बेहद ही सुलझे हुए कप्तान हैं. उनका क्रिकेट बेहद ही सादा और उनके फैसले बहुत सोच-विचार वाले होते हैं. मैक्कलम से उन्होंने सबसे बड़ा सबक यही लिया था कि उन्हें अपने गेम को थोड़ा कम सीरियस होकर देखना चाहिए. इससे उन्हें हार और जीत, दोनों में ही मदद मिलेगी.

उनकी बल्लेबाज़ी बिल्कु‍ल कॉपी-बुक अंदाज़ की है और शायद आप बहुत मुश्किल से उनकी बल्लेबाज़ी में कोई खामी निकाल पाएंगे. विलियम्सन ने इस वर्ल्डकप में अब तक कुल 548 रन बनाए हैं और अपनी टीम की ओर से एक तिहाई रन विलियम्सन ने बनाए हैं. अपनी टीम का बोझ विलियम्सन ने एक तरह से अकेले अपने कंधों पर उठाकर इस वर्ल्डकप में न्यूज़ीलैंड के लिए 'वन मैन आर्मी' का रोल निभाया है.

विलियमसन  ने भारत के खिलाफ जो खेल दिखाया, वो दर्शाता है कि वे कितने अच्छे बल्लेबाज़ और कप्तान हैं. अपने टॉप आर्डर को जल्दी खो चुकी न्यूज़ीलैंड की पारी में विलियमसन  आए और उन्होंने वो स्थिरता लाई जिसकी टीम को ज़रुरत थी. जब न्यूज़ीलैंड की पारी 239 रनों पर सिमट गई. विलियमसन ने आत्मविश्वास नहीं खोया और टीम को जीत का भरोसा दिलाया. गेंदबाज़ी के दौरान जब न्यूज़ीलैंड के गेंदबाज़ों ने भारतीय टॉप आर्डर की धज्जियां उड़ा दी तो विलियमसन  अति उत्साहित नज़र नही आए. वे जानते थे कि मैच आखिरी गेंद पर ही खत्म होगा और उन्होंने अंतिम समय तक लड़ाई जारी रखी और शायद इसी का नतीजा है कि न्यूज़ीलैंड लगातार दूसरा विश्व कप खेल रही हैङ

 

मॉर्गन अपने वैल्यूज़ के कारण आज शिखर पर

ऑयम मॉर्गन


2015 वर्ल्डकप में शुरुआती दौर से ही बाहर होने के बाद इंग्लिश टीम चौतरफा आलोचनाओं से घिर गई थी. उस समय टीम को एक ऐसा कप्तान चाहिए था जो उदाहरण देकर टीम का नेतृत्व करें. उस समय मॉर्गन ने ये ज़िम्मेदारी निभाते हुए टीम को एक सूत्र में जोड़ा और अपनी शैली के क्रिकेट से बाकी खिलाड़ियों को भी प्रभावित कर अच्छा खेलने की प्रेरणा दी.

उनके साथी क्रिस वोक्स भी कहते हैं कि मॉर्गन मैदान पर बर्फ की तरह ठंडे रहते हैं. वो गेम को बहुत जल्दी समझ जाते हैं और उसी हिसाब से फैसले लेते हैं.

मॉर्गन ने इस टूर्नामेंट में ना सिर्फ अपने करियर की सबसे बेहतरीन पारी खेली, बल्कि उन्होंने वर्ल्डकप इतिहास की सबसे यादगार पारियों में से एक पारी अफ़ग़ानिस्तान के खिलाफ खेली. उस पारी में उन्होंने रिकॉर्ड 17 छक्के लगाए. उन्हें बल्लेबाज़ी करते देख ऐसा लग रहा था कि वे अफ़ग़ानिस्तान के फील्डरों को कैचिंग प्रैक्टिस करवा रहे हों.

शायद मैक्कुलम की आक्रामकता उस दिन मॉर्गन के खेल में दिखी और इंग्लैंड ने पिछले 4 सालों में इसी तरह का आक्रामक खेल दिखाते हुए आज वर्ल्डकप फाइनल में जगह बनाई है. यही मैक्कलम की मॉर्गन और इस टीम पर सबसे बड़ी छाप है जिसने आज इंग्लैंड को विश्व विजय की दहलीज़ पर ला कर खड़ा कर दिया है.

रविवार को जब ये फाइनल ख़त्म हो जाएगा तो दोनों ही कप्तान के भाव अलग अलग होंगे. एक की आंखों में जीत की खुशी होगी और दूसरे की आंखों में हार के आंसू, लेकिन चाहे कोई भी जीते, एक बात तो निश्चिन्त है कि दोनों ही अपनी उस शालीनता से जिसे वे पिछले इतने साल से अपने साथ लिए चल रहे हैं,  उससे जीत के बाद परदे के पीछे जाकर अपनी टीम को जीत का लुत्फ़ उठाने देंगे या हार के बाद सबके सामने आकर अपनी टीम की हार का सारा ज़िम्मा उठाते हुए अपने पूरे देश को जवाब देने को तैयार होंगे.

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