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डे-नाइट टेस्ट : 11 मैच, तेज गेंदबाजों को 257 विकेट, स्पिनरों को सिर्फ 95...यहां जानिए गुलाबी गेंद का हर राज

News18Hindi
Updated: November 20, 2019, 2:57 PM IST
डे-नाइट टेस्ट : 11 मैच, तेज गेंदबाजों को 257 विकेट, स्पिनरों को सिर्फ 95...यहां जानिए गुलाबी गेंद का हर राज
अभी तक आस्ट्रेलियाई क्रिकेट टीम ने सबसे ज्यादा 5 डे—नाइट टेस्ट मैच खेले हैं. (FILE PHOTO)

डे-नाइट टेस्ट (Day night Test) से जुड़ी दिलचस्प बात ये भी है कि अभी तक खेले गए सभी 11 मुकाबलों के नतीजे निकले हैं. कोई मैच ड्रॉ नहीं रहा है.

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  • Last Updated: November 20, 2019, 2:57 PM IST
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नई दिल्ली. अगर आप कोलकाता (Kolkata) में हैं तो इन दिनों जो रंग आपको सबसे ज्यादा नजर आएगा, वो गुलाबी (Pink) है. वो इसलिए क्योंकि इस समय इस शहर में लोगों की जुबां पर सिर्फ कोलकाता के ईडन गार्डेंस (Eden Gardens) पर होने वाले ऐतिहासिक डे-नाइट टेस्ट (Day Night Test) की ही बातें हैं. और रंग गुलाबी इसलिए क्योंकि डे-नाइट टेस्ट में गुलाबी यानी पिंक बॉल (Pink Ball) का ही इस्तेमाल किया जाता है. तो कुल मिलाकर बात ये है कि जब शुक्रवार 22 नवंबर से भारतीय क्रिकेट इतिहास (Indian Cricket History) का पहला डे-नाइट टेस्ट शुरू होगा तो शायद ऐसा पहली बार होगा जब भारत में किसी टेस्ट मैच में स्टेडियम दर्शकों से खचाखच भरा होगा.

साल 2015 में ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड (Australia vs New Zealand) के बीच क्रिकेट इतिहास का पहला डे-नाइट टेस्ट मैच (First Day Night Test Match) एडीलेड में खेला गया था. ऑस्ट्रेलिया ने ढाई दिन में ये मैच अपने नाम कर लिया और उसकी जीत ने ये संकेत भी दे दिए कि गुलाबी गेंद और डे-नाइट टेस्ट की जुगलबंदी कुछ अलग हटकर है. हालांकि भारत (India) को अपना पहला डे-नाइट टेस्ट खेलने में चार साल से ज्यादा का वक्त लग गया, लेकिन अब जबकि ये ऐतिहासिक मुकाबला शुरू होने ही वाला है तो प्रशंसकों में इसे लेकर भारी उत्सुकता देखी जा रही है. ऐसे में सभी के मन में इसे लेकर कुछ सवाल भी सिर उठा रहे हैं. मसलन डे-नाइट टेस्ट क्यों, गेंद का रंग गुलाबी ही क्यों आदि. तो आइए, हम इन सभी सवालों के जवाब आपको बताते हैं.

ऑस्ट्रेलिया में खेला गया था पहला डे नाइट टेस्ट


डे-नाइट टेस्ट इसलिए

पहले वनडे और फिर टी-20 क्रिकेट के पांव पसारने के बाद टेस्ट क्रिकेट को लेकर लोगों की रुचि लगातार कम होती जा रही थी. नतीजा, क्रिकेट के इस लंबे प्रारूप को देखने के लिए स्टेडियम में नाममात्र के दर्शक ही पहुंच रहे थे. लोगों में टेस्ट क्रिकेट (Test Cricket) के प्रति नए सिरे से रोमांच और उत्साह पैदा करने के लिए डे-नाइट टेस्ट (Day Night Test) की शुरुआत करने का फैसला किया गया. इसी को देखते हुए 2015 में ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के बीच एडीलेड के मैदान पर पहला डे-नाइट टेस्ट मैच खेला गया. इस मैच के पहले दिन 47 हजार और दूसरे दिन 43 हजार दर्शक मैदान में पहुंचे. कुल मिलाकर तीन दिनों में स्टेडियम पहुंचने वाले दर्शकों की संख्या करीब सवा लाख रही.

कोलकाता में 22 नवंबर से होना है डे नाइट टेस्ट


गुलाबी गेंद ही क्यों
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दरअसल, डे-नाइट टेस्ट के लिए गेंद के रंग का चयन सबसे बड़ी चुनौती थी. ऐसा इसलिए क्योंकि ये बेहद जरूरी था कि डे-नाइट टेस्ट (Day Night Test) में जिस भी गेंद का इस्तेमाल किया जाए, वो खिलाड़ियों को अच्छी तरह दिखनी चाहिए. इसलिए गेंद के रंग को लेकर काफी माथापच्ची की गई. इसके लिए दो बातों पर ध्यान देना बेहद जरूरी था. एक तो ये कि गेंद रात में खिलाड़ियों को अच्छी तरह दिखनी चाहिए, और दूसरी कम से कम 80 ओवर तक टिकने वाली गेंद होनी चाहिए.

लाल गेंद : जब प्रयोग किया गया तो टेस्ट क्रिकेट (Test Cricket) की परंपरागत लाल गेंद (Red Ball) रात में अच्छी तरह दिखने की कसौटी पर खरी नहीं उतर सकी. ऐसे में डे-नाइट टेस्ट में भी लाल गेंद इस्तेमाल करने की संभावना बिल्कुल ही समाप्त हो गई.

सफेद गेंद : टेस्ट क्रिकेट की लाल गेंद के नाकाम रहने के बाद अब सभी की नजरें वनडे क्रिकेट में इस्तेमाल की जाने वाली सफेद गेंद पर थी. और जब डे-नाइट टेस्ट के लिए सफेद गेंद (White Ball) को कसौटी पर कसा गया तो ये बॉल दूसरे पैमाने यानी 80 ओवर तक टिकने की शर्त को पूरा नहीं कर सकी.

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गुलाबी गेंद ज्यादा स्विंग होती है


दो रंगों के ​मिश्रण से तैयार हुई गुलाबी गेंद
ऐसे में जबकि लाल और सफेद गेंद दोनों ही डे-नाइट टेस्ट में इस्तेमाल के लिए मुफीद नहीं मानी गईं तो फिर दो रंगों के मिश्रण से गुलाबी गेंद (Pink Ball) तैयार करने का फैसला किया गया. इस तरह डे-नाइट टेस्ट (Day Night Test) के लिए गुलाबी गेंद सामने आई. हालांकि रंग में बदलाव से गेंद के चरित्र पर भी असर पड़ा. यही वजह है कि गुलाबी गेंद अधिक स्विंग करती है और लंबे समय तक तेज गेंदबाजों के लिए मुफीद रहती है. यही वजह है कि पहला डे-नाइट टेस्ट करीब ढाई दिन में ही खत्म हो गया. इस मैच में कोई भी टीम 250 रन के आंकड़े को पार नहीं कर सकी. बेशक तब से लेकर अब तक डे-नाइट टेस्ट में बल्लेबाजी में सुधार देखने को मिला है, लेकिन ये गेंद फिर भी तेज गेंदबाजों के लिए मुफीद बनी हुई है.

ज्यादा वक्त तक नई रहती है गुलाबी गेंद


गुलाबी गेंद की चमक
आमतौर पर किसी टेस्ट में नई लाल गेंद की चमक 60 से 70 मिनट तक कायम रहती है. मगर डे-नाइट टेस्ट (Day Night Test) में इस्तेमाल की जाने वाली गुलाबी गेंद (Pink Ball) की चमक एक पूरे सत्र तक कायम रहती है. यही वजह है कि 30 ओवर की गेंदबाजी के बावजूद गुलाबी गेंद तेज गेंदबाजों को नई गेंद जैसा एहसास कराती है. ऐसे में जब गेंद की चमक बरकरार रहती है तो फिर तेज गेंदबाजों को लंबे समय तक स्विंग कराने में मदद मिलती है. इन हालात का सामना करना दुनिया के किसी भी बल्लेबाज के लिए आसान काम नहीं होता.

इसलिए बनाया गया गेंद को चमकदार
गुलाबी गेंद (Pink Ball) को अधिक चमकदार बनाने की बड़ी वजह इसे लेकर की गई शिकायत भी थी. दरअसल, जब प्रथम श्रेणी क्रिकेट में गुलाबी गेंद का टेस्ट किया जा रहा था तो बल्लेबाजों को इसे देखने में परेशानी महसूस हुई. यहां तक कि गेंदबाज भी इससे खुश नहीं थे क्योंकि गेंद कुछ ओवरों के बाद अपना रंग बदल रही थी. इसके बाद इस बात पर खासा काम किया गया कि गेंद की चमक लंबे समय तक बरकरार रहे और गेंद का रंग न बदले.

लाल गेंद से ज्यादा भारी होती है गुलाबी गेंद


लाल गेंद से अलग कैसे
लाल गेंद (Red Ball) को बनाते वक्त कच्ची लेदर ली जाती है और डाई करके छोड़ दिया जाता है. मगर चूंकि गुलाबी हल्का रंग होता है तो डाई प्रक्रिया के दौरान लेदर पर रंग चढ़ नहीं पाता. इस वजह से लेदर पर कलरिंग पिगमेंट का इस्तेमाल किया जाता है. डाई प्रक्रिया के बाद लेदर पर इसकी एक परत चढ़ाई जाती है. जब अंतिम स्टिचिंग करने से पहले भी इसकी एक परत लेदर पर चढ़ाई जाती है. यहां तक कि कई बार स्टिचिंग होने के बाद भी इसका इस्तेमाल किया जाता है.

कितने दिन में तैयार होती है गुलाबी गेंद
टेस्ट क्रिकेट (Test Cricket) की परंपरागत लाल गेंद को तैयार करने से दोगुना वक्त डे-नाइट टेस्ट में इस्तेमाल की जाने वाली गुलाबी गेंद (Pink Ball) को तैयार करने में लगता है. विशेषज्ञों के अनुसार, गुलाबी गेंद को तैयार करने में जटिल प्रकिया अपनाई जाती है. यही वजह है कि गुलाबी गेंद बनाने में 7 से 8 दिन का समय लगता है, जबकि लाल गेंद 3 से 4 दिन में तैयार हो जाती है.

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भारतीय क्रिकेट टीम ने अभी तक एक भी डे-नाइट टेस्ट मैच नहीं खेला है. (फाइल फोटो)


तेज गेंदबाजों का दबदबा
डे-नाइट टेस्ट (Day Night Test) में तेज गेंदबाजों (Pacers) के दबदबे का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अभी तक खेले गए 11 ऐसे मुकाबलों में उन्हें 257 विकेट हासिल हुए हैं. अब उनकी तुलना में स्पिनरों (Spinners) की बात करें तो उन्हें सिर्फ 95 विकेट ही डे-नाइट टेस्ट में मिले हैं. हालांकि चूंकि कोलकाता में एसजी गुलाबी गेंदों का इस्तेमाल होना है तो इस आंकड़े में परिवर्तन भी हो सकता है. क्योंकि इसमें पिच और आउटफील्ड के हालात भी अहम भूमिका निभाएगे. इसके अलावा कूकाबुरा और डयूक गेंदों की तुलना में एसजी गेंदों की सीम भी अधिक विजिबल होती है.

यह भी पढ़ें : शाम को कम दिखेगी गुलाबी गेंद! डे नाइट टेस्ट से पहले सचिन तेंदुलकर ने कही 5 बड़ी बातें

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First published: November 20, 2019, 2:36 PM IST
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