बड़ा सवाल : क्या चार साल बाद वर्ल्ड कप खेल पाएंगे धवन?

धवन से बेहतर रिकॉर्ड आईसीसी टूर्नामेंट और वर्ल्ड कप में न कोहली का है और न ही रोहित शर्मा का. लेकिन, धवन को इंतज़ार करना आता है. तो क्या हुआ वो इस बार पूरा वर्ल्ड कप नहीं खेल पाए... कौन जानता है कि 2023 में धवन फिर से लौटें और छा जाएं

विमल कुमार@Vimalwa | News18Hindi
Updated: June 21, 2019, 5:07 PM IST
बड़ा सवाल : क्या चार साल बाद वर्ल्ड कप खेल पाएंगे धवन?
धवन से बेहतर रिकॉर्ड आईसीसी टूर्नामेंट और वर्ल्ड कप में न कोहली का है और न ही रोहित शर्मा का. लेकिन, धवन को इंतज़ार करना आता है. तो क्या हुआ वो इस बार पूरा वर्ल्ड कप नहीं खेल पाए... कौन जानता है कि 2023 में धवन फिर से लौटें और छा जाएं
विमल कुमार@Vimalwa | News18Hindi
Updated: June 21, 2019, 5:07 PM IST
टीम इंडिया को वर्ल्ड कप 2019 में नतीजे के लिहाज़ से अब तक कोई भी नुकसान नहीं हुआ है, लेकिन खिलाड़ी के तौर पर उन्हें एक बहुत बड़ा नुकसान हुआ है. आखिर मिस्टर आईसीसी के नाम से मशहूर शिखर धवन की कमी टीम इंडिया को तब तक खलेगी कि जबतक ये टीम चैंपियन नहीं बन जाती. धवन से बेहतर रिकॉर्ड आईसीसी टूर्नामेंट और वर्ल्ड कप में न तो विराट कोहली का है और न ही रोहित शर्मा का. लेकिन, धवन को इंतज़ार करना आता है. तो क्या हुआ वो इस बार पूरा वर्ल्ड कप नहीं खेल पाये.. कौन जानता है कि 2023 में धवन फिर से लौटें.. और छा जाएं... उनके करियर के उतार-चढ़ाव को देखते हुआ ऐसा होते दिखना नामुमकिन भी नहीं लगता है.

भारत में अक्सर टीवी मीडिया को इस बात के लिए दोषी ठहरा दिया जाता है कि ये बड़ी जल्दी किसी युवा क्रिकेटर को अचानक ही स्टार बना देते हैं. 2004 में बांग्लादेश में अंडर 19 वर्ल्ड कप में सबसे ज्यादा 505 रन बनाने के बाद  शिखर धवन दिल्ली के साउथ कैंपस में वेंकेटेश्वर कॉलेज में अभ्यास करने पहुंचे. तारिक सिन्हा के मशहूर सोनेट क्लब में उस वक्त आशीष नेहरा और आकाश चोपड़ा जैसे खिलाड़ी भी साथ-साथ अभ्यास कर रहे थे. धवन को पहली बार नैट्स पर बल्लेबाज़ी करते हुए ऐसा लगा कि अगले कुछ महीनों में उनके लिए पहले दिल्ली रणजी ट्रॉफी और उसके बाद टीम इंडिया के लिए खेलना एकदम स्वाभाविक यात्रा सी होगी. लेकिन, मेरा आकलन अधूरा था. धवन ने बहुत जल्द उस मज़बूत दिल्ली रणजी टीम में जगह बना ली, जिसमें चोपड़ा और नेहरा के अलावा गौतम गंभीर, विजय दाहिया और अजय जडेजा जैसे खिलाड़ी भी मौजूद थे. लेकिन, इसके बाद धवन का सफर रुक सा गया. अगले 6 सालों तक धवन भारत के तमाम मैदानों पर रन जुटाने की कवायद में लगे रहते, वहीं दूसरी तरफ एक के बाद एक करके कभी सुरेश रैना, कभी रॉबिन उथ्प्पा तो कभी आरपी सिंह सिंह जैसे खिलाड़ी टीम इंडिया में शामिल होते रहे. ये सब धवन के अंडर-19 टीम के साथी खिलाड़ी थे. अगर इतना ही काफी नहीं था तो आने वाले सालों में अंडर 19 के जूनियर खिलाड़ियों में से रोहित शर्मा, पीयूष चावला और यहां तक कि दिल्ली के ही विराट कोहली को मौका मिला और वो लोग भी इंडिया के लिए खेले.

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शिखर धवन का बल्ला आईसीसी टूर्नामेंटों में जमकर बोलता है.


दूसरों की कामयाबी का आकलन करने में खर्च नहीं की ऊर्जा

भारत जैसे मुल्क में अक्सर किसी भी क्षेत्र के युवा को अपने साथ पढ़ने या खेलने वालों की कामयाबी के बाद खुद की नाकामी की तुलना से अक्सर गुज़रना पड़ता है. अक्सर आपके साथी या फिर रिश्तेदार या कई बार आपके माता-पिता ही दूसरे साथी खिलाड़ियों की कामयाबी का उदाहरण देकर आपको शायद अनजाने में ही हतोत्साहित कर जाते हैं. लेकिन शिखर के साथ ऐसा नहीं हुआ. शिखर ने पहली बार टेस्ट टीम में चयन होने के बाद मुझे बताया था कि उन्होंने अपनी ऊर्जा कभी भी दूसरों की कामयाबी का आकलन करने में खर्च नहीं की. धवन के मुताबिक उन्होंने हमेशा दूसरों की किस्मत और उनके हुनर को सराहा और उनसे हो सका तो प्रेरणा ही ली. अगर धवन को किसी से नाराजगी रही तो वो खुद से थी. बार बार अपनी प्रतिभा को प्रदर्शन में तब्दील नहीं करने की झुंझलाहट.

अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के तीनों फॉर्मेंट में दिल्ली के ही दो ओपनर गौतम गंभीर और वीरेंद्र सहवाग की शानदार कामयाबी ने शिखर तो क्या भारत के बाकि ओपनर्स को ही अपनी किस्मत आजमाने के मौके बहुत कम दिए. और जब कभी ऐसे मौके मुश्किल से आये तो पूर्व मुख्य चयनकर्ता के. श्रीकांत को तमिलानाडु के बाहर कोई और खिलाड़ी नहीं दिखता था. मुरली विजय और अभिनव मुकुंद को घरेलू क्रिकेट में बेहतरीन खेल दिखाने के अलावा चेन्नई शहर से होने का फायदा भी मिला. बहरहाल, धवन कभी ऐसी बातों से मुरझाए नहीं. घरेलू क्रिकेट में दिल्ली, नाॅर्थ ज़ोन और चैलेंजर टीमों में लगातार रन बनाने के अलावा विदेशी ज़मीन पर वो इंडिया ए और इमर्जिंग टीमों के लिए भी लगातार रन बनाकर सुर्खियां बटोरते रहे. धवन की शादी भी उनकी शख़्सियत में एक अलग किस्म का ठहराव लेकर आई जिसके चलते उनकी क्रिकेट में और भी निखार आया.

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भारतीय ओपनर शिखर धवन ने मौजूदा वर्ल्ड कप में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ शानदार शतक लगाया था.

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आईपीएल ने भी चमकाई किस्मत

धवन 2010 में भारत के लिए वन-डे क्रिकेट खेल चुके थे लेकिन वो अपनी छाप छोड़ने में नाकाम रहे थे. शायद उन्हें ये एहसास था कि गंभीर और सहवाग के रहते उन्हें नियमित तौर पर मौका नहीं मिले. लेकिन, उन्होंने उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा. लगातार मेहनत करते रहे. आईपीएल ने भी किस्मत को संवारने में अहम भूमिका निभाई. 2012 आईपीएल में धवन ने 569 रन बनाये जो क्रिस गेल और गंभीर के बाद टूर्नामेंट में सबसे ज़्यादा रन थे. इसके बाद घरेलू क्रिकेट में धवन ने रनों का अंबार लगा दिया। वक्त ने ऐसी करवट बदली कि इसी दौर में गंभीर और सहवाग अपने करियर के सबसे ख़राब दौर से गुज़रे. गंभीर से तीन साल से टेस्ट क्रिकेट में शतक नहीं बन रहे थे, धवन ने अपने पहले ही टेस्ट में 187 रनों की ऐसी धमाकेदार पारी खेली कि जिससे ड्रॉ की तरफ जाता टेस्ट मैच अचानक ही टीम इंडिया के लिए जीत की सबसे बड़ी वजह बन गया. वन-डे क्रिकेट में भी सहवाग ने अपने आखिरी 15 मैचों में सिर्फ 1 शतक और 1 अर्धशतक बनाया जबकि गंभीर ने अपने आखिरी 10 मैचों में सिर्फ 2 अर्धशतक जमाये. लेकिन धवन को जब चैंपिंयस ट्रॉफी में फिर से मौका मिला तो उन्होंने सिर्फ 5 मैचों में 90.75 की औसत से 363 रन बना डाले  जिसमें दो लगातार शतक भी शामिल रहे. इसके बाद से तो धवन ने पीछे मुड़कर ही नहीं देखा और अब भारत के लिए वन-डे क्रिकेट के बेहतरीन ओपनर्स में से एक हो गये.

12 साल में ही दिख गई थी प्रतिभा की चमक

धवन के बचपन के कोच मदन शर्मा मानते हैं कि उनके शिष्य को भले ही देर से मौका मिला लेकिन धवन की काबिलियत की झलक वो करीब 15 साल पहले ही देख चुके थे. मदन का कहना है कि धवन जब महज़ 12 साल के थे दिल्ली के राजधानी कॉलेज में एक क्लब मैच के दौरान उन्होंने एक शतकीय पारी खेली थी. हालांकि, धवन की टीम सिर्फ 4 रनों से मैच हार गई थी लेकिन जिस, अंदाज़ में धवन ने विशाल रनों का पीछा करते हुए अपने लाजवाब टेंपरामेंट का नमूना पेश किया उससे ये यकीन करना मुशकिल था कि कोई 12 साल का लड़का खेल रहा है.

हसी की तरह करना पड़ा लंबा इंतजार

ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी माइकल हसी को एक दशक के इंतज़ार के बाद पहली बार टेस्ट क्रिकेट खेलने का मौका 30 साल की उम्र में तब मिला जब उन्होंने प्रथम श्रैणी क्रिकेट में 15313 रन बनाये. हसी  ने 79  टेस्ट में  51.52 की औसत से 6235 रन बनाये. हसी ने ऐसा इसलिए किया क्योंकि उन्हें ये एहसास था कि एक मौके की कीमत क्या होती है. हसी की ही तरह धवन को भी अपने टेस्ट करियर के लिए काफी लंबा इंतज़ार करना पड़ा. आखिरकार 81 प्रथम श्रैणी मैचों में 5679 रन बनाने के बाद धवन को वो मौका मिल ही गया जिसके वो हकदार थे.

पूरे करियर में धवन ने दिखाया है कि अहम मौकों पर निराशा के बावजूद वो कभी हताश नहीं हुए हैं. उन्होंने सही मौके का इंतज़ार किया है. क्या उम्र के इस दौर में एक बार फिर से धवन वर्ल्ड कप चैंपियन बनने के लिए 4 सालों का लंबा इंतज़ार कर पायेंगे, ये देखना वाकई दिलचस्प होगा.

वर्ल्ड कप: इन चार टीमों का सेमीफाइनल में पहुंचना लगभग तय

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First published: June 21, 2019, 3:13 PM IST
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