क्या अस्सी के दशक वाली टीम इंडिया जैसी हो गई है पाकिस्तानी टीम?

कुछ समय पहले ऐसे ही हालात भारतीय टीम के हुआ करते थे. खासतौर पर जब मैच शारजाह में होते थे. 1986 के ऑस्ट्रेलेशिया कप में जावेद मियांदाद ने चेतन शर्मा की आखिरी गेंद पर छक्का लगाकर अपनी टीम को जीत दिलाई थी.

News18Hindi
Updated: June 17, 2019, 6:09 PM IST
क्या अस्सी के दशक वाली टीम इंडिया जैसी हो गई है पाकिस्तानी टीम?
पाकिस्तान की टीम इस समय बेहद हताश नजर आ रही है. (फोटो-AP/Dave Thompson)
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Updated: June 17, 2019, 6:09 PM IST
2003 वर्ल्ड कप का फाइनल याद है आपको? जवागल श्रीनाथ ने भारतीय गेंदबाजी शुरू की थी. पहले ओवर में एक छक्का और दो चौके लगे थे. दूसरा ओवर जहीर खान ने किया था. इन दो ओवर्स में भारतीय गेंदबाजों की लाइन-लेंथ ने साबित कर दिया था कि मानसिक तौर पर टीम इंडिया इस मैच को हार चुकी है. कुछ एक्स्ट्रा करने की कोशिश में वो भी नहीं कर पा रहे, जो सामान्य तौर पर कर सकते थे.

वहां से अब 2019 के 16 जून पर आते हैं. शुरुआती ओवर्स में पहले मोहम्मद आमिर और फिर वहाब रियाज को अंपायर्स ने पिच के खतरनाक क्षेत्र में दौड़ने को लेकर चेतावनी दी. ये शायद उस एक्स्ट्रा एफर्ट का ही नतीजा था, जो पाकिस्तानी करना चाहते थे.

सरफराज को नींद आ रही थी, या नींद की कमी से उबासी ले रहे थे?

बीच में एक मौका आया, जब कप्तान सरफराज उबासी लेते दिखाई दिए. सोशल मीडिया पर इसका बहुत मजाक भी उड़ा. लेकिन एक और पहलू पर ध्यान देने की जरूरत है. क्या पाकिस्तानी कप्तान और टीम की नींद पूरी नहीं हुई? भारत से लेकर पाकिस्तान के तमाम दिग्गज कह चुके हैं कि बड़े मैच से पहले रिलैक्स रहना बहुत जरूरी है. हम और आप बचपन में स्कूली इम्तिहान से गुजरे हैं. याद कीजिए, जब जरूरत से ज्यादा पढ़ते थे, तो पेपर देते समय उबासी आती थी या नहीं?

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भारत से हारने के बाद पाकिस्तान के कप्तान सरफराज अहमद की काफी आलोचना हो रही है. (फोटो-एपी)


मैदान में भी ऐसा ही था. एक लम्हे के लिए नहीं लगा कि भारतीय खिलाड़ियों के चेहरे पर कोई टेंशन है. दूसरी तरफ, पाकिस्तानी जरूरत से ज्यादा कोशिश कर रहे थे, जिसमें वो उतना भी नहीं कर पा रहे थे, जो आमतौर पर वो सामान्य माहौल में कर पाते हैं.

पाकिस्तान के एकमात्र वर्ल्ड कप विजेता कप्तान इमरान खान ने मैच से पहले पांच ट्वीट किए थे. अब वो पाकिस्तान के प्रधानमंत्री हैं. इमरान ने इन ट्वीट में लिखा था टैलेंट से ज्यादा अहम मानसिक मजबूती है. उन्होंने लिखा कि सरफराज साहसी कप्तान हैं और उन्हें अपना बेस्ट देना चाहिए. साथ ही, हार का डर दिमाग से निकाल देना चाहिए. हार के डर से नेगेटिव और डिफेंसिव रणनीति बनती है. अहम मौके पर गलतियां होती हैं, जिनका विपक्षी टीम फायदा उठाती है.
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अपने प्रधानमंत्री की बात नहीं सुनी सरफराज ने

ऐसा लगता नहीं कि पाकिस्तान ने अपने वज़ीर-ए आज़म की बात सुनी. इसका खामियाजा भुगता. इमरान ने पहले बैटिंग की सलाह दी थी. सरफराज ने बॉलिंग का फैसला किया. इमरान ने ऐसे खिलाड़ियों को न खिलाने की सलाह दी थी, जो स्पेशलिस्ट नहीं हैं. ऐसा लगता है कि वो बात भी नहीं मानी.

सरफराज की रणनीति में जीत की उम्मीद कम, हार से बचने की चाह ज्यादा थी. पिच रिपोर्ट में साफ था कि बहुत हल्की नमी है. उसके अलावा पिच हार्ड है. यही इमरान ने कहा था कि अगर बहुत डैंप या नम न हो, तो पहले बैटिंग करें. सरफराज ने उलटा किया. उन्होंने बॉलिंग का फैसला किया.

अगर पहले बॉलिंग का फैसला है, तो जाहिर तौर पर तेज गेंदबाजों का ज्यादा इस्तेमाल होना चाहिए. लेकिन पहले 23 ओवर्स में 14 स्पिनर्स के हिस्से आए. अगर आप पिच पर नमी का फायदा उठाने चाहते हैं, तो जाहिर तौर पर शुरुआती ओवर्स तेज गेंदबाजों से ही कराएंगे. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. यह वही मेंटल कंडीशन है, जिसका जिक्र इमरान खान कर रहे थे.

बल्लेबाजों की स्ट्राइक रेट पर भी दबाव का असर

जरा पाकिस्तानी बल्लेबाजों की स्ट्राइक रेट पर नजर डालिए. इमाम उल हक ने 18 गेंद में सात रन बनाए. फखर जमां 75 में 62 और बाबर आज़म ने 57 में 48 रन बनाए. मोहम्मद हफीज की पारी छोटी रही. इसलिए उससे ज्यादा कुछ मायने नहीं निकलते. उन्होंने सात में नौ रन बनाए. कप्तान सरफराज अहमद 30 गेंद में 12 रन बनाने में कामयाब रहे. जब आपका टारगेट सवा तीन सौ से भी ज्यादा है, तो ये स्ट्राइक रेट आपको कहां पहुंचाएगी? सरफराज और इमाम की स्ट्राइक रेट तो 40 भी पार नहीं कर पाई. ये हार का खौफ था, जो पाकिस्तानियों के दिमाग पर हावी था.

भारत कुछ दशक पहले मानसिक तौर पर कमजोर दिखता था,

कुछ समय पहले ऐसे ही हालात भारतीय टीम के हुआ करते थे. खासतौर पर जब मैच शारजाह में होते थे. 1986 के ऑस्ट्रेलेशिया कप में जावेद मियांदाद ने चेतन शर्मा की आखिरी गेंद पर छक्का लगाकर अपनी टीम को जीत दिलाई थी. उसके बाद भारतीय टीम जब भी पाकिस्तान के सामने उतरती, ऐसा लगता कि वो मानसिक तौर पर पहले ही हार गई है. यही हालात पाकिस्तान के आज की तारीख में दिखाई देते हैं.

16 जून के मुकाबले की एक और खास बात है. पिछले कुछ साल में ऐसा पहली बार था कि दिल्ली के तमाम इलाकों से पटाखे चलने की आवाज नहीं आई. संभव है कि कुछ इलाकों में चले हों, लेकिन ज्यादातर में ऐसा नहीं था. इसकी क्या वजह है? क्या पाकिस्तान के खिलाफ मैच को लेकर वो उत्साह नहीं रहा? उत्साह मीडिया में ज्यादा था, लोगों में कम? या लोगों ने मान लिया है कि पाकिस्तान की यह टीम वैसी नहीं, जिसे हराकर पटाखों वाली खुशी मिले. यह भी मानसिक तौर पर दूसरे से बेहतर होने की प्रक्रिया का हिस्सा है, जहां आपको पता है कि आप बेहतर हैं और वो व्यवहार में दिखता है.
First published: June 17, 2019, 5:54 PM IST
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