सचिन तेंदुलकर के बारे में तो खूब सुना होगा, मगर 'मास्‍टर ब्‍लास्‍टर' के मास्‍टर की कहानी जानते हैं आप?

सचिन तेंदुलकर के बारे में तो खूब सुना होगा, मगर 'मास्‍टर ब्‍लास्‍टर' के मास्‍टर की कहानी जानते हैं आप?
कोच रमाकांत आचरेकर के साथ सचिन तेंदुलकर (फाइल फोटो)

सचिन तेंदुलकर (Sachin Tendulkar) को क्रिकेट का भगवान बनाने वाले गुरु रमाकांत आचरेकर (Ramakant Achrekar) ने 11 साल की उम्र में क्रिकेट खेलना शुरू किया था और वो अपने करियर में सिर्फ एक ही फर्स्‍ट क्‍लास मैच खेल पाए.

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नई दिल्‍ली. गुरु...एक ऐसा व्‍यक्ति जो पहले आपको आसमान की ऊंचाईयों तक पहुंचाने के लिए अपना सब कुछ झोंक देता है और फिर खुद जमीन पर खड़े होकर अपना सिर ऊंचा करके आपको देखता है. सिर का ऊपर होने का सिर्फ और सिर्फ एक ही मतलब है... फक्र, अपने शिष्‍य पर. दुनिया में कई ऐसे गुरु हैं, जिन्‍होंने दुनिया को सितारा दिया. जब पूरी दुनिया उस सितारे का गुणगान करती है तो ऐसे कम ही मौके होते है, जब शिष्‍य से पहले गुरु का गुणगान हो. खेल की दुनिया में गुरु और शिष्‍य के किस्‍से तो काफी है, मगर ऐसे खिलाड़ी चुनिंदा ही है, जिनका नाम आने के साथ ही उनके गुरु का भी नाम आए. यानी ऐसा शिष्‍य, जिसकी जिंदगी, सफलता, गुणगान सब कुछ गुरु के बिना अधूरा हो और गुरु शिष्‍य की एक ऐसी ही मिसाल है कोच रमाकांत आचरेकर (Ramakant Achrekar) और महान क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर  (Sachin Tendulkar).

कोच के नाम के बिना क्रिकेट के भगवान सचिन अधूरे हैं. पिछले साल इस दुनिया को अलविदा कहने वाले कोच रमाकांत सचिन की जिंदगी में आज भी जिंदा है और हमेशा रहेंगे.

1932 में जन्‍में रमांकात विट्ठल आचरेकर का खेल करियर ज्‍यादा लंबा नहीं चल गया, जिसके बाद उन्‍होंने कोचिंग के कदम रखा और जिस सपने को वो पूरा नहीं कर पाए. उस सपने को उन्‍होंने युवा क्रिकेटर्स को देखना सिखाया और पूरा करना भी. उनके इसी सपने को सचिन, विनोद कांबली, रमेश पवार, प्रणीव आमरे जैसे कई खिलाड़ियों ने पूरा किया.



सिर्फ एक मैच ही खेल पाए
आचरेकर का जन्‍म 5 दिसंबर 1932 को महाराष्‍ट्र के मालवन गांव में हुआ था. परिवार और उनके खास दोस्‍त उन्‍हें बाबा कहा करते थे. जब वे 11 साल के थे तो परिवार के साथ बॉम्‍बे आ गए और यहां उन्‍होंने स्‍कूल में एडमिशन ले लिया और वही पर क्रिकेट में भी उनकी रूचि होने लगी थी. आचरेकर ने 11 साल उम्र से ही क्रिकेट खेलना शुरू दिया था और फिर दो साल बाद यानी 1945 में वह न्‍यू हिंद स्‍पोर्ट्स क्‍लब और युवा महाराष्‍ट्र इलेवन की ओर से क्रिकेट खेलने लगे. हालांकि बतौर खिलाड़ी उनका करियर ज्‍यादा आगे तक नहीं जा पाया.

आचरेकर स्‍टेट बैंक में भी काम करते थे, जहां उनकी मुलाकात अजीत वाडेकर से हुई. जो बैंकर से क्रिकेटर बने. विकेटकीपर बल्‍लेबाज आचरेकर ने अपने करियर में सिर्फ एक फर्स्‍ट क्‍लास मैच खेला था. वो 1964 में एक टूर्नामेंट में स्‍टेट बैंक ऑफ इंडिया की ओर से हैदराबाद के खिलाफ मैदान पर उतरे थे. जहां उन्‍होंने सिर्फ 30 रन बनाए थे. हालांकि बतौर खिलाड़ी करियर न चल पाने के बाद उन्‍होंने 1967 ; 1968 में कोचिंग देना शुरू कर दिया. शुरुआत में वह न्‍यू हिंद और बाकी क्‍लबों के नेट्स पर काम करते थे, फिर उन्‍होंने शिवाजी पार्क में अलग क्‍लब की नींव रखी. इसके बाद इस क्‍लब से कई इंटरनेशल खिलाड़ी निकले.

खून में था क्रिकेट
आचरेकर के खून में ही क्रिकेट था. उनके पिता विट्ठल भी एक क्रिकेटर थे और वह विजय मांजरेकर के पिता के साथ क्‍लब क्रिकेट खेलते थे. हालांकि आचरेकर तो बतौर खिलाड़ी सफल नहीं हो गए, मगर बतौर कोच उन्‍होंने अपनी एक अलग पहचान बना ली थी. रामनाथ पारकर टेस्‍ट कैप पाने वाले उनके पहले शिष्‍य थे. सचिन जब 11 साल के थे, तब उनके भाई ने आचरेकर ने उनकी मुलाकात करवाई और यही से उनका एक नया सफर शुरू हुआ.
हालांकि 90 के दशक में आचरेकर पैरालाइज हो गए थे और क्रिकेट कोचिंग में उनकी सक्रियता भी थोड़ी कम हो गई थी. मगर खिलाड़ियों को वो हमेशा टिप्‍स देते रहते थे. सचिन भी जब मुश्किल में फंस जाते थे तो आचरेकर ही थे, जो उनकी मदद करते थे. पिछले साल 2 जनवरी को लंबी बीमारी के चलते उन्‍होंने दुनिया को अलविदा कह दिया. सचिन तेंदुलकर सहित पूरा भारतीय खेल जगत शोक में डूब गया था. मास्‍टर ब्‍लास्‍टर बनाने वाले अपने मास्‍टर की अर्थी को सचिन ने कंधा दिया और जिंदगी में पहली बार सचिन ने भावुकता की हर सीमा को पार किया था.

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