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कड़े संघर्ष और विपरीत हालात भी नहीं तोड़ पाए जिनका सपना अब वो भारत को बनाएंगे वर्ल्ड चैंपियन

News18Hindi
Updated: February 8, 2020, 8:58 PM IST
कड़े संघर्ष और विपरीत हालात भी नहीं तोड़ पाए जिनका सपना अब वो भारत को बनाएंगे वर्ल्ड चैंपियन
भारतीय अंडर19 वर्ल्ड कप टीम

भारतीय अंडर19 टीम साउथ अफ्रीका (South Africa) में चल रहे वर्ल्ड कप (ICC World Cup 2020) के फाइनल में पहुंच गई है जहां उसका सामना अब बांग्लादेश से होगा

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  • Last Updated: February 8, 2020, 8:58 PM IST
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नई दिल्ली. भारतीय अंडर 19 टीम (India U19 Team) साउथ अफ्रीका (South Africa) में हो रहे वर्ल्ड कप (U19 World Cup 2020) के फाइनल में पहुंच चुकी है. युवा जोश से भरी  इस टीम के खिलाड़ियों को देखकर उनके संघर्ष का अंदाजा लगाना बहुत मुश्किल है. कम उम्र में जिम्मेदारियों के बोझ के साथ अपनी आंखों में क्रिकेट के सपने को जिस तरह इन खिलाड़ियों ने जिंदा रखा है वह हमें काफी कुछ सीखाता है. क्रिकेट में भारत को जितना पसंद किया जाता है, इस खेल में नाम कमाना भी उतना ही मुश्किल है. हालांकि आज हम आपको जो कहानियां बताने जा रहे हैं उन सबने साबित किया कि विपरीत हालातों, कम उम्र के बावजूद कड़ी मेहनत और दृढ़ निश्चय के साथ कैसे आंखों में बसे सपनों को जमीन पर उतारा जाता है.

रवि ने खुद बनवाई पिच
रवि जोधपुर के रहने वाले थे जहां कोई क्रिकेट पिच नहीं थी. बचपन से ही क्रिकेट को पसंद करने वाले रवि (Ravi Bishnoi) अपने बड़े भाई के साथ हर रोज क्रिकेट खेला करते थे.  रवि के पिता सरकारी स्कूल में हेडमास्टर थे और उन्हें उनका क्रिकेट खेलना पसंद नहीं आया. रवि (Ravi Bishnoi)  जैसे बच्चों के लिए जोधपुर में शाहरुख पठान और प्रद्योत सिंह नाम के दो दोस्तों ने एकेडमी खोलने का फैसला किया. अकेडमी खोलने के लिए पर्याप्त पैसा उनके पास नहीं था ऐसे में रवि जैसे बच्चों ने उनकी मदद की.

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रवि बिश्नोई मौजूदा अंडर19 वर्ल्ड कप में 11 विकेट लेकर टीम इंडिया के सबसे सफल गेंदबाज बने हुए हैं. (फाइल फोटो)


खर्च कम हो इसके लिए लोगों ने खुद ही मजदूरी का काम करना शुरू किया. रवि (Ravi Bishnoi) ने अकेडमी के काम के लिए मजदूरी की. वह सिमेंट का बैग लेकर एकेडमी पहुंचाते , पत्थर तोड़ते थे ताकी मजदूरी का खर्च बचाया जा सके. उनकी मजदूरी करने से जो पैसे बचे उससे एक्सपर्ट्स को बुलाकर अकेडमी की क्रिकेट पिच तैयार की गई थी. रवि (Ravi Bishnoi)  ने इसपीएन क्रिकइंफो को दिए इंटरव्यू में कहा था, 'वह छह महीने मेरे लिए काफी मुश्किल थे, मैं काफी मेहनत करता था बिना यह जाने कि इसका कोई फायदा भी होगा या नहीं. एकेडमी तैयार हुई और वहां से मेरा क्रिकेट का असली सफर शुरू हुआ.'

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रवि बिशनोई वर्ल्ड कप में जापान के खिलाफ मैन ऑफ द मैच रहे थे


अंडर 16 टूर्नामेंट में उन्‍हें जब खेलने का मौका नहीं मिला तो उनके पिता ने उन्‍हें क्रिकेट छोड़ने को कह दिया था. उनके पिता का मानना था कि वह इस खेल के काबिल नहीं हैं. लेकिन रवि (Ravi Bishnoi)  के कोच प्रद्योत राठौड़ और शाहरुख खान ने उनके पिता को मनाया. दो साल पहले उन्‍हें राजस्‍थान क्रिकेट एसोसिएशन में जूनियर सलेक्‍शन ट्रायल के दौरान चुना नहीं गया था. उन्‍हें पहले ही दिन बाहर कर दिया गया था. लेकिन जब उन्‍होंने दोबारा चयन किया तो उन्‍हें चुन लिया गया. इसके बाद उन्‍होंने घरेलू मैचों में 97 विकेट लिए थे.मां ने कंडक्टरी करके पूरा किया बेटे का सपना
भारतीय टीम के अर्थव अनकोलेकर (Atharv Ankolekar) अपने क्रिकेट की उपलब्धियों का सारा श्रेय अपनी मां को देते हैं. श्रीलंका में पिछले साल एशिया कप फाइनल में बांग्लादेश के खिलाफ पांच विकेट लेने वाले अथर्व (Atharv Ankolekar)  ने नौ वर्ष की उम्र में अपने पिता को खो दिया था. सास, ननद और दो बेटों की जिम्मेदारी उनकी मां वैदेही को उठानी पड़ी जो घर में बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती थी. वैदेही ने अपने पति की जगह वृहनमुंबई इलेक्ट्रिक सप्लाय एंड ट्रांसपोर्ट (बेस्ट) की बसों में कंडक्टर की नौकरी करके अथर्व (Atharv Ankolekar)  को क्रिकेटर बनाया. वैदेही ने एक इंटरव्यू  में कहा ,‘अथर्व के पापा का सपना था कि वह क्रिकेटर बने और उनके जाने के बाद मैने उसे पूरा किया. वह हमेशा नाइट शिफ्ट करते थे ताकि दिन में उसे प्रेक्टिस करा सके लेकिन उसकी कामयाबी देखने के लिये वह नहीं है.’ अक्सर अथर्व के मैच के दिन वैदेही की ड्यूटी होती है लेकिन अब अंडर 19 विश्व कप फाइनल रविवार को है तो वह पूरा मैच देखेंगी.

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अथर्व अंकोलेक ने 9 साल पहले एक प्रैक्टिस मैच में सचिन तेंदुलकर को आउट कर दिया था.


अपने संघर्ष के दौर को याद करते हुए उन्होंने बताया ,‘वह काफी कठिन दौर था. मैं उसे मैदान पर ले जाती लेकिन दूसरे बच्चे अभ्यास के बाद जूस पीते या अच्छी चीजें खाते लेकिन मैं उसे कभी ये नहीं दे पाई.’ उन्होंने कहा ,‘ लेकिन अथर्व के दोस्तों के माता पिता और उसके कोचों ने काफी मदद की.’ एशिया कप जीतने के बाद मां ने अपने बेटे को कोई तोहफा नहीं दिया लेकिन उसके लिये फोड़नीचा भात (बघारे चावल) और चनादाल का पोड़ा बनाया.  उन्होंने कहा ,‘अब हमारे हालात पहले से बेहतर है लेकिन अपने बुरे दौर को हममें से कोई नहीं भूला है. आज भी खुशी के मौके पर उसे छप्पन पकवान नहीं बल्कि वही खाना चाहिये जिसे खाकर वह बड़ा हुआ है.’

यशस्वी के संघर्ष ने दिलाई उन्हें सफलता
वर्ल्ड कप में सबसे ज्यादा रन बनाने वाले भारतीय बल्लेबाज यशस्वी (Yashsvi Jayswal) की कहानी भी उतनी ही संघर्षों भरी है. यशस्वी उत्तर प्रदेश के भदोही का रहने वाले हैं. उनके पिता भदोही में ही एक छोटी सी दुकान चलाते हैं. यशस्वी (Yashsvi Jayswal)  को शुरुआत से ही क्रिकेट खेलना पसंद था और अपना यह सपना पूरा करने के लिए वह कम उम्र में ही मुंबई आ गए थे.

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यशस्वी जायसवाल ने पाकिस्तान के खिलाफ सेमीफाइनल में बेहतरीन शतक लगाया था. (फाइल फोटो)


उनके पिता के लिए परिवार को पालना मुश्किल हो रहा था इसलिए उन्होंने एतराज़ भी नहीं किया. मुंबई में यशस्वी (Yashsvi Jayswal)  के चाचा का घर इतना बड़ा नहीं था कि वो उसे साथ रख सकें. इसलिए चाचा ने मुस्लिम यूनाइटेड क्लब से अनुरोध किया कि वो यशस्वी को टेंट में रहने की इजाज़त दें. अगले तीन साल के लिए वो टेंट ही यशस्वी (Yashsvi Jayswal)  के लिए घर बन गया. वह खुद अपना खर्चा चलाने की कोशिश करते जिसके लिए उन्होंने कई काम भी किए. उनके पिता कई बार पैसे भेजते लेकिन वो कभी भी काफी नहीं होते.

यशस्वी जायसवाल ने बेचे हैं गोल-गप्पे


राम लीला के समय आज़ाद मैदान पर यशस्वी (Yashsvi Jayswal)  ने गोल-गप्पे भी बेचे. लेकिन इसके बावजूद कई रातों को उन्हें भूखा सोना पड़ता था. जल्द ही एक लोकल कोच ज्वाला सिंह यशस्वी से मिले और उन्हें कोचिंग देनी शुरू कर दी. यहां से उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा. मुंबई के सेलेक्टर्स ने भी उनपर भरोसा दिखाया और उन्हें अंडर19 टीम में शामिल किया. यशस्वी ने यहां भी खुद को साबित किया और आखिरकार भारतीय अंडर 19 टीम में शामिल हो गए.

प्रियम को मिला पिता का साथ
भारतीय टीम के कप्तान प्रियम गर्ग (Priyam Garg)  मेरठ के करीब किला परीक्षित गढ के रहने वाले हैं. बचपन में ही उन्होंने अपनी मां को खो दिया था.  तीन बहनों और दो भाइयों के परिवार को उनके पिता नरेश गर्ग (Naresh Garg) ने संभाला जिन्होंने दूध , अखबार बेचकर और बाद में स्कूल में वैन चलाकर उसके सपने को पूरा किया.

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भारत की अंडर 19 टीम के कप्तान प्रियम गर्ग हैं


गर्ग के कोच संजय रस्तोगी ने  कहा ,‘ प्रियम ने अपने पापा का संघर्ष देखा है जो इतनी दूर से उसे लेकर आते थे. यही वजह है कि वह शौकिया नहीं बल्कि पूरी ईमानदारी से कुछ बनने के लिये खेलता है. यह भविष्य में बड़ा खिलाड़ी बनेगा क्योंकि इसमें वह संजीदगी है.’ नरेश ने दोस्तों से उधार लेकर प्रियम के लिये कभी क्रिकेट किट और कोचिंग का इंतजाम किया था और उनकी मेहनत रंग लाई जब वह 2018 में रणजी टीम में चुना गया. इसके बाद उन्हें अंडर19 टीम में शामिल किया गया. आज उनके घर वालों के लिए यह बेहद ही गर्व का पल है कि प्रियम (Priyam Garg) ना सिर्फ टीम का हिस्सा हैं बल्कि बतौर कप्तान भारत को फाइनल में पहुंचा चुके हैं.  अब उनके साथ-साथ पूरा भारत प्रियम को ट्रॉफी जीतते देखना चाहते हैं.

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First published: February 8, 2020, 8:58 PM IST
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