Sunday Special: महेंद्र सिंह धोनी ने इन ‘क्रूर’ फैसलों से करोड़ों 'दुश्मन' बनाए

Sunday Special: महेंद्र सिंह धोनी ने इन ‘क्रूर’ फैसलों से करोड़ों 'दुश्मन' बनाए
महेंद्र सिंह धोनी बतौर कप्तान सुपरहिट रहे हैं.

क्रिकेट ऐसा खेल है, जिसमें कप्तान का रोल अहम होता है. महेंद्र सिंह धोनी (Mahendra Singh Dhoni) ने इसी रोल को अंजाम देने में करोड़ों दुश्मन भी बनाए. और अगर यह कहा जाए कि वे ‘क्रूर’ कप्तान रहे, तो भी गलत नहीं होगा. गांगुली, लक्ष्मण, सहवाग, इरफान से लेकर कई खिलाड़ी गाहे-बगाहे उन पर आरोप लगा चुके हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: August 16, 2020, 7:51 AM IST
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नई दिल्ली. महेंद्र सिंह धोनी के दुश्मन! वो भी करोड़ों में. आप चाहें तो पहली ही नजर में यह बात खारिज कर सकते हैं. चाहें तो कुछ-एक मिनट दीजिए और फिर संभव है कि आखिरी वाक्य तक पहुंचते-पहुंचते यह बात मान लें कि हां, धोनी ने एक समय अपने करोड़ों दुश्मन पैदा कर लिए थे. इसे समझने के लिए हमें एक खिलाड़ी और कप्तान के मिजाज को समझना होगा. किसी भी खिलाड़ी की पहली हसरत देश के लिए खेलने की होती है. नेशनल टीम में चुने जाने के बाद हसरतें उड़ान भरती हैं. यह उड़ान ओलंपिक गोल्ड या विश्व कप ट्रॉफी तक जाती है. व्यक्तिगत खेल में आप जो भी हासिल करते हैं, अपने दम पर करते हैं. टीम इवेंट में काफी कुछ साथी पर निर्भर करता है. क्रिकेट ऐसा ही खेल है, जिसमें कप्तान का रोल अहम होता है. महेंद्र सिंह धोनी (Mahendra Singh Dhoni) ने इसी रोल को अंजाम देने में करोड़ों दुश्मन भी बनाए. और अगर यह कहा जाए कि वे ‘क्रूर’ कप्तान रहे हैं, तो भी गलत नहीं होगा.

जब एमएस धोनी (MS Dhoni) ने कमान संभाली, उस वक्त टीम इंडिया में दिग्गजों की फौज हुआ करती थी. सचिन तेंदुलकर, सौरव गांगुली, राहुल द्रविड़, वीरेंद्र सहवाग, युवराज सिंह, अनिल कुंबले, हरभजन सिंह, जहीर खान, आशीष नेहरा, इरफान पठान, गौतम गंभीर... धोनी इन सबसे जूनियर थे. लेकिन कप्तान तो कप्तान होता है. वह अगर चेहरों को देखकर फैसले लेने लगा तो बेड़ा पार समझो. यही कारण था कि कप्तान धोनी (Captain Dhoni) ने इन सारे दिग्गजों को एक-एक कर रास्ता दिखा दिया. सचिन तेंदुलकर और अनिल कुंबले अपवाद कहे जा सकते हैं. गांगुली, लक्ष्मण, सहवाग, जहीर जैसों के टीम से बाहर होने पर तो यही याद आता है- बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से निकले हम...

हम इन सबकी बात करेंगे. शुरुआत सौरव गांगुली (Sourav Ganguly) से करते हैं. धोनी-गांगुली का रिश्ता बड़ा दिलचस्प है. सौरव गांगुली ने ही रणजी खेल रहे धोनी को नेशनल टीम में लाने की पैरवी की थी. उसी दादा कप्तान ने धोनी को अपने नंबर-3 की पोजीशन दी हो कि जाओ कर लो दुनिया मुट्ठी में. लेकिन जब धोनी बतौर कप्तान दादा बने तो उन्होंने गांगुली के लिए वह स्थितियां पैदा कर दीं कि उन्हें संन्यास के लिए मजबूर होना पड़ा. बंगाल टाइगर को अपने करियर के आखिरी के दिनों में यह तक पता नहीं होता था कि वह अगला मैच खेलेगा या नहीं. खुद गांगुली ने इन दिनों के बारे में लिखा है कि कैसे उन्हें हर मैच में यह साबित करना पड़ता था कि वे टीम इंडिया में खेलने के लायक हैं. आखिर एक दिन तंग आकर गांगुली ने बल्ला टांग दिया.



वीवीएस लक्ष्मण (VVS Laxman) का संन्यास तो उनके प्रशंसकों को रुला गया था और यकीनन उस वक्त वेरी वेरी स्पेशल के दीवानों ने तब के कप्तान धोनी की कड़ी आलोचना की थी. उस वक्त सोशल मीडिया इतना ताकतवर नहीं था, लेकिन जनमानस में यह भावना स्पष्ट थी कि लक्ष्मण के साथ अन्याय हुआ है. हुआ यह था कि जिस दिन टीम इंडिया का चयन होना था उसके एक दिन पहले लक्ष्मण सुबह-सुबह नेट प्रैक्टिस के लिए पहुंचे. उन्होंने पत्रकारों से बताया कि वे अगली सीरीज के लिए तैयारी कर रहे हैं. शाम होते-होते लक्ष्मण संन्यास की घोषणा कर रहे थे. इन चंद घंटों में लक्ष्मण संन्यास के लिए क्यों मजबूर हुए, यह साफ-साफ तो नहीं कहा जा सकता. हां, संकेतों से समझा जा सकता है. लक्ष्मण ने बाद में कुछ यूं दर्द बयां किया था कि धोनी अक्सर फोन नहीं उठाते. अगर 281 रन की महान पारी खेलने वाले खिलाड़ी को धोनी से यूं दर्द मिला हो तो फिर कहने ही क्या? यह अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि लक्ष्मण के संन्यास के दिन उनके प्रशंसकों के मन में धोनी के प्रति कैसी भावनाएं उमड़ रही थीं.
कप्तान धोनी के जमाने के ‘बेआबरू खिलाड़ियों’ की फेहरिश्त लंबी है और हम दूसरों की बात भी करेंगे. लेकिन इससे पहले धोनी की बात कर लेते हैं. फिर वही बात कि धोनी जिस टीम के कप्तान बने, उसमें 11 से ज्यादा उनसे सीनियर, कामयाब और बेइंतहा लोकप्रिय खिलाड़ी थे. अंदाजा लगाइए कि धोनी को इनमें से किसी को यह कहना कितना मुश्किल होता होगा कि आपको प्लेइंग इलेवन में नहीं चुना गया है क्योंकि आपकी फॉर्म ठीक नहीं है. किसी दिन उन्होंने इनमें से किसी को कहा होगा कि आपको 14 सदस्यीय टीम में नहीं चुना गया है. और कभी आगे बढ़कर यह कहना पड़ा होगा कि अब चयनकर्ता और टीम प्रबंधन आपकी बजाय युवाओं को मौका देना चाहते हैं. ऐसा लगता है कि धोनी यही तीसरा काम (संन्यास पर बात) अपने साथियों से नहीं करते थे. संन्यास के बाद वीरेंद्र सहवाग से लेकर इरफान पठान तक कई खिलाड़ी यह ‘शिकायत’ कर चुके हैं.



शायद धोनी मानते थे कि जिस तरह खिलाड़ी खेलने का फैसला खुद लेता है, वैसे ही उसे ठहर जाने (संन्यास) का फैसला भी खुद ही करना चाहिए. क्योंकि ठहराव भी खेल का अहम पहलू है. जिन्होंने समय रहते ठहराव का फैसला लिया, उनसे पूछा गया कि अभी संन्यास क्यों? जिन्होंने गाड़ी जबरन खींची, उससे पूछा गया कि आखिर संन्यास कब? खैर हम धोनी पर लौटते हैं. धोनी का खेल और कप्तानी देखकर अर्जुन का पौराणिक चरित्र याद आता है. उन्हें सिर्फ चिड़िया की आंख की तरह सिर्फ टीम इंडिया दिखती थी. वह चेहरे नहीं देखते थे. जिद्दी धोनी को हर हाल में टीम इंडिया की जीत, कामयाबी और ट्राफियां चाहिए थीं, जो अंत में किसी भी भारतीय क्रिकेटप्रेमी की भी इच्छा होती है. उनके इस राह में जो भी खिलाड़ी आया, उसे उन्होंने बड़ी शांति से बाहर का रास्ता दिखा दिया.

वीरेंद्र सहवाग और जहीर खान के आखिरी मैच को याद करिए. इन दोनों खिलाड़ियों का करियर के आखिरी समय में फॉर्म अच्छा नहीं था. इन दोनों के आखिरी मैच के बाद अवॉर्ड सेरेमनी के दौरान धोनी से एक ही सवाल पूछा गया था. उनसे पूछा गया कि सहवाग के बारे में क्या कहेंगे. इसी तरह एक मैच के बाद धोनी से पूछा गया कि जहीर के बारे में क्या कहेंगे. धोनी के जवाब दोनों ही सवालों पर एक जैसे थे. बस नाम जुदा थे. उन्होंने जो कहा था उसका लब्बोलुआब यह है, ‘वे (सहवाग या जहीर) हमारी टीम के अहम खिलाड़ी हैं. उनमें अभी बहुत क्रिकेट बाकी है. वे बेशकीमती हैं. अनुभवी होने के नाते वे टीम के लिए उपयोगी तो हैं ही, जूनियर खिलाड़ियों को उसने सीखने को भी काफी मिल रहा है.’ इत्तफाक से इसके बाद सहवाग और जहीर टीम इंडिया में नहीं चुने गए. वे चोटिल नहीं थे, पर धोनी की टीम में फिट नहीं हो पा रहे थे. जहीर हों या सहवाग, कप्तान धोनी का इशारा ना समझ पाने के कारण टीम में वापसी के लिए कुछ महीने प्रयास करते रहे और अंतत: संन्यास ले लिया.

आज हम जब धोनी के इन निर्णयों की समीक्षा करने बैठते हैं, तो कह सकते हैं कि अगर धोनी समय रहते गांगुली, द्रविड़, जैसों को टीम से बाहर ना करते तो विश्व कप भी ना जीतते. इसलिए यह फैसला सही था. लेकिन अगर हम 2008 में लौटकर गांगुली की अपमानजनक विदाई के बारे में सोचें तो बतौर प्रशंसक बुरा लगता है. गुरु ग्रेग की सरपरस्ती वाली टीम से कभी गांगुली की विदाई हो गई थी. यह तो गांगुली की जिद थी कि वे ना सिर्फ टीम में वापसी करते हैं, बल्कि अपने करियर के इस इंटरवेल के बाद ही पहला दोहरा शतक बनाते हैं. लेकिन देश के इस महान कप्तान को वनडे में सम्मानजनक विदाई भी नहीं मिलती. इसी प्रकार जुलाई-अगस्त 2011 में इंग्लैंड में भारत की ओर से सबसे अधिक रन बनाने वाले और तीन शतक बनाने वाले राहुल द्रविड़ को ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ नाकाम होने के बाद यह भरोसा नहीं होता कि वे टीम में फिर चुने जाएंगे और वे अचानक संन्यास की घोषणा कर देते हैं.

एमएस धोनी इकलौते भारतीय कप्तान कप्तान हैं जिन्होंने आईसीसी वर्ल्ड कप, टी20 वर्ल्ड कप और चैंपियंस ट्रॉफी अपने नाम की है. धोनी ने साल 2007 में देश को टी20 चैंपियन बनाया. साल 2011 में भारत की जमीन पर ही देश को वर्ल्ड कप दिलाया वहीं 2013 में चैंपियंस ट्रॉफी भी जीती.


रॉबिन उथप्पा के बारे में भी धोनी का बयान काबिलेगौर है. ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ एक सीरीज में जब रॉबिन अच्छा प्रदर्शन कर रहे थे तो धोनी ने उनके बारे में कहा था कि वे ऐसे शानदार खिलाड़ी हैं, कि उनसे चाहे तो ओपनिंग करा लो, चाहे तीसरे नंबर पर भेज दो या छठे-सातवें नंबर पर. वे खुद को हर जगह फिट कर लेते हैं और टीम को जिताते हैं. धोनी के इस बयान के करीब छह महीने बाद रॉबिन टीम इंडिया से बाहर हो चुके थे. संभवत: इसकी एक वजह यह भी थी कि उनकी भूमिका इतनी बार बदली गई कि वे ‘कन्फ्यूज’ हो गए. यह सिलसिला युवराज सिंह से लेकर हरभजन सिंह तक जाता है.

अब जबकि धोनी संन्यास ले चुके हैं तो बात आज के आधार पर ही होनी चाहिए. धोनी जब टी20 वर्ल्ड कप जीतने के बाद भविष्य के लिए अपनी टीम बना रहे थे, तो उनके सामने 2011 का विश्व कप था. वे हर हाल में देश को यह ट्रॉफी दिलाना चाहते थे. वे एक साधक की भांति अपने लक्ष्य के प्रति एकाग्र थे. शांतचित्त कप्तान के दिमाग में वह तस्वीर स्पष्ट थी कि उन्हें क्या चाहिए और क्या नहीं. आपको धोनी पर आधारित मूवी याद होगी, जिसमें उनकी भूमिका सुशांत सिंह ने निभाई है. फिल्म के एक दृश्य में ‘धोनी’ चयनकर्ताओं से साफ कहते हैं कि उन्हें कमजोर फील्डर टीम में नहीं चाहिए, भले ही वे अच्छे बल्लेबाज हों. यह इशारा सौरव गांगुली की ओर था, जो अपेक्षाकृत सुस्त फील्डर माने जाते थे. आज धोनी के नाम तीन आईसीसी ट्रॉफी हैं. वे भारत के सबसे कामयाब कप्तान रहे. साफ है कि उनके ये सारे फैसले सही साबित हुए.

धोनी का इंटरनेशनल करियर किसी भी खिलाड़ी, कप्तान या आम आदमी के लिए भी सबक है कि आपको अपने निर्णय खुलकर, बिना किसी दबाव के लेने चाहिए और जब ऐसा कर लिया तो उस पर डटे रहना चाहिए. और कोई भी ऐसा तभी कर सकता है जब वह धोनी के तरह ठंडे दिमाग से फैसले ले और उसकी आंखों में भविष्य की तस्वीर साफ हो. ऐसे फैसले कभी-कभी क्रूर कहे जा सकते हैं, क्योंकि इनमें भावनाओं की कोई जगह नहीं होती. जैसे कि धोनी ने जब सहवाग-जहीर जैसे क्रिकेटर को टीम से बाहर करने का फैसला लिया होगा तो यह नहीं सोचा कि बरसों देश की सेवा करने वाले इन क्रिकेटरों की मैदान से विदाई हो तो अच्छे ढंग से  हो. इसकी बजाय उन्होंने शायद सोचा कि अब ये सुपरस्टार क्रिकेटर उनकी टीम और योजना के लायक नहीं है. इसलिए उन्हें घर बैठना चाहिए. दूसरों को मौका मिलना चाहिए. धोनी ऐसा करते वक्त अपनी टीम के बारे में सोच रहे थे. हालांकि, बतौर कप्तान वे चाहते तो टीम से बाहर हो रहे साथी खिलाड़ी को व्यक्तिगत रूप से मैसेज दे सकते थे. तब शायद वीवीएस लक्ष्मण को टीम में वापसी की कोशिश की बात करने के कुछ घंटे बाद संन्यास नहीं लेना पड़ता. शायद कप्तान द्वारा अपने साथियों को सही समय पर सही मैसेज ना देना भी क्रूरता है और खासकर जब यह किसी के करियर का सवाल हो.
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