रणजी ट्रॉफी से पहले लगा सदमा, टैक्सी चलाकर क्रिकेटर बनाने वाले पिता की हुई मौत, अब टीम को फाइनल में पहुंचाया

बंगाल के तेज गेंदबाज मुकेश कुमार

बंगाल के तेज गेंदबाज मुकेश कुमार

बंगाल (Bengal) के रणजी ट्रॉफी के फाइनल में पहुंचने के सफर में उनके तेज गेंदबाज मुकेश कुमार (Mukesh Kumar) का अहम रोल रहा है

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बंगाल. एक ऐसा खिलाड़ी जिसे क्रिकेट खेलने के लिए अपना घर छोड़ना पड़ा, जिसके पास क्रिकेट खेलने के जूते खरीदने के पैसे नहीं थे, जो कुपोषित था, जिसके घर का खर्च उसके पिता टैक्सी चलाकर चलाया करते थे, जिसे अपनी हर सफलता से पहले रिजेक्शन का सामना करना पड़ा आज वही खिलाड़ी अपनी टीम का सबसे बड़ा हीरो है. आज उसी खिलाड़ी की हर जगह वाहवाही हो रही है, आज हर कोई उसकी सफलता का राज जानना चाहता है. हम बात कर रहे है बंगाल (Bengal) के तेज गेंदबाज मुकेश कुमार (Mukesh Kumar) की जिन्होंने रणजी ट्रॉफी (Ranji Trophy) के इस सीजन में अपने शानदार प्रदर्शन से अपनी टीम को 13 साल बाद टूर्नामेंट के फाइनल में पहुंचाया.



पिता की मेहनत और अपने भरोसे से किया मुश्किलों का सामना

छह साल पहले रणजी में डेब्यू करने वाले मुकेश कुमार ने अपने इस सफर में तमाम तरह की परेशानियों का सामना किया लेकिन कभी खुद पर से अपना भरोसा कम नहीं होने दिया. मुकेश कुमार (Mukesh Kumar)  मूल रूप से बिहार के रहने वाले हैं लेकिन साल 2000 में उनके क्रिकेट के सपने को पूरा करने के लिए उन्हें कोलकाता ले आए. यहां पर उन्होंने टैक्सी चलाने का काम शुरू किया ताकी घर का खर्च उठा सके. घर पर आर्थिक परेशानी को मुकेश ने अपने क्रिकेट खेलने के सपने के बीच नहीं आने दिया हालांकि करियर में कोई भी सफलता उन्हें आसानी से नहीं मिली.



वकार यूनुस ने कर दिया था रिजेक्ट
2014 में पाकिस्तान (Pakistan) के तेज गेंदबाज वकार यूनुस (Waqar Younis) की देखरेख में क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ बंगाल (CAB) ने अपने विजन-2020 के तहत ट्रायल्स का आयोजन किया था. मुकेश तब यूनुस को प्रभावित नहीं कर सके थे और रिजेक्ट हो गए थे. हालांकि बंगाल के बोलिंग कोच राणादेब बोस (Ranadeb Bose) ने  वकार से अपील की थी कि वह मुकेश को मौका दें. उस समय मुकेश के पास जूते खरीदने के भी पैसे नहीं थे और वह काफी कुपोषित भी थे. इसके बावजूद बोस और कैब ने मिलकर उनकी मदद की. बोस ने उन्हें जूते खरीद कर दिए साथ ही वह कैब के कैंप में रहकर ट्रेनिंग करने लगे.





पहले रणजी मैच में था गुरु की साख बचाने का दबाव



इसके अगले ही साल मुकेश ने हरियाणा के खिलाफ पहला रणजी मुकाबला खेला था लेकिन यह मौका भी आसानी से नहीं मिला. एक इंटरव्यू के दौरान बंगाल के बोलिंग कोच राणादेव बोस ने बताया था कि उन्होंने साल 2015 में तत्कालीन सीएबी (CAB) अध्यक्ष सौरभ गांगुली (Sourav Ganguly) की मर्जी के बगैर हरियाणा के खिलाफ मुकेश को डेब्यू कराया था. गांगुली का तर्क था कि मुकेश फर्स्ट डीविजन टीम में भी नहीं है तो आखिर वह रणजी कैसे खेल सकते हैं. हालांकि बोस ने मुकेश (Mukesh Kumar) पर अपना भरोसा दिखाते हुए मौका देने कि बात कही.

अपने पहले ही रणजी मैच में मुकेश पर अपने गुरु की साख बचाने का भी दबाव था. हालांकि उस मुकाबले में उन्होंने सहवाग का विकेट हासिल किया और बोस के भरोसे को सही साबित किया. मुकेश ने तबसे अब तक 21 फर्स्ट क्लास मैचों में 2.82 के इकनॉमी रेट से 78 विकेट लिए हैं. वहीं वह आठ लिस्ट ए मैच खेल चुके हैं जिसमें उनके नाम पांच विकेट है.



बेटे की कामयाबी नहीं देख पाए पिता

मुकेश ने इस रणजी सीजन में अब तक का अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया है. 26 साल का यह तेज गेंदबाज नौ मैचों में अब तक 2.72 की इकनॉमी रेट से 30 विकेट ले चुका है. उनके और साथी तेज गेंदबाज आकाशदीप की जोड़ी ने पूरे सीजन में विरोधी बल्लेबाजों को टिकने का मौका नहीं दिया. वहीं सेमीफाइनल के अहम मुकाबले में भी वह टीम के हीरो साबित हुए. मुकेश ने 61 रन देकर छह विकेट चटकाए जिससे 352 रन के लक्ष्य का पीछा करते हुए कर्नाटक की टीम दूसरी पारी में 55.3 ओवर में 177 रन पर ढेर हो गई, और बंगाल फाइनल में पहुंचा. मुकेश ने पहली पारी में भी दो विकेट हासिल किए थे.  हालांकि इस खुशी के बीच मुकेश को केवल एक ही अफसोस है कि पूरी जिंदगी उनके सपने के लिए मेहनत करने वाले उनके पिता आज उनकी कामयाबी का जश्न देखने के लिए मौजूद नहीं है. इस सीजन की शुरुआत से पहले दिसंबर में मुकेश के पिता का ब्रेन हैमरेज के कारण मौत हो गई थी.



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