1983 वर्ल्ड कप जीत की कहानी वाकई में पूरी फिल्मी ही है!

1983 वर्ल्ड कप जीत की कहानी वाकई में पूरी फिल्मी ही है!
1983 वर्ल्ड कप जीत की कहानी फिल्मी है

1983 World Cup Win: भारत की पहली वर्ल्ड कप जीत को 37 साल हुए पूरे, फाइनल में वेस्टइंडीज को दी थी मात

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नई दिल्ली. इस साल फरवरी के महीने में कपिल देव के घर मेरी उनसे मुलाकात हुई. अप्रैल के महीने में 1983 वर्ल्ड की जीत पर फिल्म रिलीज़ होने का उन्हें बेसब्री से इंतज़ार था. लेकिन, कोरोना जैसी महामारी के चलते अब ये फिल्म कब रिलीज़ होगी उस पर फिलहाल कुछ भी कहना मुमिकन नहीं है. लेकिन, कपिल देव से बातचीत के दौरान उनकी आंखों में चमक देखना अब भी अभूतपूर्व नज़ारा रहा. तमाम उपलब्धियों के बावजूद कपिल देव (Kapil Dev) के लिए 25 जून 1983 मानो हमेशा के लिए ठहरने वाला लम्हा है. टीम के सारे सदस्यों का अपना एक ख़ास व्हाट्सएप ग्रुप है जिसकी कमान सुनील गावस्कर के हाथों में हैं.

1983 वर्ल्ड कप जीतने के बारे में सोचा तक नहीं!
नई पीढ़ी को शायद कभी ये अंदाज़ा भी नहीं हो सकता है कि 1983 (1983 World Cup Win) से पहले भारतीय क्रिकेट के हालात क्या थे. 25 जून को वेस्टइंडीज़ के ख़िलाफ़ फाइनल में सबसे ज़्यादा रन बनाने वाले कृष्णामाचारी श्रीकांत ने मुझे बताया कि उस टूर्नामेंट में तो वो फैन-ब्वॉय की तरह खेलने गए थे. श्रीकांत ने बताया कि कैसे वो विवियन रिचर्ड्स के सामने खुद का परिचय करके हाथ मिलाने गये जैसे कोई फैन करता हो. आखिर, ऐसा हो भी क्यों ना? उस मैच से पहले वेस्टइंडीज़ को हराने के बारें में कोई सोच ही नहीं सकता था. वर्ल्ड कप में तो कम से कम नहीं. सिर्फ एक शख्स को छोड़कर. वो शख़्स थे कप्तान कपिल देव. वर्ल्ड कप से ठीक पहले कपिल देव की टीम ने कैरेबियाई टीम को बर्बिस में उनके घरेलू मैदान पर टीम इंडिया ने हराया था. ये वन-डे क्रिकेट में अपने घर पर वेस्टइंडीज़ की सिर्फ दूसरी हार थी.

सिर्फ कपिल को था जीत का भरोसा
बस, यही वो जीत थी जिसने 1983 वर्ल्ड कप का बीज बोया. उसके बाद टूर्नामेंट के पहले मैच में भी भारत ने जब वेस्ट-इंडीज़ को मात दी तो आलोचकों ने उन्हें गंभीरता से नहीं लिया. आखिर, लगातार 2 वर्ल्ड कप जीतकर आने वाले कैरेबियाई टीम की ये सिर्फ पहली हार थी जबकि इस टूर्नामेंट से पहले भारतीय टीम ने 40 मैचों में से 28 मैच गंवाये थे और वर्ल्ड कप में इकलौती जीत सिर्फ एसोसिएट मुल्क ईस्ट अफ्रीका के ख़िलाफ़ ही रही थी. लेकिन, कपिल देव को इन आंकड़ों और उदासीन इतिहास से कोई फर्क नहीं पड़ता था. आखिर, वो भारत के पहले ऐसे गेंदबाज़ थे जिन्होंने तेज़ गेंदबाज़ी के मोर्चे पर खुद को वर्ल्ड-क्लास साबित किया था. वहीं अब वो अपनी टीम के साथ पूरी दुनिया को साबित करने का सपना देख रहे थे.



गेंदबाज़ी के साथ-साथ कपिल देव ने अपनी आक्रामक बल्लेबाज़ी से एक अलग पहचान दिखाई. टूर्नामेंट के 25 सबसे कामयाब बल्लेबाज़ों में से सिर्फ कपिल देव ही ऐसे थे जिनका स्ट्राइक रेट 100 से बेहतर था और रिचर्ड्स भी उनसे पीछे ही रहे थे! कपिल देव के अलावा उनके साथी मदन लाल और रॉजर बिन्नी को भला कोई कैसे भूल सकता है. पहली बार वर्ल्ड के इतिहास में ये कमाल हुआ (और अब तक इस दोहराया नहीं जा सकता है)जब सबसे ज़्यादा विकेट लेने वाले टॉप 3 गेंदबाज़ों में से दो भारतीय रहें हों!

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मदन लाल की वो गेंद जिसने भारत की जीत तय की!
मदन लाल तो मानो विव रिचर्ड्स (Viv Richards) को आउट करके भारतीय क्रिकेट में हमेशा के लिए अमर हो गये. खुद, मदनलाल ने मुझे एक बार कहा था कि जितनी गेंदें मैंनेअपने करियर में फेंकी(लगभग 10 हज़ार) नहीं है उससे ज़्यादा लेख तो अकेले सिर्फ रिचर्ड्स को आउट करने वाली गेंद पर लिखी जा चुकी है. मदन लाल बेहद ईमानदार और बेबाक बोलतें हैं. आज भी उनका कहना है कि लोग अक्सर ये दलील देतें है कि जब तक आप सपने देखोगे नहीं आप उसे पूरा नहीं कर सकते लेकिन हकीकत तो यही है कि उन्होंने कभी भी वर्ल्ड कप जीतने का सपना भी नहीं देखा था! और कमोबेश ऐसी ही कहानी उस टीम के लगभग हर सदस्य की है और इसलिए हैरानी नहीं होती है कि जब 1983 की जीत पर एक फिल्म बन चुकी है क्योंकि वाकई में वो हकीकत या सपना नहीं बल्कि एक पूरी फिल्मी कहानी ही है.
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