कप्तानी में 'दादा' थे सौरव गांगुली, बीसीसीआई में नहीं दिखी दादागीरी!

कप्तानी में 'दादा' थे सौरव गांगुली, बीसीसीआई में नहीं दिखी दादागीरी!
सौरव गांगुली बीसीसीआई अध्यक्ष के तौर पर कुछ खास नहीं कर सके.

सौरव गांगुली (Sourav Ganguly) को बीसीसीआई की कुर्सी पर बैठे 10 महीने का वक्त हो गया है, लेकिन वो अब भी इस पर बरकरार रहना चाहते हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: August 8, 2020, 8:58 PM IST
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नई दिल्ली. जुलाई महीने में ही सौरव गांगुली (Sourav Ganguly) का कार्यकाल बीसीसीआई अध्यक्ष के तौर पर आधिकारिक तौर पर ख़त्म हो गया.  गांगुली को अब भी ‘थर्ड अंपायर’ यानी सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतज़ार है ताकि उनका कार्यकाल और आगे चलता रहे. वैसे गांगुली और उनके साथी को थर्ड अंपायर के पास जाने की ज़रूरत ही नहीं थी, क्योंकि लंबे समय तक अदालती मुकदमे के बाद बीसीसीआई का नया संविधान बना था, जिसके मुताबिक गांगुली को करीब 10 महीने बाद कुर्सी खाली करनी थी. अगर कुर्सी से चिपकने की ये लालसा किसी और में दिखती तो हैरानी ना होती, लेकिन गागुंली का ऐसा रवैया देखकर मायूसी ज़रूर होती है.

महान भारतीय कप्तानों में आता है गांगुली का नाम बी सीसीआई अध्यक्ष के तौर पर नाकाम हैं गांगुली?

बीसीसीआई अध्यक्ष बनने के साथ ही दादा (Sourav Ganguly) ने ऐलान किया कि उनकी पहली प्राथमिकता फर्स्ट क्लास क्रिकेट हैं, जहां से टीम इंडिया को कोहली, रोहित और धोनी जैसे खिलाड़ी मिलते हैं. फर्स्ट क्लास के सिस्टम में बदलाव लाना और खिलाड़ियों को सैंट्रल कांट्रैक्ट मुहैया करना उनका सबसे पहला काम होगा. लेकिन, ऐसा कहने के बाद अगल 10 महीने तक दादा सोते ही रहे. दिलचस्प बात ये रही कि पंजाब और उत्तराखंड जैसे राज्यों ने अपनी तरफ से इस दिशा में सकारात्मक पहल की.



अध्यक्ष बनने से पहले गांगुली कभी परोक्ष और कभी अपरोक्ष तरीके से लगातार विनोद राय की अध्यक्षता वाली क्रिकेट संचालक कमेटी की आलोचना करते रहे. उनकी शैली पर सवाल उठाते रहे और कहते रहे कि तीन सालों के दौरान भारतीय क्रिकेट का बहुत नुकसान हुआ. लेकिन, खुद दादा का जब कार्यकाल ख़त्म हुआ तो बोर्ड के पास ना तो पेशेवर सीईओ है और ना सीएफओ. नैशनल क्रिकेट एकेडमी के चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर का पद खाली पड़ा हुआ है तो चलते चलते पूराने साथी सबा करीम ने भी क्रिकेट ऑपरेशंस मैनेजर के तौर पर इस्तीफा दे दिया है. पुरुष खिलाड़ियों के लिए नई चयन समिति के गठन में भी दादा (Sourav Ganguly) का रवैया बेहद ढीला-ढाला रहा. दादा बयान देते रहे कि बस कुछ दिन के अंदर ही एमएसके प्रसाद और गगन खोडा का विकल्प चुन लिया जाएगा और क्रिकेट सलाहकार समिति को बनाते-बनाते उनके दो महीने बीत गए! महिला चयनसमिति तो अपना कार्यकाल टी20 वर्ल्ड कप के बाद ही ख़त्म कर चुकी है लेकिन अब तक कोई नई नियुक्ति नहीं हो पाई.
दादा ने सिर्फ डे-नाइट टेस्ट कराया!
कुल मिलाकर देखा जाए तो सौरव गांगुली (Sourav Ganguly) के करीब 1 साल के कार्यकाल को बीसीसीआई के इतिहास में सिर्फ डे नाइट टेस्ट आयोजित करने के अलावा किसी और योगदान के लिए याद नहीं किया जा सकता है. हैरानी की बात है जिस शख्स ने अपने जुझारू रवैये से भारतीय क्रिकेट की तस्वीर बदल कर रख दी वो बीसीसीआई अध्यक्ष बनने के बाद खेल और खिलाड़ियों के लिए कुछ ख़ास नहीं कर पाया. उल्टे, एक और पूर्व बीसीसीआई अध्यक्ष शशांक मनोहर की ही तरह दादा ने भी बीसीसीआई के ज़रिए आईसीसी अध्यक्ष बनने का सपना भी देखा. हालांकि, उन्होंने अपनी तरफ से खुलकर कुछ नहीं कहा लेकिन बोर्ड की अंदरुनी राजनीति ने इस बात की तरफ इशारा किया कि दादा अपने उस विकल्प को भी छोड़ना नहीं चाहते हैं.

हितों के टकराव के मामले में दादा सवालों के घेरे में आए!
हितों के टकराव के मुद्दे पर फिर से दादा सवालों के घेरे में आये. बीसीसीआई का करार mydream11 से है, जिसके लिए बोर्ड को करोड़ों की कमाई होती है, लेकिन लेकिन अध्यक्ष के तौर पर गांगुली विरोधी कंपनी myteam11 के ब्रैंड एंबेसडर बने हुए हैं. ऐसा सिर्फ और सिर्फ दबंग दादा ही कर सकते हैं! इतना ही नहीं पिछले साल दिल्ली कैपिटल के साथ सलाहकार के तौर पर जुड़ने वाले गांगुली इस साल बोर्ड अध्यक्ष के तौर पर JSW Cement (Jindal Steel Works) के लिए एंबेसडर बन गए और सवाल उठाये जाने पर साफ साफ नकार दिया कि हितों के टकराव का मामला नहीं बनता है.

अब पाठक के तौर पर आप खुद तय करें कि जिस कंपनी के मालिक दिल्ली कैपिटल्स के साथ जुड़ें हों और JSW Cement के साथ भी और तब भी ये हितों का टकराव नहीं बनता है या नहीं ? बात यहां गांगुली की निजी निष्ठा और ईमानदारी को कटघरे में लाने की कोशिश नहीं है बल्कि spirit of constitution की है , जिसका सम्मान निश्चित तौर पर गांगुली कर सकते थे. एक खिलाड़ी और कप्तान के तौर पर गांगुली की शख्सियत और उनके काम ने अपने आलोचकों को भी मुरीद बनाया लेकिन, अफसोस की बात है कि अध्यक्ष के तौर पर ‘दादा कप्तान’ की असली दादागीरी बीसीसीआई में नहीं दिखी.
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