1971 की जीत के 50 साल होने का शानदार जश्न मनाने की जरूरत, तब विंडीज-इंग्लैंड को पहली बार हराया था

सुनील गावस्कर ने 50 साल पहले टेस्ट क्रिकेट में डेब्यू किया था  (फोटो-PTI)

सुनील गावस्कर ने 50 साल पहले टेस्ट क्रिकेट में डेब्यू किया था (फोटो-PTI)

सुनील गावस्कर को बीसीसीआई द्वारा अहमदाबाद में चौथे टेस्ट में उनकी 50 वीं वर्षगांठ पर सम्मानित किया गया था, यह बेहद जरूरी था. हालांकि यह और बेहतर हो सकता था.

  • News18Hindi
  • Last Updated: March 12, 2021, 1:14 PM IST
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नई दिल्ली. ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड पर टेस्ट सीरीज जीत के साथ पिछले 4-5 महीने भारत के लिए बेहद शानदार रहे हैं.1971 के बाद यह सबसे अच्छा सीजन रहा है जब अजीत वाडेकर की टीम ने वेस्टइंडीज और इंग्लैंड को लगातार हराया था. यह भारतीय क्रिकेट में पुनर्जागरण की शुरुआत थी. पचास साल एक लंबा समय है. ज्यादातर भारतीय क्रिकेट प्रेमी शायद तब पैदा भी नहीं हुए थे जब 1971 में लगातार दो सीरीज में जीत मिली थी.

रेडियो था हमारा सहारा

मेरे जैसे पुराने लोगों के लिए, उस दौर से गुज़रना अपने आप में एक जादू था, जिसे कभी नहीं भुलाया जा सकता. वह समय काफी अलग था. सूचना युग में हम आज रहते हैं, सब कुछ तुरंत पता होता है. टेक्नोलॉजी की वजह से आज रियल टाइम मैच देखना संभव है. इसके अलावा डिजिटल प्लेटफॉर्म्स जैसे मोबाइल पर मैच देखे जा सकते हैं. 1971 में हमारे लिए सूचना के केवल दो स्रोत रेडियो और समाचार पत्र उपलब्ध थे. बॉम्बे में अभी तक टेलीविज़न नहीं आया था और इंटरनेट निश्चित रूप से किसी की कल्पना में भी नहीं था. क्रिकेट प्रेमियों को 24 घंटे में निकलने वाले अखबार की जगह रेडियो को वरीयता देना पसंद था. यह वह साल था जिसमें टोनी कोजियर, जॉन अरलट औऱ ब्रायन जॉनस्टन का पता चला. उनकी आवाज ने मैदान के अंदर चल रहे मैचों की ज्वलंत तस्वीर क्रिकेट प्रेमियों में मन में बसा दिया.

पटौदी की जगह वाडेकर को मिली कप्तानी
वेस्टइंडीज का दौरा लंबा और विवादास्पद था. विजय मर्चेंट ने चयनकर्ताओं के अध्यक्ष के रूप में अपने वोट का इस्तेमाल करते हुए मंसूर अली खान पटौदी को कप्तानी से हटा दिया. इस फैसले ने क्रिकेट जगत के अंदर और बाहर दोनों जगह आक्रोश पैदा किया क्योंकि पटौदी काफी चहेते थे और उनकी छवि हीरो जैसी थी. पटौदी के स्थान पर कप्तान के रूप में अजीत वाडेकर चुने गए जिनका घरेलू क्रिकेट में बॉम्बे के लिए एक अलग रिकॉर्ड था. वाडेकर 1966 से भारत के लिए खेल रहे थे. वाडेकर ने भारतीय टीम को अनुभव और युवाओं का अच्छा मिश्रण दिया था. हालांकि पटौदी ने दौरे पर जाने से मना कर दिया लेकिन टीम में एमएल जयसिम्हा, दिलीप सरदेसाई और सलीम दुर्रानी जैसे वरिष्ठ खिलाड़ी मौजूद थे. लेकिन चर्चा टीम में शामिल जूनियरों की थी.

21 साल के गावस्कर को पहली बार मिली जगह

कैच 'एम यंग' भारतीय क्रिकेट को नया रूप देने के लिए मर्चेंट का नारा था, जिसके कारण 1969 में गुंडप्पा विश्वनाथ, अशोक मांकड़ और एकनाथ सोलकर को भारत के लिए खेलने के लिए चुना गया था. 1970-71 के वेस्टइंडीज दौरे के लिए 21 साल का दादर का रहने वाला खिलाड़ी सुनील गावस्कर चुना गया. गावस्कर स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालयों के रनों का अंबार लगाने वाले खिलाड़ी थे और बिना किसी परेशानी के वह फर्स्ट क्लास क्रिकेट खेलने लगे. हालांकि क्रिकेट इतिहास उन होनहार युवाओं की कहानियों से भरा पड़ा है, जिन्होंने समय से पहले फजीहत कर ली थी. इन युवाओं का कौशल बेहतरीन था लेकिन वो मिले मौकों को नहीं भुना पाए. हालांकि गावस्कर ने इस मौके को खूबसूरत तरीके से भुनाया. फिट नहीं होने की वजह से वह पहला टेस्ट नहीं खेल पाए लेकिन दूसरे टेस्ट में डेब्यू करने वाले गावस्कर ने दोनों पारियों में अर्धशतक जड़ा. उन्होंने डेब्यू सीरीज में ही 774 रन बनाए जो आधी सदी के बाद ही एक रिकॉर्ड है.



1971 के खिलाड़ियों को सम्मानित करना जरूरी

गावस्कर को बीसीसीआई द्वारा अहमदाबाद में चौथे टेस्ट में उनकी 50 वीं वर्षगांठ पर सम्मानित किया गया था, यह बेहद जरूरी था. हालांकि यह और बेहतर हो सकता था. बल्लेबाजी के जादूगर गावस्कर का क्रिकेट में योगदान एक महाकाव्य की तरह है. क्या गावस्कर का सम्मान अधिक सम्मोहक हो सकता था. दूसरा टीम और खिलाड़ियों से संबंधित है जिन्होंने 1971 को भारतीय क्रिकेट के लिए इतना खास और यादगार बना दिया. क्या उन्हें सम्मानित करने की कोई योजना है?

मैं आलोचना करने के लिए तैयार हूं. ये समय पूरे दुनिया में खेल संघों के लिए कठिन समय है. बीसीसीआई को इस बात का श्रेय दिया जाना चाहिए कि उसने आईपीएल, इंग्लैंड के खिलाफ सीरीज को संभव बनाया. फिर भी 1971 की शानदार जीत को याद करने के मामले में अग्रिम योजना और कुछ अलग करने की जरूरत थी. गावस्कर के सम्मान पर बात करते हैं तो इंग्लैंड का दौरा सुनिश्चित होने के बाद इसे और अधिक विस्तृत बनाने के लिए कुछ सोचा जा सकता था. यदि उनके साथियों को साथ लाना संभव नहीं था तो वर्तमान कप्तान विराट कोहली और उनकी टीम को शामिल क्यों नहीं शामिल किया जा सकता था? अंततः कोहली बल्लेबाजी के उस महान विरासत को संभाल रहे हैं जो उन्हें सचिन तेंदुलकर मिली थी और सचिन ने इसे गावस्कर से पाया था. जब बायो-बबल के चलते लाइव इवेंट्स पर रोक है तो बीसीसीआई डॉक्यूमेंट्री, प्रासंगिक फुटेज और इंटरव्यू के साथ गावस्कर की महानता को आधुनिक पीढ़ी के सामने परोस सकता था.

लेकिन मेरा तर्क गावस्कर तक ही सीमित नहीं है. वह स्पष्ट रूप से 1971 में वेस्टइंडीज के दौरे सबसे ज्याद प्रभाव छोड़ने वाले खिलाड़ी थे. हालांकि टीम के खेल में व्यक्तिगत योगदान का महत्व इसकी समयबद्धता से आता है जो दशकों बाद भी इसे याद करने, स्वीकार करने और उत्सव के योग्य बनाता है. उदाहरण के लिए सलीम दुर्रानी के लिए 1971 में वेस्टइंडीज का दौरा ज्यादा सफल नहीं था लेकिन इंग्लैंड के खिलाफ उन्होंने जबरदस्त प्रदर्शन किया था. इसी प्रकार, 1971 में कैरेबियाई दौरे में भारत की सफलता दिलीप सरदेसाई के 642 रनों के योगदान, एकनाथ सोलकर द्वारा खेली गई कई जुझारू पारी, बिशन बेदी और एस वेंकटराघवन की स्पिन गेंदबाजी के बिना असंभव थी.

बीएस चंद्रशेखर ने इंग्लैंड के खिलाफ किया कमाल

जब आप उस साल इंग्लैंड के खिलाफ दूसरी यादगार श्रृंखला में उतरते हैं, तो अन्य नायक उभर कर सामने आते हैं, लेकिन विशेष रूप से अपरंपरागत लेग स्पिनर बीएस चंद्रशेखर का नाम प्रमुख है. उनकी करिश्माई स्पैल (6/38) ने रे इलिंगवर्थ की एशेज विजेता टीम को तबाह कर दिया, जो उस समय दुनिया में सर्वश्रेष्ठ थी. 1971 के कुछ प्रमुख खिलाड़ियों ने दुर्भाग्य से हमें छोड़ दिया है, इसमें जयसिम्हा, सरदेसाई, मांकड़, सोलकर, वाडेकर प्रमुख हैं. यह हास्यास्पद और दर्दनाक दोनों है कि उनके अनुभवों का विस्तृत रूप से दस्तावेजीकरण नहीं किया गया है. यह दशकों पहले किया जाना चाहिए था. फिर भी सब खोया नहीं है. दुर्रानी 86 वर्ष के हैं लेकिन उनकी स्मृति अभी भी बरकरार है. मैं 1971 में मिली दोहरी सीरीज जीत में कुछ और नाम जोड़ूंगा जो भविष्य की पीढ़ियों के लिए विरासत बनाने के लिए अभी भी मौजूद हैं. इसमें इरापल्ली प्रसन्ना, बिशन सिंह बेदी, वेंकट, फारुख इंजीनियर, आबिद अली, अब्बास अली बेग, गुंडप्पा विश्वनाथ, जयंतीलाल और गावस्कर को नहीं भूलना चाहिए.

महानतम बल्लेबाजों में शुमार हैं गावस्कर

16 साल बाद जब गावस्कर ने अपना बल्ला टांगा तब वह 10 हजार रन बनाने वाले पहले क्रिकेटर बन गए थे. उन्होंने डॉन ब्रैडमैन (29 शतक) को पीछे छोड़ते हुए 34 शतकों के साथ अपना सफर खत्म किया. वह ओपनिंग करने वाले दुनिया के महानतम बल्लेबाजों में से एक थे. भारतीय संदर्भ में वह न केवल रिकॉर्ड ब्रेकिंग रन मशीन थे बल्कि कई पीढ़ियों के लिए एक प्रेरणा थे. वास्तव में उनका प्रभाव क्रिकेट के इतर भी रहा और उन्होंने जीवन के हर क्षेत्र में प्रासंगिकता पाई.

1971 में जो हुआ उसका पुनर्निर्माण करना अभी भी संभव है और यह जानना जरूरी है कि भारतीय क्रिकेट में वह साल इतना महत्वपूर्ण क्यों है. यह आधुनिक प्रशंसकों, इतिहासकारों (और मैं आधुनिक खिलाड़ियों को भी कहने की हिम्मत करता हूं) को समझने में मदद करेगा कि 50 साल पहले क्या हासिल हुआ था. बता दें कि 1971 से पहले भारत ने कभी भी वेस्टइंडीज के खिलाफ एक भी टेस्ट नहीं जीता था. वेस्टइंडीज के पिछले दौरे पर उन्हें 5-0 से करारी शिकस्त मिली थी. 19171 से पहले भारत ने इंग्लैंड को सिर्फ घरेलू सरजमीं पर हराया था. इंग्लैंड के पिछले दौरे पर भारतीय टीम को 3-0 से हार का सामना करना पड़ा था. 1971 में सीरीज जीत न केवल अप्रत्याशित थी, बल्कि भारतीय क्रिकेट के लिए दवा के रूप में थी. इस जीत ने क्रिकेट की दुनिया को भारत में देखने का तरीका बदल दिया. इससे जरूरी बात यह रही है कि इस जीत ने भारतीयों के खुद को देखने के तरीके को बदल दिया.
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