कब भारतीय खिलाड़ियों के मानसिक स्वास्थ्य का ख्याल रखना शुरू करेगी बीसीसीआई?

कब भारतीय खिलाड़ियों के मानसिक स्वास्थ्य का ख्याल रखना शुरू करेगी बीसीसीआई?
कब टीम इंडिया के मानसिक स्वास्थ्य का ख्याल रखेगी बीसीसीआई?

क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया की तरह 'Mental Health and Wellbeing Lead जैसा ‘क्रांतिकारी कदम’ उठा पाएगी बीसीसीआई?

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नई दिल्ली. कोरोना काल में आर्थिक संकट से जूझने वाली क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया ने पिछले कुछ महीनों में अपने कई स्टॉफ की या तो छंटनी की या फिर बहुतों की सैलेरी में कटौती की. ऐसे में जब पिछले हफ्ते उन्होंने 'Mental Health and Wellbeing Lead’ को लेकर विज्ञापन निकाला तो क्रिकेट जगत में इस पर हैरानी ना होकर प्रशंसा हुई. ये दिखाता है कि मानसिक स्वास्थ को लेकर क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया कितना गंभीर है और तमाम आर्थिक मुश्किलों के बावजूद अपने खिलाड़ियों की बेहतरी के लिए इस फैसले में हिचक नहीं रहा है. दरअसल, 'Mental Health and Wellbeing Lead’ या फिर MHWL एक ऐसा पद होने जाने वाला है जिसकी क्रिकेट जगत में कोई मिसाल नहीं है. ये शख्स क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया के Head of sports science and medicine Alex Kountouris को रिपोर्ट करेगा. आपको बता दें कि ऑस्ट्रेलिया की पुरुष और महिला क्रिकेट टीम के साथ पहले से ही नियमित साइकोलॉजिस्ट जुड़ें हुए हैं. ऐसे में 'Mental Health and Wellbeing Lead’ का मुख्य काम एक डायरेक्टर की तरह होगा जो राष्ट्रीय टीमों के साइकोलोजिस्ट के साथ नियमित संपर्क में तो रहेगा ही साथ ही हर स्तर में कैसे खिलाड़ियों के मानसिक स्वास्थ को बेहतर रखने के लिए ठोस कदम उठायें जायें उस पर भी विचार करेगा.

बीसीसीआई रखेगी साइकोलॉजिस्ट?
भारत जैसे देश में जहां मानसिक बीमारियों के बारे में बात तक करना लोगों को अच्छा नहीं लगता हैं वहां बीसीसीआई क्या क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया की तरह ऐसे ही क्रांतिकारी फैसला ले सकती है? टीम इंडिया के पूर्व स्पिनर मनिंदर सिंह ने मुझे निजी बात-चीत में बताया कि शायद बीसीसीआई के लिए एकदम से क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया के नक्श-कदम पर चलना मुश्किल हो लेकिन राष्ट्रीय और जूनियर लेवल की टीमों के साथ नियमित साइकोलॉजिस्ट तो ज़रुर जुड़े होने चाहिए. 55 साल के मनिंदर खुद भुक्तभोगी रहें हैं. उनका कहना है कि उनके दौर में शिवरामाकृष्णन, सदानंद विश्वनाथ, चेतन शर्मा औऱ ना जाने कितने खिलाड़ी अपनी प्रतिभा के साथ इसलिए न्याय नहीं कर पाये क्योंकि उन्हें मानसिक तौर पर मज़बूत बनाने वाला या मुश्किल वक्त में संभालने वाला कोई नहीं था. अगर ऐसा होता तो मनिंदर का मानना है कि उन्होंने 35 से ज़्यादा टेस्ट और 59 से ज़्यादा वन-डे खेले होते.

खिलाड़ियों पर होता है बहुत ज्यादा दबाव
क्लीनिकल साइकेटेरिस्ट डॉक्टर अमूल्य भारत राजधानी दिल्ली में पिछले एक दशक से अपनी बेहद कामयाब क्लीनिक चलातें हैं. उनके पास कई बड़े एथलीट भी आतें हैं. डॉक्टर भारत का कहना है कि भारतीय टीम में जब कोई खिलाड़ी चुना जाता है तो उसके लिए ये the Indian UPSC, IIT या Medical entrance testsमें कामयब होने जैसा अनुभव होता है. ऐसे में खुद से और अपने चाहने वालों से उम्मीद का दबाव भी बढ़ता है. उनका कहना है कि तनाव का Sociological perspective और medical perspective अलग अलग बातें हैं. डॉक्टर भारत की सलाह है कि नियमित तौर पर टीमों के साथ साइकोलोजिस्ट तो होने ही चाहिए साथ ही अगर ज़रुरत पड़े(खिलाड़ी विशेष को लेकर) तो साइकैटरिस्ट से भी संपर्क ज़रुरी है. जितनी जल्दी किसी भी समस्या से अवगत होंगे उसका हल भी उतनी ही जल्दी निकलेगा. खिलाड़ियों के लिए दबाव उनके लिए स्वभाविक खेल का हिस्सा होता जाता है. लेकिन, इस पर नज़र बनाये रखने की ज़रुरत होती है.


मध्य-प्रदेश के मौजूदा रणजी कोच और पूर्व टेस्ट खिलाड़ी चंद्रकांत पंडित ने मुझे बताया कि आप 'Mental Health and Wellbeing Lead’ को नाम चाहे कुछ भी दे दें काम तो एक ही होगा. खिलाड़ियों के मानसिक स्वास्थ की बेहतरी. उन्हें मानसिक तौर पर मज़बूत बनाये रखना.
बीसीसीआई के आला अधिकारी इस मुद्दे पर खुलकर बोलने से हिचकिचा रहे हैं लेकिन नाम ना लेने की शर्त पर एक बड़े अधिकारी ने कहा कि- हमारे देश में सपोर्ट सिस्टम ऑस्ट्रेलिया और पश्चिमी देशों की तुलना में काफी बेहतर है. ऐसे में हमें एकदम क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया जैसे मॉडल की पूरी नकल करने की ज़रुरत नहीं है.  डॉ भारत जैसे एक्सपर्ट ये भी दलील देतें हैं कि जिस तरह से हर खिलाड़ी को कौशल क्षमता अलग होती है ठीक उसी तरह से मानसिक तौर पर उनकी मज़बूती या प्रतिकूल हालात में खुद को संभालने की ताकत.

कब जागेगी बीसीसीआई?
मसलन, एमएस धोनी जैसे खिलाड़ी को हार या जीत से कभी कोई फर्क नहीं पड़ता है. ना वो जीत का बहुत जश्न मनाते हैं और ना ही हार पर उदासी. ठीक उनके उल्टे, विराट कोहली जीत के समय काफी ऊर्जावान दिखते हैं लेकिन लगातार हार से परेशान होकर बेहद झुंझला जाते हैं. टीम के लिए वो लीडर के तौर पर हार के समय बोझ बन जाते हैं. ये उदाहरण दिखाता है कि बेहद कामयाब खिलाड़ी को भी अपने मानसिक टैम्प्रामेंट पर लगातार काम करने की ज़रुरत होती है.

घरेलू क्रिकेट में करीब 2 दशक से ज़्यादा वक्त कोचिंग में बिताने वाले पंडित का मानना है कि अब मौजूदा दौर में सोशल मीडिया के चलते एक अलग तरह की समस्या पैदा हुई है. आईपीएल की चकाचौंध और करोड़ों की कमाई कई बार ग्रामीण परिवेश से आने वाले खिलाड़ियों को भटका देती है. ऐसे में ये ज़रुरी है कि उन्हें हर वक्त संभालने और देखने वाला कोई ना कोई होना चाहिए. किसी एक ज़िम्मेदारी हो जो खिलाड़ियों को मानसिक तौर पर मोटिवेट करें, उन्हें निराशा से दूर रखें और साथ ही उन्हें मज़बूत भी बनायें.  क्या सौरव गांगुली इस सुझाव पर ग़ौर फरमायेंगे या क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया की ही तरह तब तक इंतज़ार करेंगे जब भारत में भी ग्लैन मैक्सवैल जैसा कोई खिलाड़ी सामने आये और कहे कि उसे मानसिक तौर पर खेल से ऐसी परेशानी होती है कि वो ब्रेक लेना चाहता है.
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