WTC 2021, Final : ड्यूक गेंद से होगा फाइनल, बॉल का हर राज जानिए जो विराट के लिए भी 'पहेली'

WTC Final: क्यों ड्यूक गेंद अलग है? जानिये खासियत (PC-AFP)

WTC Final: क्यों ड्यूक गेंद अलग है? जानिये खासियत (PC-AFP)

वर्ल्ड टेस्ट चैंपियनशिप का फाइनल (WTC Final) 18 जून को होगा. भारत और न्यूजीलैंड के बीच होने वाला ये खिताबी मुकाबला ड्यूक गेंद (Duke Ball) से साउथैंप्टन में खेला जाएगा.

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नई दिल्ली. भारत और न्यूजीलैंड के बीच वर्ल्ड टेस्ट चैंपियनशिप का फाइनल (WTC Final) साउथैंप्टन में 18 जून से होगा. इस खिताबी मुकाबले के लिए शुक्रवार को आईसीसी ने कुछ नियमों का ऐलान किया. साथ ही आईसीसी ने ये भी बताया कि फाइनल मैच ड्यूक गेंद (Duke Ball) से होगा. इंग्लैंड में सभी मुकाबलों में ड्यूक गेंद इस्तेमाल होती है जिससे ना न्यूजीलैंड अपने घर पर खेलती है और ना ही टीम इंडिया.

न्यूजीलैंड में कूकाबूरा गेंद का इस्तेमाल होता है वहीं भारत में एसजी गेंद इस्तेमाल होती है. ऐसे में दोनों ही टीमों के लिए ड्यूक गेंद एक अलग चुनौती है. ड्यूक गेंद की क्या खासियत है? ये कैसे दूसरी गेंदों से अलग होती है? आखिर क्यों इस गेंद से गेंदबाजों को ज्यादा फायदा होता है?

ड्यूक गेंद क्यों कूकाबूरा और एसजी से अलग?


  1. ड्यूक गेंद की पहली खासियत ये होती है कि इसकी सीम पर ज्यादा धागे होते हैं और वो उठी होती है. कूकाबूरा और एसजी गेंदों की सीम जहां जल्दी फटने लगती है वहीं दूसरी ओर ड्यूक की गेंद के साथ ऐसा नहीं होता.

  2. ड्यूक गेंद का आकार कूकाबूरा और एसजी से छोटा होता है. यही वजह है कि ये गेंद हाथ में बिलकुल सही बैठती है. इस गेंद का वजन भी दूसरी गेंदों से कम होता है इसलिए ये हवा की दिशा में ज्यादा बहती है. मतलब सिर्फ पिच ही नहीं गेंदबाज हवा के मुताबिक भी ड्यूक गेंद का इस्तेमाल करते हैं.

  3. ड्यूक की सीम की हाथ से सिलाई होती है. यही वजह है कि ये गेंद काफी स्विंग होती है. 80 ओवर के बाद भी इसका आकार नहीं बदलता. दूसरी ओर कूकाबूरा और एसजी गेंदों की सिलाई मशीन से होती है.



  4. ड्यूक गेंदें ज्यादा समय तक सख्त बनी रहती हैं वहीं भारत में इस्तेमाल होने वाली एसजी गेंद 12 से 15 ओवर में नरम पड़ने लगती हैं. इससे गेंदबाजों को नुकसान होता है. दुनिया का हर गेंदबाज इसीलिए ड्यूक गेंदों को पसंद करता है.


ड्यूक गेंद भारत के लिए समस्या क्यों?

ड्यूक गेंद भारतीय टीम के लिए इसलिए बड़ी समस्या है क्योंकि टीम इंडिया के बल्लेबाज स्विंग के सामने संघर्ष करते दिखाई देते हैं. वैसे तो स्विंग के सामने दुनिया के हर बल्लेबाज को दिक्कत पेश आती है लेकिन चूंकि भारतीय बल्लेबाज टेस्ट क्रिकेट एसजी गेंद से खेलते हैं इसलिए उन्हें ड्यूक के खिलाफ तालमेल बैठाने में थोड़ी समस्या होती है.

साल 2014 में जब विराट कोहली इंग्लैंड दौरे पर आए थे तो उनके बल्ले से एक अर्धशतक तक नहीं निकला था. विराट कोहली ने 5 टेस्ट मैचों में महज 13.50 की औसत से 134 रन ही बनाए थे. जेम्स एंडरसन की आउट स्विंग ने विराट कोहली को काफी परेशान किया था. हालांकि उस वक्त विराट कोहली की तकनीक में भी थोड़ी खामी थी लेकिन ये बात माननी ही होगी कि उसमें ड्यूक गेंदों का भी अहम रोल था. बता दें वर्ल्ड टेस्ट सीरीज से पहले आईपीएल के दौरान भी विराट कोहली और दूसरे भारतीय बल्लेबाजों ने ड्यूक गेंदों से नेट्स पर अभ्यास किया है. लेकिन अहम बात ये है कि ड्यूक गेंदें मैच के दिन की पिच और मौसम के मुताबिक अपने रंग दिखाती हैं. मतलब ड्यूक बॉल के खिलाफ हर बल्लेबाज को अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करना होता है, नहीं तो खेल खत्म समझिये.

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