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पढ़ें: क्रिकेट में हॉट स्पॉट तकनीक की पूरी कहानी

क्रिकेट के दिग्गज हॉट-स्पॉट पर बहस कर ही रहे हैं लेकिन आम फैन इसके बारे में क्या जानता है। आईए आपको बताते हैं हॉट स्पॉट की पूरी कहानी।

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    नई दिल्ली। मौजूदा समय में हॉट स्पॉट को सबसे नई और उन्नत तकनीक माना जाता है। लेकिन इस पर आने वाले खर्च और इसकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़े होने के बाद ये कटघरे में है। क्या है हॉट स्पॉट की तकनीक और क्या इसका भी कोई विकल्प है। हॉट स्पॉट तकनीक पर खास रिपोर्ट।

    ऑस्ट्रेलियाई मीडिया ने एशेज में हॉट-स्पॉट के साथ छेड़खानी का आरोप लगाकर नई बहस छेड़ दी है। क्रिकेट के दिग्गज तो इस पर बहस कर ही रहे हैं लेकिन आम फैन इसके बारे में क्या जानता है। आईए आपको बताते हैं हॉट स्पॉट की पूरी कहानी।

    हॉट स्पॉट तस्वीर लेनी की एक ऐसी प्रणाली है, जिसमें इंफ्रा रेड तरंगों का इस्तेमाल होता है। इससे पता चलता है कि बल्ले या पैड से गेंद टकराई या नहीं?, इसके लिए मैदान पर दो कैमरे लगातार तस्वीरें कैद करते रहते हैं।

    जैसे ही किसी तस्वीर में संदेह होता है इंफ्रारेड इमेज को जांचा जाता है। इस तस्वीर में वो हिस्सा चमकने लगता है, जिससे गेंद टकराती है। इसके पीछे की तकनीक ये है कि जहां गेंद टकराती है वो हिस्सा घर्षण कुछ गर्म हो जाता है। कम्प्यूटर ब्लैक एंड व्हाइट निगेटिव फ्रेम के विश्लेषण के जरिए गेंद की सही जगह समझी जाती है।

    हॉट स्पॉट तकनीक की खोज सेना में टैंक और जेट फाइटर का पता लगाने के लिए किया गया। सबसे पहले फ्रांस में इसकी खोज की गई। टीवी में इसका इस्तेमाल सबसे पहले ऑस्ट्रेलिया की खेल कंपनी ने किया। स्निकोमीटर की खोज भी इसी कंपनी ने की।

    इसके बाद क्रिकेट में भी इसका प्रयोग शुरू हो गया। 2006-07 एशेज में हॉट स्पॉट का पहली बार प्रयोग हुआ। लेकिन जितना बड़ी तकनीक उतना ही खर्चा। हॉट स्पॉट भी काफी महंगा सौदा है। हॉट स्पॉट के दो कैमरों के लिए प्रति दिन 5.68 लाख रुपए का खर्चा आता है। अगर 4 कैमरे प्रयोग किए जाएं तो ये खर्चा 9.48 लाख रुपए तक पहुंच जाता है। हॉट स्पॉट पर आने वाला खर्च भी विवाद की बड़ी वजह है। फिलहाल ये पैसा मैच प्रसारणकर्ता कंपनी खर्च करती है। न तो बीसीसीआई इसका खर्चा उठानी चाहती है और न आईसीसी।

    हॉट स्पॉट का फायदा ये है कि इससे सस्ती तकनीक स्निकोमीटर में सिर्फ आवाज से पहचान होती है। ध्वनि तरंगों से पता लगाया जाता है कि गेंद ने बल्ले का किनारा लिया है या नहीं। ऐसे में कभी पैड से लगने पर भी स्निकोमीटर पर प्रभाव पड़ जाता है और गलती होने की संभावना बनी रहती है। हॉट स्पॉट के विकल्प के रूप में रियल टाइम स्निको तकनीक को देखा जा रहा है। इस तकनीक में 10 सेकेंड के भीतर नतीजा आ जाता है।

    साफ है कि विज्ञान की अपनी सीमा है, लेकिन क्रिकेट में तकनीक को लगातार बढ़ावा दिया जा रहा है। आईसीसी अपने फैसले पर अड़ी है। जब तक क्रिकेट खेलने वाले देशों के बीच कोई बड़ा समझौता नहीं हो जाता। मैदान पर ऐसी गलतियां होती रहेंगी।

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