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Exclusive: जेवलिन थ्रो खिलाड़ी नीरज चोपड़ा की अद्भुत कहानी

विमल कुमार@Vimalwa | News18Hindi
Updated: January 7, 2019, 12:30 PM IST

नीरज चोपड़ा ने एशियन गेम्स 2018 में 88.06 मीटर का राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाते हुए गोल्ड जीता था.

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  • Last Updated: January 7, 2019, 12:30 PM IST
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नीरज चोपड़ा भारतीय ट्रैक और फील्ड एथलीट हैं. वह जेवलिन थ्रो यानी भाला फेंक विधा में हिस्सा लेते हैं. वह 2018 के एशियाई खेलों में भारत का प्रतिनिधित्व करते नजर आए थे. इस दौरान उन्होंने 88.06 मीटर का राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाते हुए गोल्ड जीता था. इसके अलावा उन्होंने 2018 कॉमनवेल्थ गेम्स में भी गोल्ड मेडल जीता था. अब उनका निशाना 2020 ओलंपिक गेम्स में गोल्ड लाने पर है. वह इस बड़े टूर्नामेंट के लिए कैसे तैयारियां कर रहे हैं और इन सालों में उन्होंने किस तरह से अपने आपको इस बड़े स्तर पर स्थापित किया. इसको लेकर उन्होंने एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में न्यूज़18 के स्पोर्ट्स एडिटर विमल कुमार से बातचीत की.

नीरज आपकी वज‍ह से जेवलिन थ्रो को नई पहचान मिली है.
जेवलिन थ्रो को पहचान मिलना काफी अच्‍छा लगता है. शुरुआती दौर में जब लोग पूछते थे कि क्‍या करते हो तब मैं कहता था कि स्‍पोर्ट्स में हूं. लोगों का सवाल आता था कि कौन सा स्‍पोर्ट? फिर जेवलिन के बारे में लोगों को काफी कुछ बताना पड़ता था. अब इस खेल को लोग पहचानने लगे हैं और उन्‍हें पता है कि कॉमनवेल्‍थ और एशियन गेम्‍स में इस खेल में गोल्‍ड मेडल आया है. यही नहीं, अब ना सिर्फ भारत से जेवलिन थ्रो के युवा खिलाड़ी निकलकर आ रहे हैं बल्कि जगह-जगह इस खेल की ट्रेनिंग भी कर रहे हैं.

आपके बारे में कहा जाता है कि या तो आप गोल्‍ड मेडल लेते हैं या फिर मेडल ही नहीं लेते. क्‍या यह आपकी जिद है.

ऐसा तो कुछ भी नहीं है. हां, बस ट्रेनिंग को लेकर जिद जरूर रहती कि यह अच्‍छी से अच्‍छी होनी चाहिए. इसके अलावा जो भी कोच करवाते हैं उसे पूरा करने की कोशिश करता हूं. रही बात मेडल की तो रंग चाहे कोई भी हो मेडल तो मेडल होता है. बाकी दिन पर डिपेंड करता है कि हम उस समय कैसा करते हैं. अगर अच्‍छा करते हैं तो गोल्‍ड, सिल्‍वर या फिर ब्रॉन्‍ज भी आ सकता है वरना मेडल की रेस भी बाहर हो जाते हैं.

जेवलिन थ्रो का खेल काफी महंगा है. ग्रामीण पृष्‍ठभूमि से होने के कारण इसे कैसे मैनेज करते हैं.
आप सही कह रहे हैं. यह बहुत महंगा स्‍पोर्ट है, लेकिन लोगों को इसके बारे में पता नहीं है. मैंने पिछले तीन चार साल में कोई जेवलिन नहीं खरीदी है. हां, ट्रेनिंग के लिए जरूर इसे खरीदा और स्‍पॉन्‍सशिप से मेरी सारी मुश्किलों का आसान कर दिया.महंगा खेल होने के कारण परिवार वालों ने कभी आपको मना नहीं किया?
सच कहूं तो जब मैंने जेवलिन थ्रो शुरू किया था तो उनको इसके बारे में किसी को कुछ पता ही नहीं था. वैसे भी हरियाणा में कुश्‍ती, कबड्डी और बॉक्सिंग ही ज्‍यादा फेमस हैं और इधर ही युवाओं का झुकाव रहता है. लेकिन जब जेवलिन थ्रो में मेडल आने लगे तो घर वाले भी जानने लगे और लोग भी बात करने लगे. यही नहीं, न्‍यूज़ पेपर वगैराह में भी जगह मिली तो सबने इसे स्‍वीकार कर लिया.

आपके कोच आपकी मेहनत देखकर कहते हैं कि यह चौंकाने वाली बात होगी कि टोक्‍यो ओलंपिक में गोल्‍ड मेडल ना आए.

एशियन गेम्‍स में मैंने ओलंपिक लेवल का प्रदर्शन किया था. अभी टोक्‍यो ओलंपिक में दो साल का समय बाकी है और कोच अच्‍छी ट्रेनिंग करवा रहे हैं. मैं देश को गोल्‍ड मेडल दिलाने की हर संभव कोशिश करूंगा.

स्‍पोर्ट्स के अलावा कैटरीना कैफ जैसे कई बॉलीवुड स्‍टार्स आपके फैन हैं. इसे कैसे देखते हैं.
वैसे तो हमारा अधिकांश वक्‍त ग्राउंड पर ही गुजरता है, लेकिन जब बॉलीवुड स्‍टार्स आपको मेडल जीतने पर बधाई देते हैं तो यह उत्‍साह बढ़ाने वाली बात होती है. बहुत अच्‍छा लगता है.

आपने शुरुआती दौर में काफी स्‍ट्रगल किया है. अब जब युवा खिलाड़ी आपसे मिलते हैं तो वो क्‍या बात करते हैं.

सबको पता है कि मैं छोटे से गांव से निकलकर यहां पहुंचा हूं. जो भी युवा आता है वो पूछता है कि हमें आगे बढ़ने के लिए क्‍या करना चाहिए. मैं उन्‍हें अपनी बातों और अन्‍य मदद के सहारे उन्‍हें मोटिवेट करने की पूरी कोशिश करता हूं.

मौजूदा दौर में टेक्‍नोलॉजी का बोलबाला है. आज कोई भी और कहीं भी यू-ट्यूब पर वीडियो देखकर सीखता है. मेरा मतलब है कि आज कोई भी बहाने नहीं बना सकता. हां, यू-ट्यूब से सीखा जा सकता है और इसमें शहर के बच्‍चों को बहुत फायदा है. अगर गांव की बात करें तो वहां आज भी नेटवर्क की समस्‍या देखने को मिलती है. वैसे खेले में अब समय से छोटे गांव से ही अच्‍छे खिलाड़ी निकलकर आ रहे हैं.

अगर कोई बच्‍चा जेवलिन थ्रो का नीरज चोपड़ा बनना चाहे तो वो क्‍या करे. खुद पर विश्‍वास और कड़ी मेहनत से कोई भी लक्ष्‍य हासिल किया जा सकता है. अच्‍छी मेहनत कभी बेकार नहीं जाती.

इस वक्‍त हर कोई टोक्‍यो ओलंपिक की बात कर रहा है. आपके हीरो सचिन तेंदुलकर और सुशील कुमार ने खासा नाम कमाया है. क्‍या इन सब बातों से कोई दबाव आता है?
जब कोई हमसे उम्‍मीद रखता है तो अच्‍छा लगता है. इसमें दबाव वाली कोई बात नहीं है. आखिर भारतवासी हमसे मेडल चाहते हैं. हम मेडल के लिए अपनी पूरी ईमानदारी के साथ कड़ी मेहनत करते हैं.

क्‍या पिछले एक साल में आपकी जिंदगी बदली है?
हां, बदलाव तो आया है. सीधी सी बात है कि हर कोई चढ़ते सूरज को सलाम करता है. आजकल मेडल आ रहे हैं तो हर कोई खुश है और तारीफ कर रहा है. लेकिन अपने यहां सबसे बड़ी दिक्‍कत ये है कि अगर कोई खिलाड़ी खराब प्रदर्शन करे तो लोग बहुत जल्‍दी भूल जाते हैं. मेरी कोशिश रहती है कि सबके साथ संबंध अच्‍छे रहें, क्‍योंकि खेल में कभी भी उतार-चढ़ाव आ सकते हैं.

जेवलिन थ्रो में आपका मुश्किल वक्‍त?
शुरुआती दौर में ना सिर्फ स्‍टेडियम बल्कि पैसों, जूतों और जेवलिन के लिए मुश्किलों का सामना करना पड़ा था. मुझे ट्रेनिंग के लिए पानीपत जाना पड़ा था. मेरे इस सफर में मेरे सीनियर जयवीर और छोटे अंकल सुरेंदर का अहम योगदान रहा है.

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First published: January 1, 2019, 3:45 PM IST
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