लाइव टीवी

पीके बनर्जी: भूखे पेट ट्रेनिंग, 15 साल की उम्र में नौकरी और फिर ओलिंपिक में वो ऐतिहासिक गोल

News18Hindi
Updated: March 20, 2020, 3:03 PM IST
पीके बनर्जी: भूखे पेट ट्रेनिंग, 15 साल की उम्र में नौकरी और फिर ओलिंपिक में वो ऐतिहासिक गोल
पीके बनर्जी ने शुक्रवार को आखिरी सांस ली (फाइल फोटो)

पीके बनर्जी (PK Banerjee) ने ओलिंपिक में फ्रांस जैसी टीम के खिलाफ गोल दागकर मुकाबला ड्रॉ करवा दिया था

  • News18Hindi
  • Last Updated: March 20, 2020, 3:03 PM IST
  • Share this:
नई दिल्‍ली. भारत के दिग्‍गज फुटबॉलर प्रदीप कुमार बनर्जी (Pradip Kumar Banerjee) में शुक्रवार को दुनिया को अलविदा कह दिया. वह 83 साल के थे. लंबे समय से बीमार चल रहे. भारत के स्‍टार खिलाड़ी ने शुक्रवार को आखिरी सांस ली. बनर्जी केे इस दुनिया को छोड़ते ही भारतीय फुटबॉल के एक अध्‍याय का भी समापन हो गया. 23 जून 1936 को ब्रिटिश इंडिया में बंगाल के जलपाईगुड़ी में जन्‍में बनर्जी अपने आप में भारतीय फुटबॉल का एक पूरा अध्‍याय थे. उन्‍होंने इस खेल के सुनहरे समय को जिया. उसमें अपना योगदान दिया.
बनर्जी का ओलिंपिक में फ्रांस जैसी टीम के खिलाफ दागा गया वह गोल इतिहास में दर्ज हो गया. बनर्जी ने 20 साल की उम्र में ओलिंपिक में हिस्‍सा लिया था, 1956 मेलबर्न ओलिंपिक उनका पहला ओलिंपिक था. इसके बाद 1960 में रोम ओलिंपिक में भारतीय टीम की कमान संभालते हुए उन्‍होंने फ्रांस के खिलाफ
एक मात्र गोल करके मुकाबला 1-1 से ड्रॉ करवा दिया. तीन बार एशियन गेम्‍स (Asian Games) में भारत का प्रतिनिधित्‍व किया, जिसमें से दो बाद गोल्‍ड पर कब्‍जा किया. हालांकि बनर्जी के लिए यह सब कुछ हासिल करना इतना आसान नहीं था. इसके लिए उन्‍होंंने भूखे पेट ट्रेनिंग की. पिता के गुजरने के बाद 15 साल की उम्र में नौकरी कर परिवार को संभाला.

कम वेतन में बड़े परिवार को संभालते थे



पीके बनर्जी (PK Banerjee) के पिता प्रोवत बनर्जी सरकारी नौकरी करते थे, मगर उनका वेतन काफी कम था. इस वेतन में वह अपने परिवार को भी सही से नहीं पाल पाते थे. परिवार में उनकी पत्‍नी, सात बच्‍चे, मां- पिता, चाचा- चाची और भाई - बहन थे. पीके भाई- बहनों में सबसे बड़े थे. हालांकि इस स्थिति में भी उन्‍होंने अपनी पढ़ाई और खेल को जारी रखा. इसी बीच उनका परिवार कलकत्‍ता आ गया.

पिता की मौत के बाद आया मुश्किल समय
पीके बनर्जी की जिंदगी में संघर्ष तो शुरुआत से ही था, मगर पिता की मौत के बाद उनके ऊपर जिम्‍मेदारियां भी आ गई. ऐसी परिस्थिति में भी उन्‍होंने फुटबॉल नहीं छोड़ा. वह अक्‍सर खाली पेट ही  ट्रेनिंग करते और खेलते,  मगर इसी खेल की वजह से उन्‍हें 15 साल की उम्र में अपनी पहली नौकरी मिल गई. 135 रुपये के वेतन पर भारतीय केबल कंपनी में उनकी नौकरी लग गई. इस नौकरी से उनके परिवार को काफी मदद मिली. इसके बाद 1953 में वह भारतीय रेलवे में टिकट कलेक्‍टर बन गए, जहां उन्‍हें पिछली नौकरी के मुकाबले दो रुपये ज्‍यादा मिलने लगे.

1955 में किया भारत के लिए पर्दापण
इन सबके बीच पीके बनर्जी (PK Banerjee) ने खेल नहीं छोड़ा. वह अपने खेल से नेशनल चयनकर्ताओं को प्रभावित तो कर ही चुके थे. इसके बाद 1954 में उन्‍होंने आर्यन और एक साल बाद ईस्‍टर्न रेलवे जॉइन कर ली. बनर्जी की कप्‍तानी में ईस्‍टर्न रेलवे 1958 में कलकत्‍ता फुटबॉल लीग चैंपियन बनी. मगर इससे पहले बनर्जी ने 1955 में ढाका में हुए टूर्नामेंट में भारत की ओर से डेब्‍यू कर लिया था और यही से उनका ओलिंपिक में ऐतिहासिक गोल दागने का सफर शुरू हुआ.

 

खेल जगत से आई दुखद खबर, नहीं रहे दिग्गज भारतीय फुटबॉलर पीके बनर्जी

माइक टायसन का बड़ा बयान, कहा-जीना ज्यादा मुश्किल, मौत का इंतजार कर रहा हूं

News18 Hindi पर सबसे पहले Hindi News पढ़ने के लिए हमें यूट्यूब, फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो करें. देखिए फुटबॉल से जुड़ी लेटेस्ट खबरें.

First published: March 20, 2020, 2:54 PM IST
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर