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फिल्मी पर्दा: करियर शुरू होने के 2 साल बाद लगी गोली, फिर ऐसे संदीप सिंह बने 'सूरमा'

फिल्मी पर्दा: करियर शुरू होने के 2 साल बाद लगी गोली, फिर ऐसे संदीप सिंह बने 'सूरमा'

संदीप सिंह ने ओलिंपिक क्‍वालिफायर्स में हैट्रिक समेत कुल 5 गोल किए थे (फाइल फोटो)

संदीप सिंह ने ओलिंपिक क्‍वालिफायर्स में हैट्रिक समेत कुल 5 गोल किए थे (फाइल फोटो)

फिल्‍म सूरमा (Soorma) एक ऐसे हॉकी खिलाड़ी की कहानी है, जिसका करियर शुरू होने के दो साल बाद एक हादसे के कारण खत्‍म होने की कगार पर पहुंच गया था, मगर इस खिलाड़ी ने दिखा दिया कि खिलाड़ी का मतलब क्‍या होता

    नई दिल्‍ली. करीब दो साल पहले बड़े पर्दे आई फिल्‍म सूरमा (Soorma) ने काफी अच्‍छी कमाई थी. शाद अली की यह फिल्‍म लोगों के दिल में उतर गई. हो भी क्‍यों ना, फिल्‍म बनी ही ऐसी शख्सियत पर है, जिसने सपना पूरा करना सिखाया. सूरमा भारत के दिग्‍गज हॉकी खिलाड़ी संदीप सिंह (Sandeep Singh) की जिंदगी पर आधारित है. जिनका करियर शुरू होने के दो साल बाद ही एक हादसे के कारण लगभग खत्‍म होने की कगार पर पहुंच गया था. मगर दुनिया के बेहतरीन ड्रैग फ्लिकर में से एक संदीप ने न सिर्फ व्‍हीलचेयर को अपनी जिंदगी मानने से इनकार किया, बल्कि मैदान पर वापसी की, देश के लिए खेले. टीम की अगुआई की, बड़ा खिताब दिलाया.

    फिल्‍म सूरमा में दलजीत दोसांझ संदीप सिंह की भूमिका में हैं. उनके अलावा अंगद बेदी और तापसी पन्‍नू ने भी इस फिल्‍म ने जान डाल दी. फिल्‍म शुरू होती है एक हॉकी सेंटर से, जहां युवा संदीप सिंह और उनके बड़े भाई बिक्रम सिंह को कोच करतार सिंह ने सजा दी. इस सजा के बाद संदीप ने हॉकी छोड़ने का फैसला लिया. मगर बड़े होने के बाद प्‍यार की वजह से उन्‍होंने हॉकी खेलना फिर से शुरू किया और फिर इसके बाद की कहानी पूर्व भारतीय कप्‍तान संदीप सिंह की उस जिंदगी को बताती है, जिससे दुनिया का हर खिलाड़ी प्रेरणा लेता है.

    ऐसा रहा संदीप सिंह का करियर

    27 फरवरी 1986 को हरियाणा में जन्‍में हॉकी खिलाड़ी संदीप सिंह भारतीय टीम की अगुआई भी कर चुके हैं. उन्‍होंने 2004 में सुल्‍तान अजलान शाह कप से इंटरनेशनल स्‍तर पर डेब्‍यू किया था. इसके बाद 2009 में टीम की कमान उनके हाथों में आ गई. उनकी कप्‍तानी में भारत ने 2009 में मलेशिया को हराकर 13 साल के लंबे इंतजार के बाद सुल्‍तान अजलान शाह कप जीता था. वह इस टूर्नामेंट के टॉप गोल स्‍कोरर रहे थे.
    भारत को 8 साल बाद 2012 ओलिंपिक का टिकट दिलवाने में संदीप की भूमिका अहम रही ओलिंपिक क्‍वालिफायर्स के फाइनल्‍स में भारत ने फ्रांस को 9-2 से हराया. इस मुकाबले में संदीप सिंह ने हैट्रिक समेत कुल पांच गोल दागे थे. संदीप सिंह के लिए ओलिंपिक तक का सफर तय इतना आसान नहीं था. डेब्‍यू करने के बाद उनकी लड़ाई किसी और से नहीं बल्कि खुद की व्‍हीलचेयर से थी, जो उनकी जिंदगी बनने की कोशिश कर रही थी, मगर संदीप सिंह तो खिलाड़ी है और एक खिलाड़ी को बैठना कभी पसंद नहीं. खिलाड़ी को तो दौड़ना पसंद है. मिट्टी, पसीने से सना शरीर पसंद है. मैदान पर कुछ पाने के लिए कोशिश करना पसंद है. देश के लिए खेलना पसंद है. संदीप सिंह ने व्‍हीलचेयर को अपनी जिंदगी का अहम हिस्‍सा बनाने से इनकार कर दिया और इसके बाद उन्‍होंने जो कर दिखाया, उसे पूरी दुनिया ने देखा. यहां तक कि फिल्‍म मेकर्स को भी अपनी कहानी को बड़े पर्दे पर दिखाने के लिए मजबूर कर दिया. हार कर जीतने की कहानी और सपनों को पूरा करने का तरीका 2013 में हर किसी ने बड़े पर्दे पर देखा.

    गोली लगने से व्‍हीलचेयर पर आ गए थे

    सबसे बड़े ड्रैग फ्लिकर माने जाने वाले संदीप सिंह डेब्‍यू के दो साल बाद ही व्‍हीलचेयर पर आ गए थे. यह खिलाड़ी 2006 में हुए एक हादसे के बाद के अपने पैरों पर ही सही से खड़ा नहीं हो पा रहा था. दरअरसल इंटरनेशनल डेब्‍यू करने के दो साल बाद 2006 में वर्ल्‍ड कप के लिए नेशनल टीम से जुड़ने के लिए संदीप ट्रेन से सफर कर रहे थे. दो दिन बाद ही संदीप को वर्ल्‍ड कप के लिए अफ्रीका रवाना होना था, मगर उससे पहले ही ट्रेन में गलती से चली बंदूक की गोली उन्‍हें लग गई, जिस वजह से वह पैरालाइज हो गए और एक साल तक व्‍हीलचेयर पर रहे थे.उस समय संदीप सिर्फ 20 साल के थे. इस हादसे के बाद न सिर्फ संदीप ठीक हुए, बल्कि उन्‍होंने खुद को टीम इंडिया में फिर से स्‍थापित किया और 2010 में वर्ल्‍ड कप खेले.

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    Tags: Hockey, Sandeep singh, Soorma, Sports news

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