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बलबीर सिंह यादें-1 : 'तिरंगा ऊपर जा रहा था, कोई आंख ऐसी नहीं थी, जो भीगी हुई न हो'

बलबीर सिंह यादें-1 : 'तिरंगा ऊपर जा रहा था, कोई आंख ऐसी नहीं थी, जो भीगी हुई न हो'

एक बार उन्होंने भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी को कहा था कि आपकी जीत से मेरी सेहत बेहतर होती है. ओलिंपिक में लगातार तीन स्वर्ण पदक जीतने वाली भारतीय हॉकी टीम का हिस्सा रहे 96 साल के बलबीर सीनियर का सोमवार को मोहाली में निधन हो गया.

एक बार उन्होंने भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी को कहा था कि आपकी जीत से मेरी सेहत बेहतर होती है. ओलिंपिक में लगातार तीन स्वर्ण पदक जीतने वाली भारतीय हॉकी टीम का हिस्सा रहे 96 साल के बलबीर सीनियर का सोमवार को मोहाली में निधन हो गया.

बलबीर सिंह सीनियर (Balbir Singh Sr.) नहीं रहे. भारतीय हॉकी (Indian Hockey) का एक और सूरज अस्त हो गया.

नई दिल्ली. बात करीब 18-19 साल पहले की है. दिल्ली के शिवाजी स्टेडियम (Shivaji Stadium) में नेहरू हॉकी टूर्नामेंट (Nehru Hockey Tournament) खेला जा रहा था. वीआईपी एरिया से एक बुजुर्ग सरदार जी उठे. गहरे लाल रंग का पटका, हल्की आसमानी शर्ट... ‘मैं मिलकर आता हूं...’ कहते हुए वो सीढ़ियों से उतरे. चलकर नहीं, दौड़ते हुए. दौड़ते हुए ही वापस आए और सीढ़ियां चढ़ीं, ‘बेटा, मेरी शताब्दी है, मैं निकलता हूं.’ इसके बाद वो दौड़ते हुए ही सीढ़ियां उतरे और स्टेडियम से बाहर निकल गए. उन बुजुर्ग की उम्र थी 75 साल. वो शताब्दी एक्सप्रेस से अपने घर चंडीगढ़ जाने की बात कर रहे थे.

वो बुजुर्ग बलबीर सिंह (Balbir Singh Sr.) थे. हॉकी में बलबीर सिंह नाम के छह खिलाड़ी भारत के लिए खेले हैं, इसलिए उन्हें बलबीर सिंह सीनियर कहा जाता है. आजाद भारत के बेहतरीन फॉरवर्ड. शायद आजाद भारत के महानतम. भारत के ट्रिपल ओलिंपिक (Olympic) गोल्ड मेडलिस्ट. आजाद भारत को पहला ओलिंपिक गोल्ड दिलाने वाली हॉकी टीम के सदस्य. उसके बाद 1952 और 1956 में भी उन्होंने देश को गोल्ड दिलाया. भारतीय हॉकी के सुनहरे इतिहास का वह युग आज खत्म हो गया है. बलबीर सिंह सीनियर हमारे बीच नहीं रहे.

अंग्रेजों को उनके घर में दी थी मात
1948 के गोल्ड की बात करते हुए बलबीर सिंह सीनियर की आंखों की चमक बताती थी कि उस समय क्या हुआ होगा. कई बार उन्होंने वो किस्सा सुनाया, ‘जिस इंग्लैंड ने हम पर राज किया, उसे हमने हराया. वो भी उसी के घर में. तिरंगा ऊपर जा रहा था. पूरी टीम में कोई आंख नहीं थी, जो भीगी हुई न हो. प्राउड ऐसा कि लग रहा था सीना फट जाएगा.’ वाकई, जिस अंग्रेजों के आप 200 साल गुलाम रहे हो, उन्हीं के मुल्क में उन्हीं को हराकर अपनी आजादी के ऐलान से बड़ा पल और क्या ही हो सकता था.

जहां जाते...खुशियां बिखेर देते थे
बलबीर सिंह की जीवंतता और जीवटता उन्हें लंबा जीवन देने वाली रही. खुशमिजाज बलबीर हमेशा जहां रहते थे, वहां का माहौल अलग होता था. 2006 में भारत और पाकिस्तान के बीच हॉकी सीरीज थी, जिसके पहले तीन मैच भारत और उसके बाद तीन मैच पाकिस्तान में थे. भारत में तीसरा मैच जालंधर में था, जिसके बाद टीमों को लाहौर जाना था. टीम बस में बलबीर सिंह भी थे, जिन्हें पाकिस्तान में सम्मानित किया जाना था. बस में गाना शुरू हुआ, जो धीरे-धीरे डांस में तब्दील हो गया. आखिर वो पंजाबी ही क्या, जिसे गाने और खाने का शौक न हो. उस टीम के खिलाड़ी बताते हैं कि डांस और गाने के उस प्रोग्राम में थककर अपनी सीट पर बैठने वाले आखिरी आदमी बलबीर सिंह थे. तब वो 79 साल के थे. कुछ ऐसी ही थी भारतीय हॉकी के इस ध्रुवतारे की चमक.

साधारण व्यवहार वाले थे बलबीर सिंह सीनियर
बलबीरजी से कई मुलाकात हैं. कुछ चंडीगढ़ में, कुछ दिल्ली में. हर बार मिलकर उनकी फिटनेस से रश्क होता था. हमेशा बहुत अच्छी तरह तैयार, ज्यादातर बार नेवी ब्लू कलर का भारतीय ब्लेजर पहने. चटख रंग की पगड़ी. किसी भी तरह का कोई नखरा नहीं. 2008 में वो उस ऑफिस आए, जहां मैं काम किया करता था. ऑफिस कैंटीन में मेरे ताकीद करने के बावजूद उन्होंने खाना खाया कि इसमें तेल-मसाले ज्यादा होंगे.

जवाब मिला, ‘बेटा, कोई बात नहीं. थोड़ी एक्सरसाइज ज्यादा कर लूंगा. अब कहां से बाहर से मंगाने के चक्कर में पड़ोगे.’ ये तब की बात है, जब वो करीब 83-84 बरस के थे. उन्होंने कैंटीन में खाना खाते वक्त उस दौर के कई किस्सों को साझा किया, ‘फिल्मी सितारे लगातार आते थे. पृथ्वीराज कपूर हमारे मैच में रेग्युलर आने वाले लोगों में थे. राज कपूर, नरगिस आते थे, जो साइड लाइन पर बैठकर मैच देखना पसंद करते थे. उस दौर का शायद ही कोई फिल्म स्टार होगा, जो हॉकी मैच में न आता हो.’ बलबीर जी उस दौर का प्रतिनिधित्व करते थे, जब हिंदुस्तान में नंबर एक खेल का नाम हॉकी था.

नहीं रहे हॉकी के दिग्गज बलबीर सिंह, देश को ओलिंपिक में दिलाए थे तीन गोल्ड

Tags: Hockey, Olympics, Sports news

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