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भारत के हीरो जिन्हें देश ने भुला दिया, किसी ने पैसों के खातिर पदक बेचा, तो कोई गैंगरीन से मर गया!

News18Hindi
Updated: January 11, 2020, 9:00 PM IST
भारत के हीरो जिन्हें देश ने भुला दिया, किसी ने पैसों के खातिर पदक बेचा, तो कोई गैंगरीन से मर गया!
गुमनामी में खो गए ये सितारे

प्राइम टाइम में आज हम ऐसे खिलाड़ियों (Indian Athletes With Bad Fortune) के बारे में आपको बताएंगे जिन्होंने अपने देश के लिए सबकुछ दांव पर लगा दिया, लेकिन उन्हें बदले में मिली गरीबी और फिर गुमनामी

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  • Last Updated: January 11, 2020, 9:00 PM IST
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नई दिल्ली. क्रिकेट में अगर कोई बल्लेबाज एक शतक लगा दे या 5 विकेट ले डाले तो आईपीएल जैसी टी20 लीग में उसे करोड़ों रुपये मिल जाते हैं. अगर कोई खिलाड़ी टीम इंडिया के लिए टेस्ट मैच या वनडे-टी20 क्रिकेट खेल ले तो उसकी जिंदगी बड़े आराम से कटती है. इस देश में क्रिकेट खिलाड़ियों को सिर-आंखों पर बैठाया जाता है, वो रिटायर हो जाएं तो भी उन्हें याद किया जाता है लेकिन इसी हिंदुस्तान में दूसरी खेलों के कुछ ऐसे दिग्गज भी हैं, जिन्होंने अपनी कड़ी मेहनत और लगन से देश के लिए ओलिंपिक मेडल जीते, एशियन गेम्स में तिरंगा लहराया लेकिन इसके बावजूद उन्हें पैसा तो क्या वाहवाही तक नहीं मिली. आइए बताते हैं आपको उन खिलाड़ियों के बारे में जो खेल में जीतने के बावजूद जीवन के खेल में हार गए.

शंकर लक्ष्मण की मौत गैंगरीन से हुई


शंकर लक्ष्मण- ये हॉकी खिलाड़ी भारत का पहला गोलकीपर था जिसे टीम की कमान मिली. शंकर लक्ष्मण ने भारत के लिए 1956, 1960 और 1964 ओलिंपिक खेलों में गोलकीपिंग की. यही नहीं उन्होंने इस दौरान दो गोल्ड और एक सिल्वर मेडल भी जीता. 1966 में शंकर लक्ष्मण की कप्तानी में भारतीय हॉकी टीम ने एशियन गेम्स में गोल्ड मेडल जीता, लेकिन 1968 के बाद सबकुछ बदल गया. 1968 में शंकर लक्ष्मण का सेलेक्शन नहीं हुआ और उन्होंने हॉकी छोड़ दी. इसके बाद वो 1979 तक बतौर कैप्टन आर्मी में कार्यरत रहे. देश और दुनिया ने शंकर लक्ष्मण के योगदान को भुला दिया और वो गरीबी के अंधकार में खो गए. यही नहीं शंकर लक्ष्मण की मौत भी गैंगरीन से साल 2006 में हुई.

सरवन सिंह को अगले 20 सालों तक टैक्सी चलानी पड़ी


सरवन सिंह- 1954 एशियन गेम्स में सरवन सिंह ने अपनी तेज रफ्तार से सभी को चौंका दिया था. 110 मीटर हर्डल रेस में सरवन सिंह ने गोल्ड मेडल जीता था. गजब की बात ये है कि ये उनका पहला ही इंटरनेशनल इवेंट था. हालांकि इतनी धमाकेदार जीत के बावजूद वो गुमनामी के अंधेरे में कहीं खो गए. इतना शानदार एथलीट होने के बावजूद सरवन सिंह को अगले 20 सालों तक टैक्सी चलानी पड़ी. यही नहीं उन्होंने पैसों के लिए अपना गोल्ड मेडल भी बेच दिया.

मक्खन सिंह ने मिल्खा को दी थी मात


मक्खन सिंह- 'फ्लाइंग सिख' मिल्खा सिंह की जब पूरी दुनिया में धमक थी, उस दौरान एक खिलाड़ी ऐसा आया जिसने मिल्खा को हराकर सनसनी मचा दी थी. 1962 नेशनल गेम्स में मिल्खा सिंह को मक्खन सिंह से हार झेलनी पड़ी थी. 1962 एशियन गेम्स में मक्खन सिंह ने एक गोल्ड मेडल और सिल्वर मेडल जीता था. इसके अलावा उन्होंने नेशनल गेम्स में 16 मेडल जीते. हालांकि इसके बाद मक्खन सिंह के साथ एक सड़क हादसा हुआ, जिसमें उन्होंने अपना एक पांव गंवा दिया. बस यहीं से देश ने उन्हें भुला दिया. साल 2002 में उनका निधन हो गया और उनकी विधवा पत्नी ने पैसों के लिए उनके सभी मेडल बेच दिये.
केडी जाधव की पत्नी को पेंशन के लिए ठोकरें खानी पड़ी


केडी जाधव- ओलिंपिक्स में जब भारत की हॉकी टीम की तूती बोलती थी, उस वक्त एक खिलाड़ी ऐसा था जिसने पहली बार देश के लिए व्यक्तिगत प्रतिस्पर्धा में मेडल जीता था. पहलवान केडी जाधव ने 1952 ओलिंपिक में बेंटमवेट स्पर्धा में ब्रॉन्ज मेडल जीता था. इसके 3 साल बाद 1955 में केडी जाधव बतौर सब-इंस्पेक्टर पुलिस में भर्ती हुए और उन्होंने कई मेडल जीते. 27 साल तक नौकरी करने के बाद जाधव सहायक पुलिस कमिश्नर के पद पर रिटायर हुए लेकिन 1984 में सड़क हादसे में उनकी मौत के बाद जाधव की पत्नी को पेंशन के लिए दर-दर की ठोकरें खानी पड़ी.

मुरलीकांत पेटकर ने रचा था इतिहास


मुरलीकांत पेटकर- इस खिलाड़ी की दास्तान अनोखी है, सेना में नौकरी करने वाले मुरलीकांत पेटकर एक बॉक्सर थे लेकिन पाकिस्तान के साथ 1965 में हुए युद्ध में उन्हें गोली लग गई और वो दिव्यांग हो गए. इसके बाद उन्होंने 1972 हेडेलबर्ग पैरालिंपिक्स में गोल्ड मेडल जीता. उन्होंने 50 मीटर फ्रीस्टाइल स्विमिंग इवेंट में वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाकर जीत हासिल की. यही नहीं उन्होंने जेवलिन थ्रो में भी हिस्सा लिया, जिसमें उन्होंने फाइनल राउंड में जगह बनाई. हालांकि मुरलीकांत पेटकर का कोई रिकॉर्ड आधिकारिक नहीं है क्योंकि भारत ने रिकॉर्ड रखना 1984 से शुरू किया जबकि पेटकर ने इससे 12 साल पहले गोल्ड जीता था.

द्मश्री जीतने वाले पहले दिव्यांग एथलीट देवेंद्र


देवेंद्र झाझरिया- मुरलीकांत पेटकर के बाद पैरालंपिक्स में गोल्ड जीतने वाले दूसरे भारतीय देवेंद्र झाझरिया थे. साल 2004 पैरालंपिक्स में झाझरिया ने जेवलिन थ्रो में वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाते हुए गोल्ड मेडल जीता था. देवेंद्र झाझरिया का एक हाथ नहीं था लेकिन इसके बावजूद उन्होंने ये कारनामा कर दिखाया. वो पद्मश्री जीतने वाले पहले दिव्यांग एथलीट भी बने, लेकिन देश में उनके और उनकी उपलब्धियों के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं.

मोहम्मद यूसुफ को पार्किनसन रोग हो गया था


मोहम्मद यूसुफ खान- क्या आप जानते हैं भारत ने फुटबॉल में भी गोल्ड मेडल जीता है? 1962 एशियन गेम्स के फाइनल में भारत ने साउथ कोरिया को हराकर गोल्ड पर कब्जा जमाया था. ये जीत मोहम्मद यूसुफ खान की बदौलत ही मिली थी. इसके अलावा मोहम्मद यूसुफ ने 1960 रोम ओलिंपिक्स में भी हिस्सा लिया, लेकिन बदले में इस फुटबॉलर को गुमनामी ही मिली. मोहम्मद यूसुफ को पार्किनसन रोग हो गया और दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया.

कैरम में 2 बार के वर्ल्ड चैंपियन मारिया इरुदयम


मारिया इरुदयम- कैरम में 2 बार के वर्ल्ड चैंपियन मारिया इरुदयम को शायद ही कोई खेल प्रेमी जानता हो. इरुदयम भारत के इकलौते कैरम खिलाड़ी हैं जिन्हें अर्जुन अवॉर्ड से सम्मानित किया गया है. इरुदयम 9 बार के नेशनल चैंपियन भी हैं. शानदार खिलाड़ी होने के बावजूद इरुदयम गरीबी और गुमनामी में जीवन बिता रहे हैं.

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First published: January 11, 2020, 9:00 PM IST
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