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बलबीर सिंह यादें-2: 'यकीन कर सकते हो? मुझे खिलाड़ी बनाने के लिए गिरफ्तार किया गया था...'

बलबीर सिंह यादें-2: 'यकीन कर सकते हो? मुझे खिलाड़ी बनाने के लिए गिरफ्तार किया गया था...'

दिग्‍गज हॉकी खिलाड़ी बलबीर सिंह सीनियर के दुनिया को अलविदा कहने के साथ ही एक युग भी समाप्‍त हो गया. बलबीर सिंह के पास इतना अनुभव था कि हर कोई युवा खिलाड़ी उनके अनुभव का लाभ उठाना चाहता था, फिर चाहे वो किसी भी खेल से हो.

दिग्‍गज हॉकी खिलाड़ी बलबीर सिंह सीनियर के दुनिया को अलविदा कहने के साथ ही एक युग भी समाप्‍त हो गया. बलबीर सिंह के पास इतना अनुभव था कि हर कोई युवा खिलाड़ी उनके अनुभव का लाभ उठाना चाहता था, फिर चाहे वो किसी भी खेल से हो.

‘मैं कैसे काम करता. मेरे पिता आजादी के लिए लड़े. उस पुलिस के साथ कैसे काम करता, जिसने हिंदुस्तानियों पर जुल्म किए.’

नई दिल्‍ली. अगर बलबीर सिंह सीनियर (Balbir Singh Sr.) मूड में हों और आप उनकी जिंदगी से जुड़ा किस्सा छेड़ दें, तो उसके बाद और कुछ पूछने की जरूरत नहीं होती थी. कुछ कहानियां पहले हिस्से में आपने पढ़ीं. लेकिन बलबीर सिंह की जिंदगी की पोटली में किस्सों की भरमार थी. उनकी याददाश्त फिटनेस की तरह ही थी. बेहद धारदार. जिस ऑफिस का जिक्र पहले भाग में किया था, उसकी कैंटीन में खाना खाते हुए ही बताया था कि कैसे उन्होंने पंजाब पुलिस में काम करने से मना कर दिया था और दिल्ली में पीडब्ल्यूडी के लिए खेलने लगे थे, ‘मैं कैसे काम करता. मेरे पिता आजादी के लिए लड़े. उस पुलिस के साथ कैसे काम करता, जिसने हिंदुस्तानियों पर जुल्म किए.’

मुझे पहचानते ही बेड़ियां हाथ में डाल दीं...
बलबीरजी को उस समय के पंजाब पुलिस चीफ जॉन बेनेट ने खेलने के लिए कहा था. वो अमृतसर छोड़कर दिल्ली भाग आए. खाना खाते-खाते थोड़ा रुके, हाथ एक दिशा में बढ़ाया, ‘नई दिल्ली स्टेशन के पास स्टेडियम है ना करनैल सिंह... उसके पास मैं था. मैंने देखा कि कुछ पुलिस वाले मुझे ढूंढ रहे हैं. उन्होंने मुझे पहचानते ही बेड़ियां हाथ में डाल दीं.’ इतना बताते ही पूरी तरह सफेद हो चुकी दाढ़ी के बीच होठों पर मुस्कान उतर आई, जो अगले ही पल ठहाके में तब्दील हो गई, ‘यकीन कर सकते हो? मुझे खिलाड़ी बनाने के लिए गिरफ्तार किया गया!’ बलबीर सिंह के इस किस्से को कुछ समय पहले आई फिल्म गोल्ड में कुछ अलग तरह से फिल्माया गया है.

गोल्‍डन हैट्रिक
बलबीर सिंह सीनियर (Balbir Singh Sr.) आखिरकार 1945 में पंजाब पुलिस के साथ जुड़ गए. दो साल बाद मुल्क आजाद हुआ, जिसकी टीम का वो हिस्सा थे. उसके बाद तो वो गोल्डन हैट्रिक का हिस्सा बन गए. इस नाम से ही उन्होंने अपनी आत्मकथा भी लिखी. बलबीर सिंह (Balbir Singh Sr.) के साथ खेले महान खिलाड़ी केशव दत्त ने एक बार बताया था, ‘बलबीर का टेरर था. डी में उनका जवाब नहीं था. उनके आसपास कई डिफेंडर होते थे.’ दरअसल, केशव दत्त के ऐसे न जाने कितने पास होंगे, जो बलबीर सिंह के लिए गोल का मौका लेकर आए होंगे.

विभाजन ने कर दिया साथी से जुदा
बलबीर सिंह (Balbir Singh Sr.) ने वो दौर भी देखा है, जब विभाजन की वजह से पंजाब के उनके कई साथी खिलाड़ी सीमा पार चले गए. उनमें एक का नाम खुर्रम था. अमृतसर के खालसा कॉलेज में खुर्रम की कप्तानी में बलबीर सिंह खेला करते थे. 2005 की बात है, जब पाकिस्तान की क्रिकेट टीम भारत आई. मोहाली मैच के लिए पाकिस्तानी क्रिकेट फैंस को शहर का वीजा दिया गया. यानी वे मोहाली और चंडीगढ़ आ सकते थे. काफी समय बाद इतनी आसानी से वीजा मिला था.

हिंदुस्तान में कदम रखते ही पूछा...बलबीर सिंह से मुलाकात कहां होगी
मोहाली क्रिकेट मैच के लिए उस समय फैंस के नाम पर कुछ ऐसे लोग भी आए थे, जो इसी सरजमीं से जुड़े थे. जिनका परिवार पंजाब के आसपास से गया था. हालात यह थे कि पाकिस्तानियों की मेहमाननवाजी के लिए मोहाली और चंडीगढ़ के तमाम घरों ने अपने दरवाजे खोल दिए थे. मैं भी क्रिकेट मैच के लिए मोहाली में था. हिंदुस्तान आने वाले लोगों में एक नाम शाहरुख खान था. एक पंजाबी अखबार के मुताबिक, शाहरुख ने वाघा बॉर्डर पार करने के बाद हिंदुस्तानी धरती पर कदम रखते ही एक सवाल पूछा था, ‘बलबीर सिंह से मुलाकात कहां होगी.’ शाहरुख पाकिस्तान के महान खिलाड़ियों में शुमार होते हैं. वो हिंदुस्तान से ही गए थे. कहा जाता है कि उनके ही नाम पर फिल्म स्टार शाहरुख खान का नाम पड़ा. हालांकि इसकी पुष्टि शाहरुख खान ही कर सकते हैं. 2005 में शाहरुख 82 साल के थे और बलबीर सिंह भी इसी उम्र के लगभग थे. शाहरुख के बड़े भाई खुर्रम थे. वही खुर्रम, जिनकी कप्तानी में बलबीर खेला करते थे.

...जब नमाज पढ़ने मस्जिद जा बैठे बलबीर सिंह
पाकिस्तान और पाकिस्तानियों में बलबीर सिंह (Balbir Singh Sr.) की कितनी इज्जत थी, इसके तमाम किस्से हैं. एक वाकया 1975 के हॉकी वर्ल्ड कप से जुड़ा है, जब बलबीर भारतीय टीम के कोच और मैनेजर थे. भारत अब तक उसी एकमात्र बार चैंपियन बना है. फाइनल से पहले टीम के सदस्य असलम शेर खां को जुमे की नमाज पढ़नी थी. उन्होंने मस्जिद जाने की इजाजत मांगी. बलबीर उनके साथ गए. उन्होंने साथ नमाज पढ़ी, ‘मुझे आता नहीं था, तो मैं वैसे ही बैठा, जैसे बाकी लोग बैठे थे.’ नमाज पढ़ने वालों में पाकिस्तान की टीम भी थी, जिन्हें हैरत थी कि कोई गैर मुस्लिम मस्जिद में नमाज पढ़ने आया है. बलबीर ने बताया, ‘जीत के बाद पाकिस्तान के कोच ने कहा कि अल्लाह ने आपकी सुन ली.’

चाहता तो गोल्ड हूं, लेकिन कोई भी मेडल जीत जाएं
भरपूर जिंदगी जीने वाले बलबीर सिंह को पिछले कई सालों में कुछ शिकायत भी रही. सबसे बड़ी शिकायत थी, ओलिंपिक से जुड़ी तमाम यादों का खो जाना. साई यानी भारतीय खेल प्राधिकरण के आग्रह पर उन्होंने म्यूजियम के लिए मेडल, ब्लेजर वगैरह दिए थे, जो लापरवाही में गायब हो गए. वो हमेशा कहते थे, ‘धरोहर संभाल नहीं सकते थे, तो ये सब मांगा क्यों.’ उन्हें शिकायत यह भी थी कि भारत रत्न नहीं बने. इन सबके बीच उनकी सबसे बड़ी तमन्ना भी थी, ‘मेरे जीते जी एक बार टीम ओलिंपिक मेडल जीत जाए. मैं चाहता तो गोल्ड हूं, लेकिन कोई मेडल तो जीत जाए.’

अधूरी रह गई ख्वाहिश...
कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता, कहीं जमीं तो कहीं आसमां नहीं मिलता...जिंदगी में सभी ख्वाहिशें पूरी नहीं होती. बलबीर सिंह की भारत को एक बार फिर ओलिंपिक मेडल जीतते देखने की ख्वाहिश भी अधूरी ही रही गई. बलबीर सिंह उस भारतीय पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते थे, जिसमें हॉकी के साथ देश का गर्व जुड़ा था. उस भारतीय पीढ़ी का, जिसने आजादी की लड़ाई देखी. उसके बाद गुलाम बनाने वाले देश में जाकर उसी को हराकर जीतने का गर्व भी जिसके हिस्से आया. जिसने विभाजन देखा. लेकिन विभाजन के बाद अलग हुए मुल्क का भरपूर प्यार भी पाया. जिसने भारतीय हॉकी को बनते, संवरते, बिगड़ते, बिखरते देखा. 1948 की उस टीम के सदस्य एक-एक करके विदा होते जा रहे हैं. अगर इस दुनिया से अलग कोई और दुनिया होती है, तो वे जरूर वहां इकट्ठा होंगे. उन किस्सों के साथ, जो उनके खेल जीवन से जुड़े हैं... और इस ख्वाहिश के साथ वो इस दुनिया को देख रहे होंगे कि भारतीय टीम फिर कभी ओलिंपिक और वर्ल्ड चैंपियन बन जाए. वो अधूरी ख्वाहिश, जिसके साथ बलबीर सिंह सीनियर इस दुनिया से गए हैं.

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Tags: Hockey, Olympics, Sports news

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