दीपा मलिक: जब लोगों ने असहाय समझा तब व्हीलचेयर को हिम्मत बनाकर तय किया ओलिंपिक पोडियम का सफर

दीपा मलिक पूर्व भारतीय पैरा ओलिंपियन हैं
दीपा मलिक पूर्व भारतीय पैरा ओलिंपियन हैं

दीपा मलिक (Deepa Malik) 2016 रियो पैरा ओलिंपिक (Rio Para Olympic) में सिल्वर मेडल जीतने में कामयाब रही थी और खेल रत्न से नवाजी गई थीं

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नई दिल्ली. आमतौर व्हीलचेयर पर बैठे इंसान को देखकर हमारे दिल में दया और हमदर्दी का भाव आता है. हमें महसूस होता है कि इस शख्स के साथ कितना गलत हुआ है. हालांकि यह काफी हद तक उस शख्स पर भी निर्भर करता है कि वह दुनिया के सामने अपनी कैसी छवि रखना चाहता है. व्हील चेयर पर बैठा हर शख्स असहाय नहीं होते कुछ ऐसे भी होते हैं जो उसके सहारे दुनिया में अपना नाम कमाते हैं. उनकी कामयाबी की ऊंचाई इतनी होती है कि दुनिया उनके झुक कर सलाम करती है. ऐसी ही कहानी है दीपा मलिक की. व्हीय चेयर पर बैठी उस हिम्मत की कहानी जिसके सामने हर मुश्किल हार गई और उसने दिखाया कि दुनिया आप को किस नजर से देखेगी यह आपको तय करना है.

तीन ऑपरेशन और 183 टांके हैं दीपा के शरीर में
पैरा ओलिंपिक में देश की पहली महिला सिल्वर मेडलिस्ट दीपा मलिक (Deepa Malik) ने हाल ही में रिटायरमेंट का ऐलान कर दिया. दीपा मलिक स्कूल से ही खेलों से जुड़ी हुई थीं हालांकि कभी इसके करियर बनाने का विचार उनके मन में नहीं आया. 19 साल की उम्र में ही उनकी शादी हो गई. सबकुछ अच्छा चल रहा था, तभी दूसरे बच्चे के जन्म के दौरान उन्हें कुछ परेशानियां शुरू हुई. कमर में दर्द रहना लगा था और पैरों में अकड़न होने लगी. इस समय ही हिमालय की चोटियों पर कारगिल का युद्ध शुरू हो गया और उनके पति को देश के लिए अपने फर्ज निभाने वहां जाना पड़ा.

दीपा ने अपनी जांच कराई शुरुआती जांच में पता चला कि ट्यूमर बड़ा हो गया हैं और जयपुर के बजाय दिल्ली में इलाज़ करवाना पड़ेगा. फिर शुरू हुआ अस्पताल में लंबा दौर, सर्जरी, कई-कई घंटे फिजियोथेरेपी. इस दौरान उनकी सबसे बड़ी ताकत उनका परिवार था. सर्जरी के तीन महीने बाद वह अपने पति से मिली. दीपा के 3 ऑपरेशन किए गए जिसके लिए उनकी कमर और पांव के बीच 183 टांके लगे थे. दीपा के कमर से नीचे का हिस्सा लकवाग्रस्त हो गया औऱ वह व्हील चेयर पर बैठने को मजबूर हो गई.
बेटी के डर के कारण शुरू की स्वीमिंग


दीपा (Deepa Malik) की छोटी बेटी स्विमिंग से डरती थी, वो उसे हौसला देने के लिए पानी में उतरी. तब उन्हें लगा, वो तैर सकती हूं. फिर महाराष्ट्र के पैरा-ओलंपिक कैंप से किसी ने उनसे कहा कि अगर वो स्विमिंग करे तो यह उनके वर्ग के लिए अलग बात होगी. शादी से पहले स्टेट लेवल तक बास्केटबॉल खेला था. साल 2006 में उन्हें स्विमिंग में सिल्वर मेडल भी मिला, लेकिन स्वास्थ्य कारणों के कारण वो लंबे समय तक उसे जारी नहीं रख सकी.

दीपा मलिक (Deepa Malik) स्विमर,एथलीट ही नहीं बल्कि एक बेहतरीन मोटर रेसलर भी हैं, उन्होंने साल 2009 में देश की सबसे खतरनाक और मुश्किल कार रैली 'रेड दे हिमालय' और डेजर्ट स्टॉर्म 2010 मोटरस्पोर्ट्स में हिस्सा लेकर जीरो तापमान में लेह, शिमला, जम्मू, हिमालय जैसे कई कठिन रास्तों पर चलकर यात्रा की थी. हाड़-मांस को कंपा देने वाली ठंड में दीपा मलिक ने अपनी 1700 किलोमीटर की यात्रा करीब 8 दिनों में पूरी की. इसके साथ ही उन्होंने 18 हजार फीट ऊंचाई पर चढ़कर सबको हैरान कर दिया, और एक बेहतरीन मोटर रेसलर के रुप में अपनी पहचान बनाई.

दीपा की उपलब्धियों पर सबको गर्व है
वह अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में तैराकी में पदक जीत चुकी हैं. दीपा मलिक की उपलब्धियों को गिनना काफी मुश्किल हैं. उन्होने भारत की 23 मेडल्स अंतराष्ट्रीय स्पर्धाओं (International Medals) में जबकि राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में 68 पदक प्राप्त किये हैं. वे भारत की एक ऐसी पहली महिला है जिसे हिमालय कार रैली में आमंत्रित किया गया. वर्ष 2008 तथा 2009 में उन्होने यमुना नदी (Yamuna River) में तैराकी तथा स्पेशल बाइक सवारी में भाग लेकर दो बार लिम्का बूक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड (Limca Book of World Record) में अपना नाम दर्ज कराया.

जैवलिन थ्रो में उनके नाम पर एशियाई रिकॉर्ड है जबकि गोला फेंक और चक्का फेंक में उन्होंने 2011 में विश्व चैंपियनशिप में रजत पदक जीते थे. दीपा मलिक भारत की इकलौती ऐसी महिला खिलाड़ी हैं, जिन्होंने अंतर्राष्ट्रीय खेलों में 18 पदक भारत को दिलवाएं हैं. दीपा महिला, पहली भारतीय महिला एथलीट हैं, जिन्होंने साल 2016 के पैरालम्पिक्स खेलों में रजत पदक जीता है. दीपा ने रियो ओलंपिक 2016 में शॉटपुट गेम में सिल्वर मैडल जीतकर भी भारत का मान बढ़ाया है जिसके लिए उन्हें खेल रत्न अवॉर्ड दिया गया था.

लेखक बन चुकी दीपा करती हैं प्रेरित
दीपा मलिक खेल में ही आगे नहीं है, वह सामाजिक कार्य करने के साथ-साथ लेखन में भी रुचि रखती हैं. गंभीर बीमारी से पीड़ित लोगों के लिए कैंपेन चलाती है और सामाजिक संस्थाओं के कार्यक्रमों में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेती हैं. दीपा को लिखने का शौक है और वह अपनी बायोग्राफी से लेकर खिलाड़ियों के बारे में लिखती हैं. दीपा एक मिसाल अपने जैसों के लिए जो खुद को असहाय समझकर खुद पर तरस खाते हैं और हमारे जैसों के लिए जो सबकुछ होते हुए भी अपने सपनों को पूरा करने की हिम्मत नहीं दिखा पाते.
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