दीपा मलिक: रियो पैरालिंपिक में ऐतिहासिक जीत के साथ देश में लाखों लोगों को दिया हौंसला

दीपा मलिक: रियो पैरालिंपिक में ऐतिहासिक जीत के साथ देश में लाखों लोगों को दिया हौंसला
दीपा मलिक पूर्व भारतीय पैरा ओलिंपियन हैं

दीपा मलिक (Deepa Malik) को उनकी उपलब्धियों के लिए राजीव गांधी खेल रत्न अवॉर्ड दिया गया है

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नई दिल्ली. साल 2016 में रियो ओलिंपिक (Rio Olympic) के बाद पैरा ओलिंपियन दीपा मलिक (Deepa Malik) की ऐतिहासिक जीत ने उन्हें हिम्मत का पर्य़ाय बना दिया. व्हील चेयर पर बैठे लोगों को देखकर तरस खाने वाले लोगों को पहली बार उनती ताकत का एहसास हुआ. रियो में दीपा ने सिल्वर मेडल जीतकर बताया कि जिंदगी में हौसलें से कुछ भी हासिल किया जा सकता है. वह भारत के लोगों के लिए कई मायनों में मिसाल बन गईं.

बड़े-बड़े ऑपरेशन भी नहीं तोड़ पाए दीपा की हिम्मत
दीपा मलिक (Deepa Malik) का जन्म 30 सितम्बर 1970 में हरियाणा (Hariyana) के सोनीपत (Sonipat) जिले के भैस्वाल (Bheswal) गांव में हुआ. उनके पिता बी के नागपाल (B K Nagpal) भारतीय सेना में कर्नल रह चुके हैं. दीपा के पति भी सेना में ही थे. 1989 में उनकी साढे 19 साल की उम्र में कर्नल विक्रम सिंह (Vikram Singh) के साथ उनकी शादी हो गयी.

शादी के बाद खुशहाल जीवन चल रहा था लेकिन दूसरे बच्चे के जन्म के दौरान उन्हें एक बार फिर से परेशानियां शुरू हुई. कमर में दर्द रहता था और पैरों में अकड़न होने लगी. इसके बाद पता चला कि उनकी रीढ़ की हड्डी में ट्यूमर है. कहा गया कि उन्हें ऑपरेशन कराने की जरूरत है. इस दौरान उनके पति कारगिल के युद्ध पर थे.  सर्जरी के बाद उन्हें 8-9 महीने तक वह अस्पताल में रही थी.
एक रेस्त्रां चलाकर खाली समय बिताती थी दीपा


वर्ष 2002 में सर्जरी के बाद दीपा परिवार के साथ अहमदनगर शिफ्ट हो गए. खुद को अवसाद से दूर रखने के लिए उन्होंने एक फ़ूड कॉर्नर (Food Corner) शुरू किया.  होम डिलिवरी काउंटर गार्डन रेस्टरां बन गया. रोज रात में डेढ-दो सौ लोग खाते थे. करीब 40-50 होम डिलिवरी होती थीं. इसके साथ ही वो गरीब बच्चों को मुफ्त में पढाई भी करवाती थी और अब तक 70 से ज्यादा बच्चों का जीवन संवार चुकी हैं.

दीपा मलिक के नाम हैं कई रिकॉर्ड
गोला फेंक के अलावा दीपा ने भाला फेंक, तैराकी में भी भाग लिया था. वह अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में तैराकी में पदक जीत चुकी हैं. भाला फेंक में उनके नाम पर एशियाई रिकॉर्ड है जबकि गोला फेंक और चक्का फेंक में उन्होंने 2011 में विश्व चैंपियनशिप में रजत पदक जीते थे. इसके बाद उन्होंने पैरालिंपिक मे ंहिस्सा लिया और साल 2016 में रियो में शॉटपुट में सिल्वर मेडल हासिल किया. वह ऐसा करने वाली पहली भारतीय महिला खिलाड़ी थीं.

नई पारी के लिए तैयार हैं दीपा मलिक
दीपा मलिक ने इसी महीने अपने अंतरराष्ट्रीय करियर का अंत कर दिया. पैरालंपिक समिति के अध्यक्ष के रूप में अपना पद संभालने के बाद उन्होंने यह बड़ा फैसला लिया. दीपा ने फैसले लेने के बाद कहा कि वह खेल से दूर नहीं हो रही है उनके अंदर का खिलाड़ी हमेशा जिंदा रहेगा, देश में नवोदित पैरा-एथलीटों को बढ़ावा देने के लिए बड़ी तस्वीर देखने की जरूरत है. , वह सामाजिक कार्य करने के साथ-साथ लेखन भी करती हैं. गंभीर बीमारी से पीड़ित लोगों के लिए कैंपेन भी चलाती हैं और सामाजिक संस्थाओं के कार्यक्रमों में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेती हैं. दीपा को लिखने का शौक है.

हितों के टकराव से बचने के लिए दीपा मलिक ने अपने करियर को खत्म करने का फैसला किया. नियमों के मुताबिक राष्ट्रीय खेल संहिता के अनुसार, कोई भी सक्रिय एथलीट किसी भी महासंघ में आधिकारिक पद नहीं रख सकता. दीपा मलिक ने साथ ही यह  इशारा कर दिया कि वह 2022 के एशियाई खेलों के दौरान अपने फैसले पर फिर से विचार कर सकती हैं.
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