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Sunday Special: ओलिंपिक के 5 किस्से, जिसके बाद आप अपनी कमियां गिनना भूल जाएंगे

News18Hindi
Updated: January 19, 2020, 7:44 AM IST
Sunday Special: ओलिंपिक के 5 किस्से, जिसके बाद आप अपनी कमियां गिनना भूल जाएंगे
पांच ओलिंपियंस ने अपनी तकलीफ, गरीबी, चोट, सोच सबको पीछे छोड़ते हुए एक नया अध्याय लिखा.

अगर आपको लगता है कि आप फलां काम को किसी कमी की वजह से नहीं कर सकते तो आपको एक बार ओलिंपियन डेरेक रेडमंड, विल्मा रूडोल्फ, कैरी स्‍ट्रक,बिली मिल्स और गैब्रिएला एंडरसन के इन किस्सों को जरूर पढ़ना चाहिए.

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  • Last Updated: January 19, 2020, 7:44 AM IST
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नई दिल्ली.  खेल की एक अलग ही दुनिया है. यहां आपको जोश, उत्साह, खेल भावना, जीत की खुशी, हार के आंसू, खिलाड़ियों के लिए पागलपन, बर्दाश्त करने की ताकत सब कुछ देखने को मिलेगा. साथ ही यहां पर आपको कुछ ऐसे भी खिलाड़ी मिलेंगे, जिनके नाम और खेल को आप भले ही नहीं जानते, मगर इनकी कहानी आपके अंदर खत्म हो चुके जोश को वापस से जिंदा कर देगी. यह खेल ही नहीं आपके लिए एक प्रेरणा भी साबित हो सकते हैं. आज हम संडे स्पेशल में ओलिंपिक्स (Olympics) की उन पांच कहानियों की  बात करेंगे, जिन्होंने ‌इतिहास, सोच सब कुछ बदल दिया. जिनकी कहानी आज भी निराश  हो चुके लोगों में आशा जगा देती है. ये पांच कहानी है डेरेक रेडमंड, विल्मा रूडोल्फ, कैरी स्‍ट्रक, बिली मिल्स और गैबरिएला एंडरसन की. जिन्होंने यह साबित कर दिया कि ताकत अंदर से आती है.

डेरेक रेडमंड: बात 1992 बार्सिलोना ओलिंपिक की है, 400 मीटर की सेमीफाइनल रेस शुरू की  होने वाली थी. डेरेक रेडमंड (Derek Redmond) स्टार्टिंग लाइन पर थे. पूरे आत्मविश्वास से भरे हुए और हो भी क्याें ना, खिताब के सबसे मजबूत दावेदार जो थे. इससे सात साल पहले 1985 में उन्हाेंने इसी रेस में ब्रिटिश रिकॉर्ड तोड़ा था. हालांकि उनका करियर चोटों के कारण बाधित रहा था. यहां तक कि 1992ओलिंपिक से पहले  उनकी 8 सर्जरी हुई थी. मगर उनकी ताकत ने उन्हें वापस से ट्रैक पर आने में मदद की. बार्सिलोना में वह अपने करियर के टॉप पर थे. रेस शुरू हुई. लेकिन उसी दौरान ट्रैक के बीच पहुंचते ही हैमस्ट्रिंग के कारण वह गिर गए. इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी. उन्‍हें मालूम था कि वह खिताब से चूक गए. यहां तक कि उनका सफर यहीं पर खत्म हो गया, मगर उन्होंने रेस अधूरी नहीं छोड़ी. उनके पिता भी नहीं चाहते थे कि उनका बेटा अधूरी रेस से वापस आए. तभी ट्रैक के बीच उनके पिता आए और उनकी सहायता से डेरेक ने रेस पूरी की.  उनकी यह चोट और भी भयानक हो गई थी, जिसने उन्हें मजबूरन संन्यास लेने पर मजबूर कर दिया था. हालांकि इसके बाद उन्होंने इंग्लैंड के लिए बास्केटबॉल खेलना शुरू किया. डेरेक अब दुनिया के लोगों को प्रेरित करने का काम करते हैं.



विल्मा रूडोल्फ: जहां  डेरेक मुश्किल समय में भी पीछने न हटने की प्रेरणा देते हैं, वहीं विल्मा रूडोल्फ नामुमकिन को भी जिद और जज्बे से मुमकिन करने की प्रेरणा देती हैं. 21 भाई बहनों में 12वें नंबर की विल्मा का जन्म समय से पहले ही हो गया था. जिस वजह से वह काफी कमजोर थी. उनके लिए  पेशेवर खेल करियर को संसाधनों के बिना बनाने रखना नामुकिन था. विल्मा को जिंदगी में उस समय सबसे बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ा, जब उन्हें पोलियो हो गया. यह बात 1950 की है, तब चीजें और भी मुश्किल हुआ करती थी. मगर विल्मा के अंदर तो एक स्वस्‍थ, जोश से भरी हुई, दुनिया को अपनी ताकत दिखाने का सपना देखने वाली खिलाड़ी थी. जब वह 12 साल की हुई तो काफी मेहनत के बाद पोलियो ठीक होने लगा, मगर उनका बाएं पैर में ताकत खत्म हो गई ‌थी. हालांकि उन्होंने चलना फिरना शुरू किया. इसके आठ साल बाद वह ओलिंपिक  (Olympic) चैंपियन बनकर दुनिया के सामने आई. 1960 ओलिंपिक में उन्होंने 100 मीटर, 200 मीटर और 4*100मीटर में तीन गोल्ड मेडल जीते थे. इसके दो साल बाद ही विल्मा ने संन्यास ले लिया था.

कैरी स्‍ट्रक: 1996 से पहले तक अमेरिका ने महिला जिम्नास्टिक में कभी गोल्ड मेडल नहीं जीता था. जिस वजह से कैरी स्ट्रक और उनकी टीम पर काफी दबाव के साथ ही उम्मीदें भी थी. कैरी ने यूएस के लिए पहला गोल्ड मेडल जीता था. उनके इस प्रदर्शन ने इतिहास रच दिया था. वह टूटे हुए टखने के साथ दौड़ी और सफलतापूर्वक वॉल्ट में चुनौती पेश  की. कैरी का टखना इस कदर टूट चुका था कि पोडियम तक भी उनके कोच उन्हें गोद में उठाकर लाए थे.

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बिली मिल्स: 1964 में टोक्यो ओलिंपिक ( Tokyo Olympic) में कोई नहीं जानता था कि बिली मिल्स (Billy Mills) कौन हैं. वह 10 हजार मीटर रेस में बाकी धावकों में से एक थे. मगर किसी को भी उनसे  उम्मीद नहीं थी. ना ही वो उभरते सितारे थे और ना ही उनके पास कोई बड़ी उपलब्धि थी. यहां तक कि बिली मिल्स को भी उम्मीद नहीं थी कि कुछ घंटों बाद वें ओलिंपिक चैंपियन बन  जाएंगे.आधे अमे‌रिकन और आधे व्हाइट बिली साउथ डकोटा में आरक्षण पर पले बढ़े. जब वह 12 साल के थे, तभी वह अनाथ हो गए थे और जीने के लिए संघर्ष कर रहे थे. समाज भी अधिक मदद नहीं कर पा रहा था. यहां तक कि अमेरिका के मूल निवासी उस समय मुश्किल समय में जी रहे थे. वहां के हालत सही नहीं थे. मगर युवा बिली के पास एक उम्मीद थी कि दौड़ उन्हें इन सबसे आजादी  दिला सकता है. उन्होंने अपने खेल में सुधार किया और यहां तक कि एथलेटिक्स स्कॉलरशिप हासिल किया. इसके कुछ समय बाद उन्होंने ओलिंपिक टिकट भी हासिल कर लिया. ओलिंपिक गेम्स के समय बिली अपने करियर के शीर्ष पर थे. उस रेस की आखिरी मिनट तक कोई नहीं जानता था कि बिली कौन हैं. रेस खत्म होने के बाद पूरी दुनिया को उनका नाम मालूम चल गया.



गैब्रिएला एंडरसन: 1984 ओलिंपिक (Olympic)  तक मैराथन सिर्फ पुरुषों के लिए ही थी.  मगर इस ओलिंपिक में पहली बार महिलाओं की मैराथन को भी शामिल किया गया. हालांकि फैसले को लेकर वहां काफी विवाद भी हुआ था. कुछ लोगों का कहना था कि यह जगह महिलाओं के लिए नहीं है.  महिलाएं मैराथन में हिस्सा नहीं ले सकती, क्योंकि उनमें इस तरह की सहन शक्ति नहीं हैं. 39 साल की ग्रेबिएला एंडरसन (Gabriela Andersen) ने उस ओलिंपिक में ऐसी सोच वालों को भी जवाब दिया. वे जानती थी कि ओलिंपिक में चुनौती पेश करने का यह शायद पहला और आखिरी मौका है. इसीलिए वह अपना सर्वश्रेष्ठ करना चाहती थी. हालांकि वह जीत हासिल नहीं कर पाईं.

रेस अच्छी चल रही थी, मगर आखिरी के 100 मीटर में उन्हें महसूस हुआ कि वह अच्छा महसूस नहीं कर रही हैं. दरअसल वह पानी के स्टेशन से चूक गई थी और लॉस एंजिल्स की गर्मी और उमस बर्दाश्त के बाहर थी. वह कुछ समझ पाती, उससे पहले उन्होंने खुद  को डिहाइड्रेड और थका हुआ महसूस किया. हालांकि अधिकारियों ने उनकी स्थिति को देखते हुए उन्हें ट्रैक से हटाकर इलाज देने की कोशिश की, मगर उन पर तो सभी को जवाब देने का जूनुन सवार था, वह  ट्रैक को छोड़ने पर सहमत नहीं हुई  और उसी  हालत में रेस पूरी की. उनके इस फैसले का पूरे स्टेडियम ने सम्मान किया और खड़े होकर रेस को पूरा करने के लिए उनका उत्साह बढ़ाया.

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First published: January 19, 2020, 7:44 AM IST
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