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ज्वाला गुट्टा का दर्द छलका, कहा-चीनी मां की बेटी के रूप में बड़ा होना आसान नहीं था, अब लोग मुझे हाफ कोरोना कह रहे

News18Hindi
Updated: April 6, 2020, 2:13 PM IST
ज्वाला गुट्टा का दर्द छलका, कहा-चीनी मां की बेटी के रूप में बड़ा होना आसान नहीं था, अब लोग मुझे हाफ कोरोना कह रहे
ज्वाला गुट्टा भारत की दिग्गज डबल्स बैडमिंटन खिलाड़ी हैं.

भारत की बैडमिंटन स्टार (Indian Badminton Star) ज्वाला गुट्टा (Jwala Gutta) की मां चीन (China) की हैं और पिता भारत के.

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नई दिल्ली. मौजूदा समय में न केवल भारत बल्कि पूरी दुनिया चीन (China) के वुहान (Wuhan) शहर से निकली जानलेवा महामारी कोरोना वायरस (Coronavirus) के खिलाफ जंग में जुटी है. इस लड़ाई में भारतीय खेल जगत भी अपना योगदान दे रहा है. मगर इस बीच महिला डबल्स में भारत की दिग्गज बैडमिंटन स्टार (Badminton Star) ज्वाला गुट्टा (Jwala Gutta) का दर्द भी छलक आया है, जिन्हें सोशल मीडिया पर अक्सर अभद्र टिप्पणियों का शिकार होना पड़ता है. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, ज्वाला गुट्टा ने बताया है कि किसी मुद्दे पर सहमति न होने के कारण लोग उन्हें चीन का माल, हाफ चीनी और चिंकी जैसी नस्लीय टिप्पणियां करते हैं.

कैसा महसूस होगा अगर कोई विदेश में आपको मलेरिया कहे
ज्वाला गुट्टा (Jwala Gutta) ने कहा कि इन टिप्पणियों में अब हाफ कोरोना (Half Corona) शब्द भी जुड़ गया है. मैं जानती हूं कि जो लोग मुझे ट्रोल करते हैं, वही व्यक्तिगत रूप से मिलने पर मेरे साथ सेल्फी खिंचवाने की मांग करते हैं. उन्होंने साथ ही कहा कि चीनी मां की बेटी के रूप में बड़ा होना आसान नहीं है. एक भारतीय के तौर पर किसी को कोरोना और चाइनीज वायरस कहते हुए हम ये भूल जाते हैं कि हमारे यहां मलेरिया के भी बड़ी संख्या में मामले हुए थे और ट्यूबरक्लोसिस से हर साल दो लाख से ज्यादा लोग अपनी जान गंवा देते हैं. जरा सोचिए कि अगर विदेश में कोई भारतीय सड़क पर घूम रहा हो और वहां के लोग उसे मलेरिया या टीबी कहकर बुलाएं तो कैसा महसूस होगा.

मेरी मां ने कभी शिकायत नहीं की



भारतीय बैडमिंटन स्टार (Badminton Star) ज्वाला गुट्टा (Jwala Gutta) ने बताया कि मेरी मां ने कभी नए कल्चर में ढलने में आई परेशानियों को लेकर शिकायत नहीं की. मगर ये बिल्कुल भी आसान नहीं था. जब मैं बड़ी हो रही थी तो मैंने सोचा कि ये सिर्फ इसलिए है क्योंकि मैं थोड़ी अलग दिखती थी और लंबी थी. मेरा रंग भी साफ था. मगर मैंने कभी इस बात को नहीं समझा कि इसमें नस्लीय बिंदु भी शामिल है. मैं उन बच्चों को यही बात समझाने की कोशिश करती थी कि मेरा चेहरा थोड़ा बड़ा है, इसलिए मेरी आंखें छोटी लगती है. मगर जब मैंने बीसवें साल में प्रवेश किया, तब समझ आया कि इनमें से कुछ भी स्वीकार्य नहीं है. मैंने देखा कि नॉर्थईस्ट के लोगों को भी इसे लेकर हिंसा का सामना करना पड़ता है. यहां तक कि बड़े शहरों में भी.



मेरे परदादा को महात्मा गांधी ने शांतिदूत नाम दिया था
ज्वाला गुट्टा ने बताया कि मेरे परदादा भारत आए थे और उन्होंने रबींद्रनाथ टैगोर के साथ पढ़ाई की थी. यहां तक कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने उन्हें शांतिदूत नाम दिया था. वह सिंगापुर-चाइनीज न्यूजपेपर में चीफ एडीटर थे और महात्मा गांधी की आटोबायोग्राफी का अनुवाद करना चाहते थे. तभी मेरी मां उनकी मदद के लिए भारत आईं.

ओलिंपिक पदक तालिका में शीर्ष पर क्यों है चीन
भारतीय बैडमिंटन स्टार ने बताया कि मैं साल 2002 में ग्वांगझू गई थी. वहां मैंने देखा कि आखिर क्यों ये देश ओलिंपिक पदक तालिका में शीर्ष पर रहता है. वे लोग ढाई घंटे का लंच ब्रेक लेते हैं और वहां सड़कों पर भी खेल की टेबल लगी रहती हैं. वहां सुनिश्चित किया जाता है कि लोग अधिक से अधिक शारीरिक गतिविधियों में हिस्सा ले सकें. चीनी लोग बेहद परिश्रमी होते हैं. मेरी मां फार्मास्यूटिकल कंपनियों की सलाहकार हैं और सुबह 8 बजे से शाम के 6 बजे तक काम करतीं हैं. उन्हें ऐसे दक्षिण भारतीय परिवार में एडजस्ट करना पड़ा, जिसने उनके लुक को लेकर कभी उन्हें पूरी तरह स्वीकार नहीं किया. मगर मेरे माता-पिता एक-दूसरे के लिए हमेशा खड़े रहे और मुझे उन पर गर्व है.

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First published: April 6, 2020, 1:51 PM IST
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