Home /News /sports /

Birthday Special: वह भी अनहोनी को होनी करता था... बस, वो धोनी नहीं था!

Birthday Special: वह भी अनहोनी को होनी करता था... बस, वो धोनी नहीं था!

एमएस धोनी की तरह शंकर लक्ष्‍मण के करियर की शुरुआत भी फुटबॉल से ही हुई थी (फाइल फोटो)

एमएस धोनी की तरह शंकर लक्ष्‍मण के करियर की शुरुआत भी फुटबॉल से ही हुई थी (फाइल फोटो)

एक महान खिलाड़ी जिसके लिए एमएस धोनी (MS Dhoni) के जैसा लकी नहीं रहा 7 नंबर. हॉकी के करिश्माई खिलाड़ी शंकर लक्ष्मण को दुनिया में वो नहीं मिला, जिसके वो हकदार ‌थे.

नई दिल्‍ली. वो भी महान था. शायद महेंद्र सिंह धोनी (MS Dhoni) से ज्यादा. उसके करियर की शुरुआत भी फुटबॉल से हुई थी. ठीक धोनी की तरह. वो भी अपनी टीम का कप्तान था. ठीक धोनी की तरह. वो भी छोटे शहर से आया था. ठीक धोनी की तरह. उसका जन्म भी सात जुलाई को हुआ था. ठीक धोनी की तरह. लेकिन दोनों के बीच एक न पाटा जा सकने वाला फासला था. इस फर्क का आलम ये है कि महान होने के बावजूद अगर आप सड़क चलते लोगों से पूछेंगे, तो 100 में 100 लोग धोनी को जानते होंगे, लेकिन इस महान खिलाड़ी को जानने वाले शायद 100 में 10 भी नहीं होंगे.
जो सात नंबर धोनी के लिए बहुत लकी रहा. वही सात नंबर शंकर लक्ष्मण के लिए खुशकिस्मती नहीं लाया. यही नाम है हमारे हीरो का, जिनके बारे में आपमें से बहुत लोगों ने नहीं सुना. लेकिन हर किसी को अपने हीरो के बारे में जानना चाहिए. यह भी जानना चाहिए कि उस हीरो के साथ हमने क्या सुलूक किया.

धोनी की तरह शंकर लक्ष्मण का जन्म 7 जुलाई को हुआ था. साल में जरूर बड़ा फर्क था. धोनी से 48 साल पहले 1933 में. धोनी अपने स्कूली दिनों में फुटबॉल खेला करते थे. शंकर लक्ष्मण भी फुटबॉल खेला करते थे. धोनी फिर क्रिकेट में आ गए. यहीं असली फर्क आया. शंकर लक्ष्मण ने हॉकी को चुना. धोनी विकेट कीपर बने तो शंकर लक्ष्मण गोलकीपर.

लगातार तीन ओलिंपिक फाइनल...और सिर्फ 3 गोल खाए
धोनी के नाम विश्व कप है. शंकर लक्ष्मण के नाम ओलिंपिक स्वर्ण, रजत और एशियाई खेलों के स्वर्ण पदक हैं. शंकर लक्ष्मण ओलिंपिक से कभी खाली हाथ नहीं आए. 1956 का स्वर्ण, 1960 का रजत और फिर 1964 का स्वर्ण उनके नाम रहा. इसके अलावा 1966 में एशियाड का स्वर्ण उनकी कप्तानी में भारत ने जीता था. 1966 के बाद भारत को एशियाड का स्वर्ण जीतने में 32 साल लग गए थे. उन्होंने लगातार तीन ओलिंपिक फाइनल खेले और सिर्फ एक गोल खाया था. तीन एशियाई खेलों के फाइनल में भी उनके खिलाफ सिर्फ दो गोल हुए. यानी ओलंपिक और एशियाड के छह फाइनल में उनके खिलाफ सिर्फ तीन गोल हुए.
बताया जाता है कि 1964 ओलिंपिक में पाकिस्तान के शेफ डी मिशन मेजर जनरल मूसा ने कहा था कि हमें जोगिंदर और शंकर लक्ष्मण दे दो, उसके बाद हमें नहीं हरा सकते. इसके जवाब में उस वक्त के भारतीय हॉकी फेडरेशन प्रमुख अश्विनी कुमार ने कहा था कि इन दोनों को लेने के लिए आपको हमसे जंग लड़नी पड़ेगी. इससे समझ आता है कि उनका कद कितना बड़ा था.

राष्ट्रीय टीम के कप्तान बनने वाले पहले गोलकीपर!

ये वो दौर था, जब हॉकी में चेस्ट गार्ड या इतने पैड नहीं होते थे. उसके बावजूद शंकर लक्ष्मण दीवार की तरह भारतीय गोल पोस्ट पर डटे दिखाई देते थे. माना जाता है कि वो इंटरनेशनल हॉकी में पहले गोलकीपर थे, जो अपनी टीम का कप्तान बना. एक ऑस्ट्रेलियाई हॉकी मैगजीन हॉकी सर्किल ने 1964, ओलंपिक फाइनल में शंकर लक्ष्मण के प्रदर्शन के मद्देनजर लिखा था कि लक्ष्मण को हॉकी की गेंद फुटबॉल जितनी बड़ी नजर आ रही थी. अगर ये सारी बातें किसी को शंकर लक्ष्मण की महानता का एहसास नहीं दिलातीं, तो फिर कुछ नहीं किया जा सकता. सात जुलाई 1933 को मध्य प्रदेश के महू में उनका जन्म हुआ था. खेलों में इतना मन लगता था कि पढ़ाई छूट गई. फिर सेना में चले गए. वहां 1978 में रिटायर हुए. यहां से मुश्किलों का दौर शुरू हुआ. आखिरी के साल बड़ी मुश्किल से कटे.

मध्य प्रदेश के कुछ अखबारों के मुताबिक, उन्होंने छोटी सी राशन की दुकान खोली. इस बीच उन्हें एक पैर में गैंगरीन हो गया. डॉक्टरों ने पैर काटने की सलाह दी, लेकिन उन्होंने ऐसा न करके जड़ी-बूटियों से इलाज कराने का फैसला किया. फैसला उन्हें भारी पड़ा. 29 अप्रैल 2006 को उनका निधन हो गया.

अनदेखी न होती तो बेहतर जिंदगी जी पाते

परिवार ने आईएचएफ और मध्य प्रदेश सरकार पर अनदेखी का आरोप लगाया. सैनिक सम्मान के साथ उनके गृह नगर महू में अंतिम संस्कार हुआ. काश, जीते जी कुछ जगहों से सम्मान मिलता, तो शायद वो बेहतर जिंदगी जी पाते. हॉकी इंडिया ने पहले अपने वार्षिक सम्मान समारोह में उन्हें ध्यानचंद लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड दिया.

यह भी पढ़ें: 

Happy Birthday Dhoni: जब 'कैप्टन कूल' महेंद्र सिंह धोनी ने खोया आपा और हैरान रह गए फैंस

16 सालों में धोनी ने कई बार बदला अपना हेयरस्टाइल, हर बार नए ट्रेंड की करते हैं शुरुआत

एक हॉकी वेबसाइट पर पूर्व दिग्गज गुरबख्श सिंह के अनुसार, वो अपनी टीम के चीयरलीडर थे. टीम बस में वही सबसे पहले वतन की राह में वतन के नौजवां शहीद हो गाना शुरू करते थे. अफसोस कि मुल्क के लिए शहीद होने को तैयार शंकर लक्ष्मण की दुनिया से विदाई पैसों और सुविधाओं की कमी की वजह से हुई. उससे भी ज्यादा अफसोस इस बात का कि इस हीरो का नाम भी आज लोगों को याद नहीं.

धोनी के जन्मदिन पर उन्हें जरूर याद कीजिए. यह भी बताइए कि धोनी ने कैसे क्रिकेट में अनहोनी को होनी कर दिया. लेकिन इसी दिन जन्मे महानतम गोलकीपर्स में से एक शंकर लक्ष्मण और उनकी जिंदगी की अनहोनी की भी जरूर याद कीजिए, ताकि ऐसा और किसी के साथ न हो.

(इस लेख को पिछले साल शंकर लक्ष्मण के जन्‍मदिन के मौके पर पब्लिश किया जा चुका है.)

Tags: Cricket, Hockey, Ms dhoni, Sports news

विज्ञापन

राशिभविष्य

मेष

वृषभ

मिथुन

कर्क

सिंह

कन्या

तुला

वृश्चिक

धनु

मकर

कुंभ

मीन

प्रश्न पूछ सकते हैं या अपनी कुंडली बनवा सकते हैं ।
और भी पढ़ें
विज्ञापन

टॉप स्टोरीज

अधिक पढ़ें

अगली ख़बर