Hpy Birthday Dhyanchand : हॉकी से निकलता था जादू, भारत की गोल मशीन को देख हिटलर से लेकर ब्रैडमैन तक थे हैरान

हॉकी के जादूगर (Magician Of Hockey) मेजर ध्यानचंद (Major Dhyanchand) का जन्मदिवस राष्ट्रीय खेल दिवस (National Sports Day) के रूप में मनाया जाता है.

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Updated: August 29, 2019, 11:43 AM IST
Hpy Birthday Dhyanchand : हॉकी से निकलता था जादू, भारत की गोल मशीन को देख हिटलर से लेकर ब्रैडमैन तक थे हैरान
हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद की जयंती पर ही राष्ट्रीय खेल दिवस का आयोजन किया जाता है. (फाइल फोटो)
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Updated: August 29, 2019, 11:43 AM IST


कोई उन्हें हॉकी का जादूगर (Magician of Hockey) कहता है तो कोई दद्दा. कई लोग उन्हें भारत का सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी मानते हैं तो कई के लिए वे गोल मशीन थे. दुनिया के किसी भी खेल में किसी भी खिलाड़ी का रुतबा ऐसा नहीं रहा होगा, जैसा कि भारत के इस सपूत मेजर ध्यानचंद (Major Dhyanchand) का था. तानाशाह हिटलर (Hitler) से लेकर महान क्रिकेटर सर डॉन ब्रैडमैन (Don Bradman) तक उनके मुरीद थे. नाम कई हो सकते हैं, लेकिन एक बात जो सभी के दिलों में दर्ज है, वो ये कि मेजर ध्यानचंद देश के सच्चे भारत रत्न थे... आइए इस महान खिलाड़ी की 115वीं जयंती पर निकल पड़ते हैं उस सुनहरे सफर पर, जिनमें सुनहरे पड़ाव हैं तो संघर्ष की गाथा भी, जिस पर चलते हुए आपको महसूस होगा कि आपने भी मेजर ध्यानचंद के साथ एक स्वर्णिम युग जीया है.

इलाहाबाद का वो घर... ध्यानचंद (Dhyanchand) का जन्म साल 1905 में इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में 29 अगस्त को हुआ. राजपूत परिवार में पैदा हुए ध्यानचंद के पिता समेश्वर सिंह ब्रिटिश इंडियन आर्मी में थे और आर्मी के लिए हॉकी खेलते थे, ध्यानचंद के छोटे भाई रूपसिंह (Roop Singh) भी हॉकी खिलाड़ी थे. पिता के बार-बार ट्रांसफर होने के चलते ध्यानचंद छठी कक्षा तक ही पढ़ाई कर सके. आखिरकार पूरा परिवार उत्तर प्रदेश स्थित झांसी में बस गया.



पहलवान ध्यानचंद आर्मी में पहुंच गए... ध्यानचंद (Dhyanchand) का बचपन हॉकी से दूरी बनाते हुए ही बीता. उन्हें तो पहलवानी पसंद थी और जब 16 साल की उम्र में इंडियन आर्मी में जाने का मौका मिला तो उन्होंने बिल्कुल भी देर नहीं की. यहां हॉकी से उनका करीब से वास्ता पड़ा और उन्होंने भी इस खेल को अपनाने में ज्यादा ना-नुकुर नहीं की.

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ऐसे पड़ा ध्यानचंद नाम... 16 साल की उम्र में ध्यानचंद ने भारतीय आर्मी ज्वाइन कर ली थी. वह चांदनी रात में खेल की प्रैक्टिस किया करते थे. उस दौर में बाहर लाइट नहीं हुआ करती थी. चांद के इंतजार के कारण ही उनके दोस्त उन्हें चंद पुकारने लगे और उनका नाम ध्यानचंद पड़ गया. 1922 से 1926 के बीच ध्यानचंद ने सिर्फ आर्मी हॉकी और रेजिमेंट गेम्स खेले. बाद में उन्हें इंडियन आर्मी की हॉकी टीम के लिए चुन लिया गया. टीम ने न्यूजीलैंड में 18 मैच जीते, 2 ड्राॅ हो गए. सिर्फ एक मैच में हार मिली. दर्शक तो मानो टीम के प्रदर्शन से मंत्रमुग्‍ध ही हो गए थे. देश लौटते ही ध्यानचंद को लांस नायक बना दिया गया.
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यूं शुरू हुआ ओलिंपिक का सफर...1928 एम्सटर्डम
साल 1928 में एम्सटर्डम में हुए ओलिंपिक खेलों में भारतीय टीम के पहले ही मैच में ध्यानचंद ने ऑस्ट्रिया के खिलाफ 3 गोल दाग दिए. अगले दिन भारत ने बेल्जियम को 9-0 से हराया. इस जीत में ध्यानचंद की स्टिक से एक गोल ही निकला. अगले मैच में डेनमार्क के खिलाफ भारत के 5 में से 3 गोल ध्यानचंद ने किए. फिर स्विट्जरलैंड के खिलाफ 4 गोल दागे और टीम को जोरदार जीत दिलाई.

दुनिया ने देखी जादूगरी
एम्सटर्डम ओलिंपिक खेलों में हॉकी का फाइनल मुकाबला भारत और नीदरलैंड के बीच 26 मई को खेला गया. टीम के कई खिलाड़ी बीमार हो गए थे. ध्यानचंद की भी सेहत खराब थी. इसके बावजूद भारत ने यह मैच 3-0 से जीता. ध्यानचंद के 2 गोल की मदद से भारत ने ओलिंपिक में हॉकी का पहला गोल्ड मेडल अपने नाम किया. ध्यानचंद प्रतियोगिता में सबसे अधिक गोल करने वाले खिलाड़ी बने. भारत की इस सनसनीखेज जीत के बाद एक अखबार ने लिखा, 'ये हॉकी का मैच नहीं था बल्कि जादू था. ध्यानचंद असलियत में हॉकी के जादूगर हैं.' विएना के एक स्पोर्ट्स क्लब में ध्यानचंद के चार हाथों वाली मूर्ति लगी है, उनके हाथों में हॉकी स्टिक हैं. यह मूर्ति बताती है कि उनकी स्टिक में कितना जादू था.

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1932 ओलिंपिक में दद्दा का जलवा
1932 के लॉस एंजिलिस ओलिंपिक के फाइनल में भारत ने संयुक्त राज्य अमेरिका को 24-1 से हराकर स्वर्ण पदक अपने नाम किया. उस मैच में ध्यानचंद ने 8 और उनके भाई रूप सिंह ने 10 गोल किए थे. उस टूर्नामेंट में भारत की ओर से किए गए 35 गोलों में से 25 गोल इन दो भाइयों की जोड़ी की स्टिक से निकले थे. एक मैच में 24 गोल दागने का 86 साल पुराना यह रिकॉर्ड भारतीय हॉकी टीम ने 2018 में इंडोनेशिया में खेले गए एशियाई खेलों में हांगकांग को 26-0 से मात देकर तोड़ा.

1936 बर्लिन ओलिंपिक में जर्मनी को चटाई धूल
बर्लिन आलंपिक के हॉकी का फाइनल भारत और जर्मनी के बीच 14 अगस्त 1936 को खेला जाना था, लेकिन उस दिन लगातार बारिश की वजह से मैच अगले दिन 15 अगस्त को खेला गया. बर्लिन के हॉकी स्टेडियम में उस दिन 40 हजार दर्शकों के बीच हिटलर भी मौजूद थे. हाफ टाइम तक भारत एक गोल से आगे था. इसके बाद ध्यानचंद ने अपने स्पाइक वाले जूते निकाले और नंगे पांव कमाल की हॉकी खेली. भारत ने ये मैच 8-1 से अपने नाम किया और स्वर्ण पदक हासिल किया. बर्लिन ओलंपिक में ध्यानचंद के साथ खेले और बाद में पाकिस्तान के कप्तान बने दारा ने एक संस्मरण में लिखा, छह गोल खाने के बाद जर्मन खिलाड़ी काफी खराब हॉकी खेलने लगे. उनके गोलकीपर टीटो वार्नहोल्ट्ज की हॉकी स्टिक ध्यानचंद के मुंह पर इतनी जोर से लगी कि उनका दांत टूट गया. प्रारंभिक उपचार के बाद ग्राउंड पर लौटे ध्यानचंद ने खिलाड़ियों को निर्देश दिए कि अब कोई गोल न मारा जाए, जर्मन खिलाड़ियों को ये बताया जाए कि गेंद पर नियंत्रण कैसे किया जाता है. इसके बाद खिलाड़ी बार-बार गेंद को जर्मनी के डी में ले जाते और फिर गेंद को बैक पास कर देते. जर्मन खिलाड़ियों की समझ में ही नहीं आ रहा था कि ये हो क्या रहा है.

ध्यानचंद के मुरीद हिटलर ने उन्हें डिनर पर बुलाया
1936 के बर्लिन ओलिंपिक में ध्यानचंद के शानदार प्रदर्शन से खुश होकर जर्मनी के तानाशाह एडोल्फ हिटलर ने उन्हें खाने पर बुलाया और उनके सामने जर्मनी से खेलने की पेशकश की. इसके बदले उन्हें मजबूत जर्मन सेना में कर्नल पद का प्रलोभन भी दिया. लेकिन ध्यानचंद ने इस पेशकश को ठुकराते हुए साफ कहा, 'हिंदुस्तान मेरा वतन है और मैं वहां खुश हूं.'

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ब्रैडमैन बोले-ध्यानचंद ऐसे गोल करते हैं, जैसे हम रन बनाते हैं
ध्यानचंद की टीम ने साल 1935 में ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड का दौरा किया था. यहां उन्होंने 48 मैच खेले और 201 गोल किए. क्रिकेट के महानतम बल्लेबाज डॉन ब्रैडमैन भी उनके कायल हो गए. उन्होंने कहा, वो (ध्यानचंद) हॉकी में ऐसे गोल करते हैं, जैसे हम क्रिकेट में रन बनाते हैं. सर डॉन ब्रैडमैन ने 1935 में ध्यानचंद से मुलाकात की थी.

मगर भारत रत्न अब तक नहीं...
हालांकि इस बात की कसक सभी खेलप्रेमियों के मन में लगातार बनी हुई है कि दुनिया के इतने महान खिलाड़ी को अब तक भारत रत्न से सम्मानित नहीं किया गया है. हर वर्ष ध्यानचंद की जयंती पर खेल जगत उनके लिए भारत रत्न की मांग करता है. मेजर ध्यानचंद को 1956 में पद्मभूषण तो दिया गया, लेकिन सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न के लिए उनके नाम की बार-बार अनदेखी की जाती रही.
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1. उन्होंने कहा था कि अगर किसी ने मुझसे पूछा कि वह सबसे अच्छा मैच कौन-सा था, जो मैंने खेला, तो मैं कहूंगा कलकत्ता कस्टम्स और झांसी हीरोज के बीच 1933 का बेटन कप फाइनल.
2. भारत ने 1932 के ओलिंपिक के दौरान अमेरिका को 24-1 और जापान को 11-1 से हराया. ध्यानचंद ने 35 गोलों में से 12, जबकि उनके भाई रूप सिंह ने 13 गोल दागे. इससे उन्हें 'हॉकी का जुड़वां' कहा गया.
3. ध्यानचंद एक मैच के दौरान गोल नहीं कर पा रहे थे, तो उन्होंने गोल पोस्ट की माप पर आपत्ति जताई. आखिरकार वे सही साबित हुए. गोल पोस्ट निर्धारित आधिकारिक न्यूनतम चौड़ाई का नहीं था.
4. भारत सरकार ने दिल्ली में नेशनल स्टेडियम का नाम ध्यानचंद नेशनल स्टेडियम किया.
5. ध्यानचंद ने 1928, 1932 और 1936 ओलिंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व किया. तीनों ही बार भारत ने गोल्ड मेडल जीता.
6. ध्यानचंद का खेल पर इतना नियंत्रण था कि गेंद उनकी स्टिक से लगभग चिपकी रहती थी. उनकी इस प्रतिभा पर नीदरलैंड्स को शक हुआ और ध्यानचंद की हॉकी स्टिक तोड़कर इस बात की तसल्ली की गई, कहीं वह चुंबक लगाकर तो नहीं खेलते हैं.
7. ध्यानचंद के जन्मदिवस 29 अगस्त को हर साल राष्ट्रीय खेल दिवस के तौर पर मनाया जाता है.

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22 साल तक खेले, 400 अंतरराष्ट्रीय गोल
ध्यानचंद 22 साल तक भारत के लिए खेले और 400 इंटरनेशनल गोल किए. ध्यानचंद का 3 दिसंबर, 1979 को दिल्ली में निधन हो गया. झांसी में उनका अंतिम संस्कार उसी मैदान पर किया गया, जहां वे हॉकी खेला करते थे.

ऐसे बीते दद्दा के आखिरी दिन
ध्यानचंद के सम्मान में साल 1951 में नेशनल स्टेडियम में ध्यानचंद टूर्नामेंट का आयोजन किया गया. आखिरकार 1956 में 51 वर्ष की उम्र में वह आर्मी से मेजर की पोस्ट से रिटार्यड हो गए. भारत सरकार ने उन्हें इसी वर्ष पद्मभूषण से नवाजा. रिटायरमेंट के बाद वह राजस्थान के माउंटआबू में हॉकी कोच के रूप में कार्य करते रहे. इसके बाद पाटियाला के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ स्पोर्ट्स में चीफ हॉकी कोच बने. कई साल तक इस पद पर रहने के बाद अपने जीवन के आखिरी दिनों में ध्यानचंद गृहनगर झांसी में रहे. मेजर ध्यानचंद का 3 दिसंबर 1979 में दिल्ली के एम्स में निधन हो गया.

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First published: August 29, 2019, 11:34 AM IST
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