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शॉर्ट्स मत पहनो, निखत से रिश्तेदार कहते थे; आज वही बनी वर्ल्ड चैम्पियन, पिता ने सुनाई बेटी के संघर्ष की कहानी

Nikhat Zareen: भारतीय मुक्केबाज निखत जरीन 52 किलो भार वर्ग में वर्ल्ड चैम्पियन बनीं हैं. जानिए कैसे जरीन इस मुकाम तक पहुंचीं. (BFI Twitter)

Nikhat Zareen: भारतीय मुक्केबाज निखत जरीन 52 किलो भार वर्ग में वर्ल्ड चैम्पियन बनीं हैं. जानिए कैसे जरीन इस मुकाम तक पहुंचीं. (BFI Twitter)

World Boxing Champion Nikhat Zareen: भारतीय महिला मुक्केबाज निखत जरीन सामाजिक पूर्वाग्रह, कंधे की बड़ी चोट से उबरकर और एमसी मैरीकॉम से रिंग के भीतर और बाहर लड़कर पहली बार 52 किलोग्राम वेट कैटेगरी में वर्ल्ड चैम्पियन बनीं. पिता को बेटी को मुक्केबाज बनाने को लेकर कई तरह की बातें सुननी पड़ीं. लेकिन, निखत ने हर लड़ाई लड़ी और चैम्पियन बनकर उभरीं.

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नई दिल्ली. भारतीय मुक्केबाज निखत जरीन 52 किलोग्राम वेट कैटेगरी (52 भारवर्ग) में विश्व चैंपियन बन गईं. उन्होंने एक दिन पहले फाइनल में थाईलैंड की जितपोंग जुटामेंस को 5-0 से हराया. तेलंगाना की निखत भारत की ऐसी पांचवीं महिला मुक्केबाज हैं, जिसने वर्ल्ड चैम्पियनशिप में गोल्ड मेडल जीता है. निखत के मुक्केबाज बनने की कहानी भी दिलचस्प है. पिता मोहम्मद जमील खुद फुटबॉल और क्रिकेट खेलते थे, वो चाहते थे कि उनकी 4 बेटियों में से कोई एक खिलाड़ी बने. उन्होंने अपने तीसरे नंबर की बेटी निखत के लिए एथलेटिक्स को चुना और कम उम्र में ही स्टेट चैम्पियन बन निखत ने भी पिता के इस फैसले को सही साबित किया. लेकिन, चाचा की सलाह पर निखत बॉक्सिंग रिंग में उतरीं और 14 साल की उम्र में ही वर्ल्ड यूथ बॉक्सिंग चैम्पियन बनीं और इसके बाद एक-एक कर कामयाबी की सीढ़ियां चढ़ती गईं. विश्व चैम्पियनशिप में गोल्ड मेडल जीतना इस सफर का सबसे अहम पड़ाव है.

भारत में महिला मुक्केबाजी का मतलब 6 बार की वर्ल्ड चैम्पियन एमसी मैरीकॉम हैं. लेकिन, निखत ने अब इस लिस्ट में अपना नाम बना लिया है. हालांकि, इसके लिए उन्हें लंबा इंतजार करना पड़ा. कंधे की चोट के कारण निखत 2017 में बॉक्सिंग रिंग में नहीं उतर पाईं थीं. लेकिन, 5 साल बाद वर्ल्ड चैम्पियनशिप में मिली ऐतिहासिक जीत के बाद वो मायूसी और दर्द दोनों दूर हो गया.

यह जीत देश की हर बेटी को प्रेरणा देगी: पिता
निखत के पिता मोहम्मद जमील ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया, “विश्व चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल जीतना ऐसी चीज है, जो मुस्लिम लड़कियों के साथ-साथ देशी की हर लड़की को जिंदगी में बड़ा लक्ष्य हासिल करने के लिए प्रेरित करेगी. निखत ने खुद ही अपना रास्ता तैयार किया है.”

चाचा की सलाह पर मुक्केबाज बनने की ठानी
चाचा शम्सुद्दीन के दोनों बेटे एतेशामुद्दीन और इतिशामुद्दनी के मुक्केबाज होने के कारण, निखत को मुक्केबाज बनने के लिए कहीं बाहर से प्रेरणा की जरूरत नहीं पड़ी. हालांकि, निखत ने जब 2000 के दशक में मुक्केबाजी शुरू की तो निजामाबाद या हैदराबाद में महिला मुक्केबाज किसी प्रतिस्पर्धा में बेहद कम ही नजर आती थी. इसके बावजूद पिता ने निखत को मुक्केबाज बनने से कभी नहीं रोका. मुक्केबाजी ऐसा खेल है, जिसमें लड़कियों को ट्रेनिंग या बाउट के दौरान शॉर्ट्स और टी-शर्ट पहनना पड़ता है. ऐसे में जमील परिवार के लिए बेटी को मुक्केबाज बनाना आसान नहीं था. लेकिन निखत को पिता और मां परवीन सुल्ताना दोनों का साथ मिला.

‘रिश्तेदार बॉक्सिंग को अच्छा नहीं मानते थे’
पिता जमील ने बताया, “मैं सऊदी अरब में बतौर सेल्स असिस्टेंट काम करता था और वहां 15 साल बिताने के बाद मैंने बेटियों की पढ़ाई और स्पोर्ट्स में उनके करियर को देखते हुए निजामाबाद लौटने का फैसला किया. निखत की दो बड़ी बहनें डॉक्टर हैं. मेरा सारा वक्त निखत और उसकी छोटी बहन, जो बैडमिंटन खेलती है, उसकी ट्रेनिंग में ही निकल जाता है. मुझे याद है कि जब निखत ने हमसे बॉक्सर बनने की अपनी इच्छा के बारे में बताया तो हमारे मन में कोई झिझक नहीं थी. लेकिन, कभी-कभी रिश्तेदार या दोस्त यह कहते थे लड़की को ऐसा स्पोर्ट्स नहीं खेलना चाहिए, जिसमें उसे शॉर्ट्स पहनना पड़े. लेकिन हम यह जानते थे कि निखत जो चाहेगी, हम उसके सपने को पूरा करने के लिए हमेशा उसके साथ खड़े रहेंगे और आज वो वर्ल्ड चैम्पियन बन गईं.”

मैरीकॉम से रिंग के भीतर और बाहर दोनों जगह लड़ना पड़ा
निखत को भारतीय बॉक्सिंग की नई उम्मीद माना जा रहा है. वो 6 बार की वर्ल्ड चैम्पियन एमसी मैरीकॉम की विरासत को आगे बढ़ा सकती हैं. हालांकि, निखत को यह मौका आसानी से नहीं मिला. उन्हें इसके लिए मैरीकॉम से रिंग के भीतर और बाहर अपनी हक की लड़ाई लड़नी पड़ी. हालांकि, 3 साल के संघर्ष के बाद आखिरकार निखत को वर्ल्ड चैम्पियनशिप में हिस्सा लेने का मौका मिला और वो अपनी वेट कैटेगरी में विश्व चैम्पियन बन गईं.

2011 में यूथ वर्ल्ड चैम्पियन बनीं थीं
निखत ने 2011 में यूथ वर्ल्ड चैम्पियन बनने के साथ ही भारतीय बॉक्सिंग के नए सितारे के रूप में दमदार दस्तक दे दी थी. लेकिन उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर चमकने के लिए 5 साल का इंतजार करना पड़ा. वो 2016 में फ्लाइवेट कैटेगरी में मनीषा को हराकर पहली बार सीनियर नेशनल चैम्पियन बनीं. हालांकि, लंदन ओलंपिक की ब्रॉन्ज मेडलिस्ट मैरीकॉम भी इसी वेट कैटेगरी में ही थीं. ऐसे में निखत के लिए सीनियर लेवल पर अपना स्थान बनाना आसान नहीं रहा. 2018 में उन्होंने सीनियर नेशनल्स में ब्रॉन्ज जीता और इसी बेलग्रेड में एक अहम खिताब जीता. 2019 की एशियन चैम्पियनशिप और थाईलैंड ओपन में मेडल जीतकर निखत ने सीनियर लेवल पर खेलने का अपना दावा ठोक दिया. लेकिन 52 किलो वेट कैटेगरी में मैरीकॉम की मौजूदगी की वजह से निखत को मौके नहीं मिल पा रहे थे. उन्हें 2018 के कॉमनवेल्थ और एशियन गेम्स की टीम में भी नहीं जगह नहीं मिली. इससे वो मायूस हो गईं थीं. लेकिन पिता ने उनका हौसला बढ़ाए रखा.

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उस दौर को याद करते हुए पिता ने कहा, “जब उसने वर्ल्ड यूथ टाइटल जीता था तो महज 15 साल की थी और उसे यह समझने में वक्त लगा कि यहां से सीनियर लेवल पर खेलने का सफर कठिन होगा. 2016 में सीनियर नेशनल चैम्पियन बनने के बाद उसका आत्मविश्वास बढ़ा था. लेकिन अगला पूरा साल चोट के कारण वो रिंग से दूर ही रही. उसे कई इंटरनेशनल टूर्नामेंट से दूर रहना पड़ा. इससे वो टूट सी गई थी. लेकिन मैंने हमेशा उसका हौसला बढ़ाने की कोशिश की. मैंने बताया कि हर चीज का सही वक्त होता है और अब उसका वक्त आ गया है.”

निखत ने 2-3 साल से पसंदीदा बिरयानी नहीं खाई
निखत की इस सुनहरी कामयाबी पर पिता और घर वाले काफी खुश हैं और अब जश्न की तैयारियों शुरू हो गईं हैं. पिता ने कहा, 2-3 साल से उसने अपनी पसंदीदा बिरयानी और निहारी नहीं खाई है. जैसे ही वो कैंप से फ्री होगी तो उसके पास अपनी पसंदीदा डिश खाने के लिए एक-दो दिन का मौका होगा. इसके बाद वो फिर बिजी हो जाएगी.

Tags: Boxing, Mc mary kom, Nikhat zareen

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