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IAFF में हिमा को स्वर्ण और देश में खेल संस्कृति को लेकर 'उड़न परी' पीटी उषा की राय

हिमा दास (बाएं) और जेस्ना मैथ्यू (दाएं) के साथ पीटी उषा

हिमा दास (बाएं) और जेस्ना मैथ्यू (दाएं) के साथ पीटी उषा

अरे वाह! तुम भारत से हो? तुम यहां तक कैसे पहुंची? तुम दौड़ सकती हो? मैं किसी तरह अपनी मजबूती बनाए रखती और केवल इतना कहती कि हां मैं भारत से हूं.

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    एथलीट में भारत के लिए 13 गोल्ड जीतने वाली पीटी ऊषा को 'उड़न परी' एवं 'पय्योली एक्स्प्रेस' जैसे नामों से भी जाना जाता है. अब जबकि हिमा दास ने उनका रिकॉर्ड तोड़ दिया तो पूर्व चैंपियन ने राखी बोस से बातचीत करते हुए हमारे देश की खेल संस्कृति से जुड़ी समस्याओं के बारे में बताया.

    पीटी उषा

    हिमा को फिनलेंड में स्वर्ण पदक जीतते हुए देखना मेरी जिंदगी का एक अविश्वसनीय पल था. मुझे याद है 1980 में जब भारतीय एथलीटों ने वैश्विक प्रतिस्पर्धाओं में भाग लेना शुरू किया तो उनका किस तरह से मजाक उड़ाया जाता था. यह मेरे साथ भी हुआ है, जब हम वॉर्म अब कर रहे होते या इक्ट्ठा होते तो दूसरे देश के एथलीट मुझ पर हंसते या मुझे चिढ़ाते. अमेरिका, ब्रिटिश और रूस के खिलाड़ी खासतौर पर बुरा व्यवहार करते थे.

    अरे वाह! तुम भारत से हो? तुम यहां तक कैसे पहुंची? तुम दौड़ सकती हो? मैं किसी तरह अपनी मजबूती बनाए रखती और केवल इतना कहती कि हां मैं भारत से हूं.

    अब इन सवालों का कई लोगों ने जवाब दिया है. पहले अंजू फिर नीरज और अब हिमा. हिमा को देखना काफी खास है. पोडियम पर एक भारतीय और वह भी रेस के लिए. उसकी दौड़ आश्चर्यजनक थी. मैंने स्टेडियम में बैठकर अपनी आंखों से इस आश्चर्य को होते देखा है.

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    यह जीत मुझे मेरे अतीत में लेकर चली गई. जब एथलीट्स के पास कोई स्पोन्सर नहीं होता था. अगर किसी को सफल होना है तो उसे अपने टैलेंट और अपने पैसों से आगे बढ़ना होता था. हमारे पास न कोच होता था, न फिजियोथेरिपिस्ट, न ही मालिश करने वाला और न ही डॉक्टर. यहां तक कि हमें सही तरीके से एक जगह से दूसरी जगह जाने की सुविधा भी नहीं दी जाती और सप्लिमेंट और आराम भी नहीं मिलता.



    90 के दशक के बाद चीजें बहुत बदल गई. एथलेटिक फेडरेशन ऑफ इंडिया (एएफआई) के मैनेजमेंट द्वारा किए प्रयासों के लिए उन्हें धन्यवाद. खासतौर पर मैं ललित भानोत, वाल्सन और आदिल सुमारवाला को धन्यवाद करना चाहती हूं. ये लोग खुद एथिलीट थे जो एथलीटों का दर्द और उनकी पीड़ा को जानते थे.

    हालांकि आज एथलीटों के लिए चीजें मुफ्त में उपलब्ध हैं लेकिन आज की पीढ़ी हमारी पीढ़ी के सामने फीकी नजर आती है.

    लोगों को इस बात पर आश्चर्य होता है कि भारतीय एथलीट वैश्विक प्रतिस्पर्धाओं में अच्छा प्रदर्शन क्यों नहीं कर पाते हैं? वे ओलंपिक में पदक क्यों नहीं जीतते?  ऐसा इसलिए है क्योंकि भारत के एथलीटों  को अभी भी पश्चिम के समान उचित, व्यवस्थित और वैज्ञानिक पोषण नहीं मिलता. मदद की नियमित घोषणा करना पर्याप्त नहीं है. वास्तव में एथलीटों के कल्याण, मेडिकल, ट्रेनिंग, आवास और अन्य सुविधाओं में निवेश करने की जरूरत है.

    हमारी सरकार या बैंक या निगम हिमा दास, नीरज चोपड़ा और जिस्ना मैथ्यू जैसे एथलीटों को मासिक वेतन क्यों नहीं दे सकते? हर गरीब एथलीट आर्थिक सुरक्षा चाहता है. अगर उनके ऊपर परिवार की जरूरत पूरी करने की जिम्मेदारी नहीं होगी तो वे प्रैक्टिस पर ज्यादा ध्यान दे सकेंगे.



    लेकिन भारतीय हमारे साथ कंजूस रहे हैं. उन्होंने कभी हमें उतना नहीं दिया जितने की हमें जरूरत होती है. कोई किसी एथलीट की तबतक मदद नहीं करता जबतक कि वह पदक न जीत ले. मुझे लगता है कि इसे बदलने की जरूरत है. गरीब एथलीटों को दुर्दशा से बाहर निकलाने के लिए राज्य सरकारों, केंद्रीय खेल मंत्रालय, एएफआई और एसएआई को साथ आना चाहिए. हिमा जैसी एथलीट को अच्छा घर, पोषण और देखभाल के लिए फैकल्टी प्रदान करने के लिए हमें सिस्टम और प्रोग्राम में बदलाव की जरूरत है.

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    लेकिन जो सबसे महत्वपूर्ण बात है, वह यह कि इन एथलीटों को वैश्विक प्रतिस्पर्धाओं में भाग लेने के लिए पर्याप्त अवसर दिए जाएं. आप भारतीयों को अधिक मेडल जीतते हुए देखना चाहते हैं तो उन्हें ज्यादा वैश्विक प्रतिस्पर्धाओं में भेजिए और देखिए क्या होता है.



    हिमा ने आईएएफएफ में स्वर्ण जीता है तो इसका जमकर जश्न मनाया जाएगा और ओलंपिक के बारे में तो बात हो ही रही है. मुझे इस बात पर शत-प्रतिशत विश्वास है कि वह 2020 और 2024 के ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीत सकती है. यहां तक कि हम नीरज चोपड़ा, जेस्ना मैथ्यू और कुछ दूसरे एथलीट भी से स्वर्ण की उम्मीद कर सकते हैं. लेकिन ऐसा तभी हो सकता है जब उन्हें हर तरह की सुविधा मुहैया कराई जाएं.

    इस वक्त बिना किसी हिचकिचाहट के उनकी जरूरत पूरी किए जाने की आवश्यकता है. हम ऐसा नहीं सोच सकते कि उन्हें किसी चीज की जरूरत पड़े तो वे अधिकारियों से मांग करते रहें. वर्तमान में आवश्यकता है कि खेल प्रशासन उनके अनुसार काम करे. एथलीटों के लिए चीजें आसान होनी चाहिए और ऐसा राज्य, केंद्र, विशेष निकायों के साथ भारतीय नागरिकों के समर्थन के बिना नहीं हो पाएगा.

    बदले में एथलीटों की भी कुछ जिम्मेदारियां बनती हैं. उन्हें सुनिश्चित करने की जरूरत है कि वे अनुशासन के साथ कड़ी मेहनत करेंगे और शॉर्टकट लेने की कोशिश नहीं करेंगे.

    हिमा को मैं यह कहना चाहूंगी कि भले ही आपके पास सबसे अच्छे कोच और कई सलाहकार हैं, जल्द ही आपके पास कई ऑफर भी होंगे लेकिन हमेशा याद रखना कि कड़ी मेहनत का दूसरा कोई विकल्प नहीं होता है. इस महान उपलब्धि के लिए बधाई और भविष्य के लिए ऑल द बेस्ट.

    आज भारत को हिमा दास पर गर्व है लेकिन उनपर उम्मीदों का बोझ लादने से पहले हम सुनिश्चित कर लें कि हम उन्हें और उनके जैसे एथलिट को वह प्यार, सम्मान और ध्यान देंगे जिसके वह हकदार हैं ताकि उन्हें भी उनके देश पर गर्व हो.

    (राखी बोस की बातचीत पर आधारित)

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