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लंदन में हुए स्पोर्ट्स बिजनेस समिट में खेलों से जुड़ी क्या-क्या बातें कहीं नीता अंबानी ने, पढ़िए पूरा भाषण

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Updated: October 9, 2019, 4:57 PM IST
लंदन में हुए स्पोर्ट्स बिजनेस समिट में खेलों से जुड़ी क्या-क्या बातें कहीं नीता अंबानी ने, पढ़िए पूरा भाषण
नीता अंबानी इंटरनेशनल ओलिंपिक कमिटी की पहली भारतीय महिला सदस्‍य हैं.

नीता अंबानी (Nita Ambani) ने लंदन (London) में द स्‍पोर्ट बिजनेस समिट (The Sport Business Summit) में 'इंस्‍पायरिंग ए बिलियन ड्रीम्‍स: द इंडिया अपॉर्च्‍युनिटी' विषय पर भाषण दिया

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सम्मानित अतिथिगण, देवियों और सज्जनों – नमस्कार.

मैं आप सभी का तहेदिल से अभिवादन करती हूं. एक भारतीय और महिला होने के नाते मेरे लिए यह गर्व का विषय है कि मुझे यहां दुनियाभर से खेलों में अग्रणी लोगों को संबोधित करने का अवसर मिला है.

मैं गौतम बुद्ध, रबींद्रनाथ टैगोर, महात्मा गांधी और मदर टेरेसा की धरती से आती हूं. मैं एक अरब भारतीयों के सपनों, उम्मीदों और आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करती हूं. भारत में दुनिया की पूरी आबादी का छठवां हिस्सा रहता है. यह दुनिया का सबसे युवा देश है. 130 करोड़ लोगों में से 60 करोड़ लोग 25 साल से कम उम्र के हैं. अगर भारत के युवाओं को ही एक देश के रूप में देखा जाए तो वे दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा देश होंगे. भारत निश्चित रूप से इस वक्त एक अहम मोड़ पर है. यह वक्त भारत का है.

भारत हरेक क्षेत्र में नई ऊंचाइयां छू रहा है, इसमें विशेष तौर पर खेल भी शामिल हैं. दोस्तो, मैं इस समिट के आयोजकों की आभारी हूं कि उन्होंने इस सम्मानित जनसमूह के समक्ष मुझे अपने विचार और अनुभव साझा करने का मौका दिया. उन्होंने मुझे भारतीय खेलों की फर्स्ट लेडी के तौर पर आदरपूर्वक संबोधित किया है. मेरी यहां मौजूदगी भारत की सभी महिलाओं के लिए सम्मान की बात है और भारत की हर महिला को सशक्त और सक्षम बनाना मेरा मिशन है. मैं मानती हूं कि महिलाओं में विलक्षण शक्ति होती है. मैं मानती हूं कि जब महिलाएं, महिलाओं को सहारा देती हैं तो असाधारण बदलाव होते हैं. मैं मानती हूं कि महिलाएं न सिर्फ खेल खेलने में बल्कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेलों के प्रोत्साहन में भी बढ़-चढ़कर योगदान दे सकती हैं.



आज भारतीय महिलाएं मानवीय प्रयासों में अधिक से अधिक क्षेत्रों में बनी हुई सीमाओं को तोड़ रही हैं. बल्कि पूरी दुनिया की महिलाएं खेल और विज्ञान, कंपनियों के बोर्डरूम, अदालतों, बॉलीवुड और हॉलीवुड, राजनीति और सामाजिक कार्यों समेत हर क्षेत्र और हर जगह बेहतरीन काम कर रही हैं.

साथियो, रिलायंस फाउंडेशन में मेरे काम के जरिए, मुझे महिलाओं और बच्चों के साथ नजदीकी से काम करने का अवसर मिला है. मुझे पक्का भरोसा है कि जब बच्चों को सीखने और खेलने का मौका मिलता है तो समुदाय प्रगति करते हैं और देशों में समृद्धि आती है. बच्चों के व्यक्तित्व के संपूर्ण विकास के लिए एक आजमाया हुआ नुस्खा यह है कि उन्हें खेलने दें, कोई भी खेल. खेल एक शिक्षक है. भारत जैसे युवा देश में आकांक्षाएं बेहद साहसी हैं, कुछ हासिल करने की भूख इतनी जबरदस्त है कि आप बस सही दिशा दे दें तो वे दुनिया की अब तक की सबसे सफल और चौंकाने वाली कहानियां लिख सकते हैं.
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दोस्तो, खेलों के साथ मेरा जुड़ाव उस उम्र में शुरू हुआ जब ज्यादातर खिलाड़ी रिटायर हो जाते हैं. मैं 44 साल की थी जब खेलों ने मेरी जिंदगी, मेरा नजरिया और मेरी दुनिया को देखने की सोच बदल दी. इस सबकी शुरुआत 2009 में क्रिकेट से और मुंबई इंडियंस (एमआई) के साथ हुई. यह आईपीएल यानी इंडियन प्रीमियर लीग का दूसरा सीजन था. हमारी टीम तालिका में सबसे नीचे थी. मेरे पास क्रिकेट की कोई समझ नहीं थी, लेकिन मैं दक्षिण अफ्रीका गई ताकि टीम को प्रोत्साहित किया जा सके और ऐसे वक्त में उनके साथ खड़ा रहा जाए जब वे निराश हैं. टीम के साथ उन कुछ शुरुआती मुलाकातों, क्रिकेट के महान खिलाड़ियों से खेल के बारे में छोटी-बड़ी चीजों को जानने से लेकर आज के दिन तक जब एमआई चार आईपीएल खिताबों के साथ भारत की सबसे मूल्यवान टीम है, मेरी यात्रा बेहद शानदार रही है. इस यात्रा के जरिए मैंने यह अनुभव किया है कि क्रिकेट वास्तव में भारत में एक धर्म की तरह है.



हालांकि,  ब्रिटिश लोगों ने हमें क्रिकेट दिया, लेकिन मैं गर्व के साथ यह कह सकती हूं कि टेस्ट क्रिकेट और एकदिनी मैचों में सबसे ज्यादा रन बनाने वाला शख्स एक भारतीय- सचिन तेंदुलकर हैं. मुझे यह कहते हुए गर्व है कि सचिन शुरुआत से ही मुंबई इंडियंस टीम के कैप्टन थे और उसके बाद से वह इस टीम के मेंटॉर हैं. एमआई ने मुझे सिखाया कि खेल भेदभाव नहीं करता, खेल धर्म या जाति नहीं जानता, टैलेंट कहीं से भी आ सकता है और शिखर पर पहुंच सकता है.

मैं यहां आपके साथ एक युवा लड़के की कहानी साझा करना चाहूंगी जिसकी खोज मुंबई इंडियंस टीम ने भारत के एक छोटे से कस्बे से की. (यह कहानी जसप्रीत बुमराह की है)

आज बुमराह लाखों लड़कों और लड़कियों के लिए प्रेरणा हैं. गुजरे दस सालों में एमआई ने हार्दिक पंड्या, क्रुणाल पंड्या समेत कई युवा टैलेंट्स की खोज की है. मैं एक दिन की कल्पना करती हूं जब देश के सबसे सुदूर गांव का बच्चा भी सपना देख सके और उसे बड़ी हकीकत में तब्दील कर सके.

साथियों, आज खेलों के जरिए पूरी दुनिया में महिलाओं का सशक्तिकरण हो रहा है. ज्यादातर खेलों की तरह ही क्रिकेट भी पुरुषों के दबदबे वाला खेल रहा है, यहां तक कि क्रिकेट का घर माने जाने वाले लॉर्ड्स के पवेलियन में भी महिलाओं का स्वागत 1999 में जाकर हो पाया और पिछले साल ही महिलाओं को इसकी पूर्ण सदस्यता की पेशकश हुई.


भारत जैसे पारंपरिकता भरे समाज में यह बदलाव कहीं ज्यादा नाटकीय रहा है. दस साल पहले जब आईपीएल भारत में शुरू हुआ, तब बड़े स्तर पर केवल पुरुष ही इसे देखते थे. 10 साल बाद हम क्रिकेट के फैन बेस में एक बड़ी विविधता देख रहे हैं. बल्कि ऐसा भारत में हर खेल के साथ हो रहा है. आज आईपीएल को पसंद करने वाली महिलाओं की तादाद पुरुषों जितनी ही है. यह मामला केवल क्रिकेट का फैन होने तक सीमित नहीं है, भारत की महिलाओं की क्रिकेट टीम अब इंग्लैंड के बाद रैंकिंग में दुनिया की दूसरे नंबर की टीम बन गई है.

दोस्तो, रिलायंस फाउंडेशन और एमआई की एक सबसे खूबसूरत मुहिम ‘एजुकेशन एंड स्पोर्ट्स फॉर ऑल प्रोग्राम’ है. इसमें खासतौर पर कमजोर तबके और दिव्यांग बच्चों के लिए खेल और पढ़ाई को एक साथ जोड़ा गया है. ईएसए मुहिम के तहत हर साल हम 21,000 ऐसे बच्चों को उनकी पसंदीदा टीम एमआई को खेलते देखने के लिए बुलाते हैं. इन सभी के लिए स्टेडियम में लाइव मैच देखने का यह पहला मौका होता है. इस दिन इन बच्चों को बेहद खुशी होती है और उनकी उम्मीदें जागती हैं. ये बच्चे न सिर्फ अपने चहेते सितारों को अपनी आंखों में बसाकर घर जाते हैं, बल्कि उनमें यह भरोसा भी जागता है कि वे भी सपने देख सकते हैं और उन्हें पूरा कर सकते हैं. आइए ईएसए के जादू को महसूस करें.

एजुकेशन एंड स्पोर्ट्स फॉर ऑल (ईएसए) वास्तव में एमआई की आत्मा है.
साथियों, जीवन का एक शाश्वत नियम है कि एक क्षेत्र में सफलता आपको कई दूसरे क्षेत्रों में सफलता के लिए उत्साहित करती है. आईपीएल की लोकप्रियता से भारत में हॉकी, बैडमिंटन, वॉलीबॉल, बास्केटबॉल, कबड्डी और फुटबॉल जैसी दूसरी प्रोफेशनल लीग उभरी हैं. एक शिक्षक और एक मां के रूप में मैं जानती हूं कि हमारे स्कूल में बच्चे आधी रात में जागकर ईपीएल देखते हैं, मैंने अपने बेटे आकाश को भी ऐसा करते देखा है. तब मुझे अहसास हुआ कि युवा पीढ़ी की फुटबॉल में गहरी दिलचस्पी है और मुझे भारत में इस खेल के लिए एक बड़ा अवसर नजर आया. इससे मुझे फुटबॉल के लिए 2014 में इंडियन सुपर लीग लॉन्च करने का प्रोत्साहन मिला. मुझे यह बताते हुए खुशी हो रही है कि केवल पांच साल में ही आईएसएल भारत में तीसरी सबसे ज्यादा देखी जाने वाली लीग बन गई है.


आईएसएल की 2018-19 में टेलीविजन पर ही व्यूअरशिप 16.8 करोड़ थी और इसकी डिजिटल व्यूअरशिप 1.20 करोड़ से ज्यादा थी. आईएसएल के आने के बाद से भारत की राष्ट्रीय टीम की फीफा रैंकिंग 173 से उछलकर 96 पर आ गई. अब मेरा सपना भारत को विश्व स्तर पर आकाश छूते और फीफा वर्ल्ड कप के लिए क्वालिफाई करते देखने का है. इसके लिए देश में एक ईकोसिस्टम को विकसित करने की जरूरत है. आईएसएल का यही विजन है.

फुटबॉल में हमारा ग्रासरूट प्रोग्राम 15 लाख बच्चों तक पहुंच चुका है. स्कूलों और कॉलेजों के लिए हमारे व्यापक स्पोर्ट्स प्रोग्राम करीब 90 लाख बच्चों तक पहुंचे हैं. रिलायंस फाउंडेशन जूनियर एनबीए प्रोग्राम 1.1 करोड़ बच्चों तक पहुंचा है. कुल मिलाकर, सभी खेलों में रिलायंस फाउंडेशन देशभर के 2.15 करोड़ बच्चों तक पहुंचा है.

दस साल पहले किसी भारतीय परिवार के लिए अपने बच्चे के लिए फुटबॉल को एक अच्छे करियर के तौर पर सोचना मुमकिन नहीं था. युवा बच्चे और बच्चियां सिलिकॉन वैली में भरे पड़े हैं, लेकिन वे अंतरराष्ट्रीय खेलों के शीर्ष पर दिखाई नहीं देते.



मित्रों, सभी भारतीयों विशेषतः महिलाओं और बच्चों के सशक्तिकरण के लिए आज से दस साल पहले मेरे पति मुकेश अंबानी और मैंने रिलायंस फाउंडेशन की शुरुआत की थी. भारत के दूरस्थ गांवों और कस्बों के अलग-अलग हिस्सों में काम करते हुए हमें 3.4 करोड़ लोगों तक पहुंचने का विशेषाधिकार प्राप्त हुआ है. वह प्रत्येक व्यक्ति जिसके जीवन को हम छू पाए हैं, उसने युवा शक्ति में हमारे भरोसे को और भी ज्यादा मजबूत किया है.

महान भारतीय तत्ववेत्ता स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि अपने शरीर को मजबूत बनाओ, खेलकूद में हिस्सा लो, फुटबॉल खेलो. भगवद् गीता को पढ़ने की अपेक्षा फुटबॉल से ईश्वर के करीब जल्दी पहुंचा जा सकता है. आज का भारत कई क्षेत्रों में हमारे पारंपरिक ज्ञान की खोज कर रहा है जिसमें खेलकूद भी शामिल है.

संसार का कोई भी देश सरकार के मजबूत समर्थन के बिना एक बड़ी खेल की ताकत के रूप में नहीं उभर सकता. इस समय भारत में हम सभी भाग्यशाली हैं क्योंकि हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पास भारत में खेल को एक वैश्विक शक्ति में बदलने की व्यापक दृष्टि है. विश्व स्तर पर योग को बढ़ावा देने के अतिरिक्त, प्रधानमंत्री ने खेलकूद को बढ़ावा देने के लिए हाल ही में दो नई पहल की हैं. पहला ‘खेलो इंडिया’ प्रोग्राम है और दूसरा महत्वकांक्षी प्रोग्राम  ‘फिट इंडिया’ है. डिजिटल क्रांति के द्वारा की गई इन पहलों की मदद से भारत का परिदृश्य तेजी से बदल रहा है.

डिजिटल रूप से जुड़े होने में भारत पूरे विश्व में दूसरे स्थान पर है. जियो- जो रिलायंस की एक नई पहल है और भारत में डिजिटल सेवाएं देने वाली सबसे बड़ी कंपनी है वहीँ विश्व में दूसरे नंबर की सबसे बड़ी मोबाइल कंपनी है.


जियो अनेक डिजिटल प्लेटफॉर्म बना रहा है और अनगिनत क्षेत्रों में समाधान दे रहा है जिसमें खेलकूद, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं भी हैं. जमीनी स्तर पर और युवाओं से जुड़े विकास के कार्यों में सरकार और निजी क्षेत्रों के द्वारा किए गए प्रयासों के परिणाम अब दिखाई देने लगे हैं. हमारे युवा भारतीय खिलाड़ियों ने अपने खेल से सारे विश्व को चौंका दिया है. केवल जुलाई के महीने में भारतीय एथलीटों ने विश्व स्तर पर 200 से ऊपर मैडल जीते हैं और इनमें से ज्यादातर महिलाएं हैं.

हमारी 19 साल की धाविका हिमा दास ने केवल 20 दिनों के समय में यूरोप की ट्रैक स्पर्धाओं में पांच गोल्ड मेडल जीते हैं. बिना संसाधनों के बड़े होते हुए हिमा दास के पास जूते खरीदने के पैसे भी नहीं थे, उन्होंने नंगे पैर प्रैक्टिस की. आज वह केवल गोल्ड विजेता ही नहीं बल्कि एडिडास शूज की ब्रांड एम्बेसेडर भी हैं. यह खेल की शक्ति है.



मित्रों, अभी जो वक्त चल रहा है वह शायद भारत में खेलकूद का सबसे रोमांचकारी समय है, चाहे आप खिलाड़ी हों,  एक कोच हों, एक निवेशक हों, एक प्रशासक या प्रशंसक हों, इस तरह का माहौल कभी नहीं रहा है जो पहले के समय की तुलना में कहीं ज्यादा अनुकूल, प्रोत्साहित करने वाला और खेलों को समर्थन देने वाला है. सच्चे अर्थों में विश्व में भारत एक नई युवा खेल की शक्ति के रूप में उभर रहा है और हमारे संख्या बल की शक्ति इसे और ज्यादा मनोहारी और बेहतर बनाती है.

हमारा देश टेलीविज़न से प्यार करने वाला है. मैं भारत में खेल से जुड़ी मीडिया की शानदार विकास यात्रा आपसे बांटना चाहूंगी. पहले के दस सालों में आईपीएल के मीडिया राइट्स 950 मिलियन अमेरिकी डॉलर में बिके थे. पिछले साल आईपीएल के अगले पांच सालों के मीडिया अधिकार 2.5 बिलियन यूएस डॉलर में बेचे गए हैं. यह 500  प्रतिशत की चौंका देने वाली वृद्धि है, क्या यह शानदार नहीं है?

2019 क्रिकेट के वर्ल्ड कप के फाइनल में जब इंग्लैंड न्यूजीलैंड को हराता है, इंग्लैंड में डेढ़ करोड़ लोग टीवी पर इस मैच को देख रहे होते हैं मगर इसी मैच को भारत में 18 करोड़ लोग टीवी पर देख रहे थे. अब कल्पना करिए कि यदि इंग्लैंड को कड़ी टक्कर देने के बाद भारत फाइनल में पहुंचता तो यह संख्या आसमान छू रही होती.



दर्शकों की संख्या का यह आकार और पैमाना केवल क्रिकेट के लिए नहीं है. ओलिंपिक, फीफा वर्ल्ड कप, ईपीएल और दूसरी अन्य खेलकूद स्पर्धाएं सही में भारत को एक अनोखा अवसर देती हैं. 2018 में 80 करोड़ भारतीयों ने टीवी पर खेल देखा.

दोस्तो, तेजी से बदलते खेलकूद के इस परिवेश की जो तस्वीर मैंने आपके सामने पेश की है उससे आप सभी एक चीज के बारे में आश्वस्त होंगे- नया भारत अनंत अवसरों की भूमि है. खेलों ने अनेक उभरते व्यवसायों और पेशों को जन्म दिया है जैसे कोच, फिजियो, तकनीकी विशेषज्ञ, मीडिया और मर्चेंडाइजिंग; नया भारत वह ज़मीन है जो आप सभी का खुली बाहों से स्वागत करता है. भारत आपके लिए प्रजातंत्र, विविधता, डेमोग्राफी और विकास का अनोखा मेल पेश करता है.

एक दशक के भीतर भारत सबसे ज्यादा जनसंख्या वाले देश के तौर पर चीन को पीछे छोड़ देगा. एक आज़ाद, खुला, उदार और प्रजातांत्रिक देश होने पर भारत को गर्व है. वह समय अब दूर नहीं जब भारत आने वाले पांच सालों में अपनी जीडीपी को दुगना करके इसे पांच ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था के महत्वाकांक्षी लक्ष्य तक पहुंचने के साथ विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा. खेलों की दुनिया में विख्यात अग्रणी जन, क्या इन सभी अनोखे अवसरों के साथ आप भारत से दूर रह सकेंगे? उत्तर स्पष्ट है- नहीं.


इस संबोधन का अंत करते हुए मैं आप सभी के साथ भारत में खेलों के भविष्य के बारे में अपने विज़न को बांटना चाहूंगी. मेरे तीन सपने हैं. मेरा पहले सपना है कि मैं भारत के किसी भी बच्चे को खेलकूद के आनंद और रोमांच को अनुभव करने और इससे सीखने के अवसर से वंचित नहीं देखना चाहती. मैं देखना चाहूंगी कि शिक्षा के अधिकार के साथ-साथ, खेलकूद के अधिकार को भी हमारे संविधान में मूलभूत अधिकार के तौर पर शामिल किया जाए. गरीब और हाशिये पर रखे क्षेत्रों और परिवारों के बच्चों तक पहुंचना मेरी प्राथमिकता है. हमारे सभी बच्चों के लिए इस तरह के अवसरों का निर्माण करने के लिए मैं व्यक्तिगत तौर पर समर्पित हूं. हमारे बच्चों को फिट, स्वस्थ और खुश रखना हर समाज का मूलभूत कर्तव्य है. भारत के 30 करोड़ बच्चों को खेलकूद के अधिकार को समर्थन देने को मैं अपना धर्म समझती हूं, यह मेरा कर्तव्य है. ये बच्चे हमारे देश का भविष्य हैं और आने वाले कल का खूबसूरत चेहरा हैं.
वास्तविकता में, न केवल बच्चे, ईसीए का मेरा सपना हर आयु वर्ग के लोगों के लिए है - बच्चों से लेकर माता-पिता और दादा-दादी भी. आइए, हम सब मिलकर स्पोर्ट्स और फिटनेस के लिए एक आंदोलन की शुरुआत करें और यूनाइटेड नेशंस से इसे सतत विकास के लक्ष्य के तौर पर शामिल करने की अपील करें.

मेरा दूसरा सपना है- मैं भारत को वैश्विक खेलकूद का पावर हाउस बनते देखना चाहती हूं. कोई भी कारण नहीं है कि क्यों 1.3 अरब लोगों का यह देश अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मेडल जीतने वालों में अग्रणी नहीं बन सकता. यह मेरी उम्मीद और सपना है कि भारत को विश्व की खेलकूद की सबसे प्रतिष्ठित चैंपियनशिप जैसे ओलिंपिक और फीफा वर्ल्ड कप का आयोजन करते देखूं.

अभी चार दिन पहले रिलायंस फाउंडेशन एनबीए को पहली बार भारत लेकर आया है. इसी तरह आप सबको मैं आमंत्रित करती हूं कि आप भी हमारे साथ जुड़िए और इस महान भारत के सपने का हिस्सा बनिए.



मेरा तीसरा सपना यह है कि खेलकूद दूसरों को प्रेरित करने और उनमें बदलाव लाने के लिए शांति, मेलजोल और आपसी समझदारी बढ़ाने के अपने सबसे महत्वपूर्ण वैश्विक लक्ष्य पर काम करे. रियो ओलिंपिक 2016 को परिभाषित करने वाला क्षण वह था जब पहली रिफ्यूजी ओलिंपिक टीम ने ओलिंपिक के झंडे के नीचे एक साथ मार्च किया. उनके सबसे बुरे वक्त में खेलकूद ने उन्हें हिम्मत और भरोसा दिया. उनके रिफ्यूजी कैंप खेलों के मैदान बन गए. यह एकजुटता और मानवता पर बल देने वाला क्षण था. यह खेलों की अनोखी शक्ति के बारे में बताता है जो बदलाव का दूत बन सकता है और अलग देशों और संस्कृतियों के बीच और उनके अंदर भी आशा, एकता और शांति ला सकता है.

अगर आप समय में थोड़ा पीछे आठवीं शताब्दी ईसापूर्व में जाएं तो पाएंगे कि प्राचीन ग्रीक में ओलिंपिक खेलों के समय एक पवित्र युद्धविराम संधि की घोषणा की जाती थी. सभी युद्धरत देश अपने हथियार नीचे डाल देते थे और खेल सभी युद्धों पर विराम लगाने वाला सबसे बड़ा हथियार बन जाता था.
सच में, शांति को बढ़ावा देने वाली खेलों की शक्ति उतनी ही पुरानी है जितनी हमारी सभ्यता. क्या खेलों की यह ताकत आज भी उतनी ही प्रासंगिक नहीं है?

इस साल महात्मा गांधी की 150वीं जन्मशती है जो आधुनिक समय के सबसे बड़े शांति के पुजारी माने जाते हैं. महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि देते हुए मैं आप सभी से कहती हूं - हम सभी मिलकर युद्ध की जगह खेल को लाएं. हम सभी विश्व के सभी युद्ध के मैदानों को खेल के मैदानों में बदलें. युवा लड़कों और लड़कियों को उनके सपनों पर भरोसा करने की हिम्मत दें जिससे वे स्वयं अपने भाग्य के निर्माता बन सकें. हम अपने पीछे अपने बच्चों के लिए एक ज्यादा शांतिपूर्ण, ज्यादा सुन्दर और ज्यादा सतत खुशियों से भरा संसार छोड़ कर जाएं.

 

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First published: October 9, 2019, 4:57 PM IST
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