सायना नेहवाल: वो खिलाड़ी जिसने देश में बदल दी बैडमिंटन की तस्वीर

सायना नेहवाल: वो खिलाड़ी जिसने देश में बदल दी बैडमिंटन की तस्वीर
सायना नेहवाल ने बैडमिंटन कई बड़ी उपलब्धियां हासिल की हैं

सायना नेहवाल (Saina Nehwal) ने 2012 लंदन ओलिंपिक (London Olympic) में ब्रॉन्ज मेडल जीता है

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नई दिल्ली. साल 2010 से पहले भारत (India) में बैडमिंटन की दुनिया में उपलब्धियां तो हासिल की लेकिन वह देश में इस खेल को विश्व स्तर पर ख्याति दिलाने में काफी नहीं था. सैयद मोदी, प्रकाश पादुकोण (Prakash Padukone) और पुलेला गोपीचंद (Pullela Gopichand) ने देश को कुछ अहम मेडल दिलाए लेकिन फिर भी बैडमिंटन देश में वह मुकाम हासिल नहीं कर सका जो उसके पास आज है. यह सब बदला जब गोपीचंद ने कोच बनकर अपनी एकेडमी शुरू की. उनकी इस अकेडमी से निकली सायना नेहवाल (Saina Nehwal) भारत में इस खेल का नया चेहरा बन गईं जिन्होंने युवा पीढ़ी को इस खेल में आगे बढ़ने का हौंसला दिया.

गोपीचंद की अकेडमी से शुरू हुआ था सायना का सफर
सायना (Saina Nehwal) के पिता हरियाणा के एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी में काम करते थे. जब सायना आठ साल की थी तब उनके पिता का ट्रांसफर हैदराबाद में हो गया. हैदराबाद पहुंच सायना शुरुआत में कराटे सीखा करती थी. हालांकि कुछ दिनों के बाद ही उनके माता-पिता ने देखा कि आस-पास के बहुत से बच्चे बैडमिंटन खेलने जाया करते थे तो सायना ने भी बैडमिंटन कैंप ज्वॉइन कर लिया. इस कैंप में ही  कोच ने सायना के पिता से कहा कि वह काफी प्रतिभाशाली हैं और उन्हें पूर्व बैडमिंटन खिलाड़ी पुलेला गोपीचंद की अकेडमी में ट्रेनिंग के लिए जाना चाहिए. यह अकेडमी दूर थी लेकिन सायना (Saina Nehwal) के लिए माता-पिता हर तरह के संघर्ष के लिए तैयार थे.

सायना नेहवाल ने अंतरराष्ट्रीय स्तर बढ़ाया देश का मान
यहां से सायना नेहवाल के सफर की शुरुआत हो गई. साल 2006 में  वह अंडर19 नेशनल चैंपियन बनी और साथ ही एशियन सैटेलाइट बैडमिंटन टूर्नामेंट जीतने वाली पहली खिलाड़ी बनी. सायना नेहवाल ने साल 2006 में पेशेवर तौर पर इस खेल को अपनाया था और आज तक इस खेल ने नेहवाल को बहुत सी उपलब्धियों से नवाज़ा है, इस जुनून ने नेहवाल को 24 अंतराष्ट्रीय खिताबों से नवाज़ा है और हर खिताब को भारत ने बेहद जोश से मनाया है. वह बीडब्ल्यूएफ वर्ल्ड जूनियर चैंपियनशिप जीतने वाली एकमात्र भारतीय हैं. फिर आया साल 2010 का वो लम्हा जिसने सायना को घर-घर का नाम बना दिया.



दिल्ली में हुए कॉमनवेल्थ खेलों में सायना ने गोल्ड मेडल जीतकर बताया कि वह क्रिकेट के अलावा भी भारतीय खिलाड़ी दुनिया में अपनी पहचान बना सकते हैं. सायना का यह सफर कॉमनवेल्थ से ओलिंपिक तक जा पहुंचा. साल 2012 में लंदन में हुए ओलिंपिक खेलों में सायना ने ब्रॉन्ज मेडल हासिल किया. अपने 14 साल के करियर में नेहवाल ने भारत को और इस खेल में बहुत सम्मान दिलाया है. अगर इस खिलाड़ी ने भारत के गौरव को बढ़ाया है तो भारत ने भी पलट कर इस खिलाड़ी को राजीव गांधी खेल रत्न, अर्जुन अवार्ड और पद्म भूषण से नवाज़ा है.

सायना की राह पर चली पीवी सिंधु
सायना की कामयाबी ने भारत में इस खेल को नई पहचान दी जो प्रकाश पादुकोण और गोपीचंद बतौर खिलाड़ी नहीं कर पाए. सायना के बाद खासतौर पर गोपीचंद की अकेडमी से कई बड़े नाम निकले. सिर्फ सिंग्लस में ही नहीं डबल्स वर्ग में भी खिलाड़ियों ने अपना डंका बजाया. ज्वाला गुट्टा, परुपल्ली कश्यप, अश्विनी पोनाप्पा जैसे खिलाड़ियों ने भी देश के लिए कई खिताब जीते. सायना के बाद पीवी सिंधु (PV Sindhu) ने देश में इस खेल की लोकप्रियता को और बढ़ाया. जहां सायना नेहवाल घर घर का हिस्सा बन गईं थी वहीं सिंधु को खेलते हुए 4 साल हुए थे. जहां नेहवाल ने लंदन गेम्स ब्रॉन्ज़ मेडल जीता था वहीं चार साल बाद सिंधु ने ओलिंपिक गेम्स में सिल्वर मेडल हासिल कर अपने होने का प्रमाण दिया.
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