गरीबी, माता-पिता की बीमारियों से लड़ते हुए ऊंचा किया भारत का नाम, अब मिला सम्मान

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Updated: August 30, 2019, 4:33 PM IST
गरीबी, माता-पिता की बीमारियों से लड़ते हुए ऊंचा किया भारत का नाम, अब मिला सम्मान
29 अगस्त को खेल अवॉर्ड दिए जाते हैं

खेल अवॉर्ड (Sports Award) 29 अगस्त को हॉकी के महान खिलाड़ी ध्यानचंद (Dhyanchand) के जन्मदिन पर मनाए जाने वाले खेल दिवस पर दिए जाते हैं

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  • Last Updated: August 30, 2019, 4:33 PM IST
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भारतीय खेल मंत्रालय ने इस साल के खेल अवॉर्ड विजेताओं की घोषणा कुछ दिन पहले कर दी थी जिन्हें गुरुवार को खेल दिवस के मौके पर सम्मानित किया गया. यह अवॉर्ड 29 अगस्त को हॉकी के महान खिलाड़ी ध्यानचंद के जन्मदिन पर मनाए जाने वाले खेल दिवस पर दिए जाते हैं. इस अवॉर्ड में सबसे अहम राजीव गांधी खेल रत्न अवॉर्ड है जो इस साल दो खिलाड़ियों को दिया गया है.

पैरा ओलिंपियन दीपा मलिक और रेसलर बजरंग पुनिया को उनके पिछले चार साल के प्रदर्शन के लिए इस अवॉर्ड से सम्मानित किया गया. वहीं पिछले एक साल में शानदार प्रदर्शन करने के लिए 19 खिलाड़ियों को अर्जुन अवॉर्ड से सम्मानित किया गया.  छह कोच को खेलों के लिए उनकी सेवाओं के लिए द्रोणाचार्य अवॉर्ड दिया गया है. इन विजेताओं में कई ऐसे खिलाड़ी हैं जिन्होंने अपनी जिंदगी की तमाम मुश्किलों के बीच देश का नाम रोशन किया है. जानिए ऐसी ही कुछ कहानियां

दीपा मलिक (राजीव गांधी खेल रत्न अवॉर्ड) - पैरा ओलिंपिक में पहला सिल्वर मेडल जीतने वाली दीपा मलिक 1999 में बीमार हो गई थीं. इसी समय उनके पति कारगिल की जंग पर थे. दीपा मलिक की तीन ट्यूमर सर्जरी हुईं और वह मौत से जंग जीत गईं. ट्यूमर के कारण दीपा के अब तक 31 ऑपरेशन हो चुके हैं और उनकी कमर और पांव के बीच 183 टांके लगे हुए हैं.

हालांकि इसके बावजूद  उन्होंने खेल की ओर अपना ध्यान लगाया और देश के लिए मेडल जीते. उनका नाम अब तक चार बार लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में आ चुका है. दीपा खेल में ही आगे नहीं हैं, वह सामाजिक कार्य करने के साथ-साथ लेखन भी करती हैं. गंभीर बीमारी से पीड़ित लोगों के लिए कैंपेन भी चलाती हैं और सामाजिक संस्थाओं के कार्यक्रमों में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेती हैं.

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दीपा मलिक ने 2016 में रियो पैरालिंपिक में सिल्वर मेडल जीता था


स्वप्ना बर्मन (अर्जुन अवॉर्ड) - भारत की एथलीट स्वप्ना बर्मन ने इस साल एशियन गेम्स में हेप्टाथलॉन में गोल्ड जीतकर इतिहास रचा है. इस गोल्ड के पीछे की उनके संघर्ष की कहानी काफी प्रेरणादायी है. पश्चिम बंगाल के न्यू जलपाईगुड़ी इलाके की रहने वाली स्वप्ना के पिता एक रिक्शा चालक थे. हालांकि सात साल पहले हार्टअटैक के बाद से वह अब तक बिस्तर पर ही हैं. घर की जिम्मेदारियां स्वप्ना की मां उठाती हैं जो  चाय के बागान में पत्तियां तोड़ने की मजदूरी करती हैं.

गरीबी के अलावा स्वप्ना के लिए उनकी परेशानी उनके पैर भी थे जिसमें दोनों पंजों में छह-छह उंगलियां हैं. पंजे की अतिरिक्त चौड़ाई के चलते उनके लिए सामान्य जूतों का फिट आना बेहद मुश्किल काम है. गरीबी के कारण खास किस्म के जूतों को खर्चा उठा पाना स्वप्ना के बस से बाहर की बात थी. कुछ सामाजिक संगठनों की मदद से स्वप्ना ने अमेरिका से ऐसे खास जूते मंगाकर अपनी ट्रेनिंग का आगाज किया जिसका अंजाम जकार्ता में गोल्ड मेडल के साथ हुआ है.
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स्वप्ना बर्मन ने एशियन गेम्स में हेप्थालॉन में गोल्ड मेडल जीता था


मोहम्मद अनस (अर्जुन अवॉर्ड) - एशियन गेम्स में मिक्स्ड टीम रिले और 4x100 रिले में गोल्ड जीतने वाले मोहम्मद अनस को अर्जुन अवॉर्ड दिया गया. मोहम्मद अनस को खेल विरासत में मिला. अनस की मां शीना खुद स्कूल के जमाने में खेल-कूद में बेहद रूची रखती थीं, तो अनस के पिता  एक एथलीट थे. हालांकि परिवार पालने के लिए उनके पिता ने सेल्समैन की नौकरी पकड़ ली.

कुछ समय बाद हार्टअटैक के कारण उनकी मौत ने अनस को बड़ा झटका दिया. पिता की मौत के समय अनस 10वीं में पढ़ते थे. उस समय पर अनस भी खेल को छोड़कर परिवार संभालने में लग सकते थे, लेकिन उनकी मां ने उन्हें ऐसा नहीं करने दिया. मां के संघर्षों को अनस ने गोल्ड जीतकर पूरा किया.

तेजिंदर पाल सिंह तूर (अर्जुन अवॉर्ड) - पंजाब के मोगा के 23 वर्षीय लंबे-चौड़े एथलीट तेजिंदर पाल सिंह तूर ने पिता के कहने पर  शॉट पुट खेलना शुरू किया और ये उनकी जिंदगी का सबसे अच्छा निर्णय साबित हुआ. उन्होंने जकार्ता एशियन गेम्स में 20.75 मीटर दूर गोला फेंककर गोल्ड मेडल जीता. इस खेल के लिए जिन जूतों का इस्तेमाल होता है उनकी कीमत की शुरुआत ही 10,000 रुपए से होती है और ये जूते दो महीने से ज्यादा चल नहीं पाते हैं.

किसी किसान परिवार के लिए शॉट पुट के खेल के लिए जरूरी साजों-सामान जुटाना आसान काम नहीं था, फिर इस खेल के लिए जिम और उच्च क्वालिटी के सप्लीमेंट्स की भी जरूरत होती थी फिर भी तूर पीछे नहीं हटे. ऊपर से उनके पिता (करम सिंह) कैंसर पीड़ित भी हैं जिनके इलाज पर भी काफी पैसा खर्च होता है. इसके बावजूद उन्होंने अपने कदम पीछे नहीं खींचे. उनके पिता 2015 से कैंसर की जंग लड़ रहे हैं.

जकार्ता एशियन गेम्स में 20.75 मीटर दूर गोला फेंककर गोल्ड मेडल जीता.


रवींद्र जडेजा (अर्जुन अवॉर्ड) - रवींद्र जडेजा का जन्म गुजरात के नवगाम में हुआ. उनके पिता एक प्राइवेट कंपनी में सिक्युरिटी गार्ड थे. बेहद गरीब परिवार में जन्म लेने की वजह से जडेजा  के लिए क्रिकेटर बनने तक का सफर आसान नहीं रहा. जडेजा की मां उन्हें क्रिकेटर बनाना चाहती थी वहीं पिता चाहते थे कि वो आर्मी जॉइन करें. लेकिन तभी अचानक साल 2005 में जडेजा की मां का सड़क हादसे में निधन हो गया, जिसके बाद जडेजा टूट से गए.

जडेजा ने क्रिकेट छोड़ने का मन बना लिया था. लेकिन उनकी बहन नैना और कोच महेंद्र चौहान ने जडेजा का हौसला बढ़ाया और जडेजा ने अपनी मेहनत से भारत को अंडर 19 वर्ल्ड कप जिता दिया. इसके बाद उन्होंने कभी मुड़ कर पीछे नहीं देखा. आज वह भारतीय टीम के शानदार ऑलराउंडर में शामिल हैं.

जानिए इस साल यह अवॉर्ड जीतने वाले सभी लोगों की लिस्ट

पैरा एथलीट दीपा मलिक और रेसलर बजरंग पूनिया को इस साल राजीव गांधी खेल रत्न अवॉर्ड दिया जा रहा है



इस साल खेल दिवस पर 19 खिलाड़ियों को अर्जुन अवॉर्ड दिया जाएगा





इस साल रेगुलर कैटेगरी में तीन और लाइफ टाइम अचीवमेंट कैटेगरी में तीन लोगों को द्रोणाचार्य अवॉर्ड दिया गया है



ध्यानचंद लाइफ टाइम अचीवमेंट अवॉर्ड के विजेता



भारत में खेल दिवस महान हॉकी खिलाड़ी ध्यानचंद के जन्मदिन पर मनाया जाता है. देश के लिए मेडल लाने और नाम रोशन करने वाले खिलाड़ियों को इस दिन राष्ट्रपति भवन में सम्मानित किया जाता है. ध्यानचंद की कप्तानी में भारत ने साल 1928,1932 और 1936 में ओलिंपिक गोल्ड मेडल जीते थे. ध्यानचंद को साल 1956 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था.

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First published: August 30, 2019, 9:10 AM IST
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