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मिल्खा सिंह: जिस एथलीट की उड़ान ने भारतीय युवाओं के सपनों की दी ऱफ्तार

News18Hindi
Updated: May 19, 2020, 12:35 PM IST
मिल्खा सिंह: जिस एथलीट की उड़ान ने भारतीय युवाओं के सपनों की दी ऱफ्तार
मिल्खा सिंह भारतीय एथलीट हैं

मिल्खा सिंह (Milkha Singh) कॉमनवेल्थ गेम्स (Commomwealth Games) में गोल्ड मेडल जीतने वाले पहले भारतीय एथलीट थे

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नई दिल्ली. साल 1958 में हर चार साल में होने वाले कॉमनवेल्थ खेलों (Commonwealth Games) का आयोजन वेल्स (Waled) के कार्डिफ में हुआ था. इन खेलों में भारत की ओर से हिस्सा लेने वालो में मिल्खा सिंह (Milkha Singh) नाम का एथलीट भी शामिल था. इन खेलों में 400 मीटर की रेस से पहले यह नाम दुनिया के लिए अपरिचित था लेकिन इस रेस के खत्म होते ही मिल्खा सिंह के उस सफर की शुरुआत हुई जिसने उन्हें 'फ्लाइंग सिख' बना दिया. पंजाब के इस आम से दिखने वाले लड़के ने बिना प्रॉपर ट्रेनिंग के साउथ अफ्रीका (South Africa) के दिग्गज माने जाने वाले मैल्कम स्पेंस को पछाड़ते हुए इतिहास रच दिया. मिल्खा ने कॉमनवेल्थ गेम्स में आजाद भारत का पहला गोल्ड मेडल अपने नाम किया.

संघर्षों के बीच लिखी जीत की इबादत
मिल्खा सिंह (Milkha Singh) का जीवन काफी संघर्षों भरा रहा और एथलेटिक्स ने ही उन्हें इन सब से लड़ने की हिम्मत दी. उनके संघर्षों ने भारत में युवाओं को इस खेल से जुड़ने की प्रेरणा दी और आत्मविश्वास दिया कि भारत किसी भी लिहाज से इस खेल में बाकियों से कम नहीं है. 15 भाई बहनों में से एक मिल्‍खा सिंह ने बंटवारे से पहले अपने 8 भाई बहनों को खो दिया था. बंटवारे के समय हुई हिंसा में उन्होंने माता पिता, एक भाई और दो बहनों को अपने सामने जलते देखा. वह अनाथ हो गए और फिर हमेशा के लिए भारत आ गए.

यहां पर उनका एक नया सफर शुरू हुआ . एथलीट बनने से पहले मिल्‍खा सिंह कुछ समय तक अपनी शादीशुदा बहन के परिवार के साथ रहा करते थे. यहां से जाने के बाद उन्हें कुछ समय तक रिफ्यूजी कैंप में भी रहना पड़ा. आर्मी की स्‍पेशल ट्रेनिंग के लिए चयन होने के बाद उन्हें नई जिंदगी मिल गई. उन्‍होंने तीन ओलिंपिक में भारत का प्रतिनिधित्‍व किया. 1956 मेलबर्न ओलिंपिक, 1960 रोम ओलिंपिक और 1964 टोक्‍यो ओलिंपिक में मिल्‍खा सिंह उतरे.



रोम ओलिंपिक में हार ने बनाया था हिरो


साल रोम ओलिंपिक में लोगों को उम्मीद थी कि मिल्खा सिंह देश के लिए ऐतिहासिक मेडल हासिल करेंगे. वह पांचवीं हीट में दूसरे स्थान पर आए और क्वार्टरफाइनल और सेमीफाइनल में भी उनका स्थान दूसरा रहा. हालांकि फाइनल में मिल्खा अपनी इस कामयाबी को दोहरा नहीं पाए. फाइनल रेस में 250 मीटर तक मिल्खा पहले स्थान पर भाग रहे थे. लेकिन इसके बाद उनकी गति कुछ धीमी हो गई और बाकी के धावक उनसे आगे निकल गए.

मिल्खा सेकंड के चौथे हिस्से से ब्रॉन्ज मेडल से चूक गए थे. मिल्खा इस रेस में उसी एथलीट से हारे जिसे उन्होंने 1958 में मात देकर कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड मेडल जीता था.मिल्‍खा 45.73 सेकंड के साथ चौथे स्‍थान पर रहे थे. यह भारत का 40 साल तक नेशनल रिकॉर्ड रहा था. मिल्खा सिंह साल 2014 में गौड़ा कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड जीतने तक मिल्खा इकलौते भारतीय एथलीट गोल्ड मेडलिस्ट (पुरुष) थे.

भारत को ओलिंपिक में मेडल जीतते देखना मिल्खा की आखिरी इच्छा
हाल ही में एक इंवेंट के दौरान मिल्खा सिंह ने कहा था, 'मैं आज जहां भी जाता हूं वहां बच्चे क्रिकेट खेलते दिखते हैं. हमने बैडमिंटन, कुश्ती और कुछ अन्य खेलों को छोड़कर बाकी खेलों में कभी भी अच्छा प्रदर्शन नहीं किया. मैं चाहता हूं कि सरकार एथलेटिक्स जैसे खेलों को आगे बढ़ाए. मेरी आखिरी ख्वाहिश है कि जो गोल्ड मेडल मैं रोम ओलिंपिक में ले नहीं जीत पाया था, वह मेडल कोई भारतीय जीते. मैं दुनिया छोड़ने से पहले भारत को ओलिंपिक में एथलेटिक्स में गोल्ड मेडल जीतते देखना चाहता हूं.'

मिल्खा सिंह से ही प्रेरणा लेने के बाद भारत को पीटी उषा और अंजू बॉबी जॉर्ज जैसी एथलीट मिली जिन्होंने उनके दिखाए रास्ते पर चलते हुए विश्व स्तर पर भारत का नाम रोशन किया, आज हिमा दास और दुती चंद जैसे एथलीट इस विरासत को आगे बढ़ाने में तत्पर हैं. हालांकि आज भी 'फ्लाइंग सिख' की जगह कोई नहीं ले पाया है. हालांकि इस कोशिश में लगे हुए खिलाड़ियों की संख्या काफी अधिक है.

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First published: May 19, 2020, 12:35 PM IST
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