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Tokyo Olympics: मोहम्मद अली की एक तस्वीर से बदली लवलीना की जिंदगी, अब बनी देश की दूसरी मैरीकॉम

Tokyo Olympics: भारत की लवलीना बोरगोहेन (Lovlina Borgohain) वेल्टरवेट कैटेगरी (64-69 किग्रा) के सेमीफाइनल में पहुंच गई. उन्होंने चीनी ताइपे की निएन चिन चेन को 4-1 से हराया. इस जीत के साथ उनका ब्रॉन्ज मेडल तो पक्का हो गया है. (PIC-AP)

Tokyo Olympics: भारत की लवलीना बोरगोहेन (Lovlina Borgohain) वेल्टरवेट कैटेगरी (64-69 किग्रा) के सेमीफाइनल में पहुंच गई. उन्होंने चीनी ताइपे की निएन चिन चेन को 4-1 से हराया. इस जीत के साथ उनका ब्रॉन्ज मेडल तो पक्का हो गया है. (PIC-AP)

टोक्यो ओलंपिक (Tokyo Olympics) में भारत का एक और मेडल पक्का हो गया. महिला मुक्केबाज लवलीना बोरगोहेन (Lovlina Borgohain) वेल्टरवेट कैटेगरी (64-69 किग्रा) के सेमीफाइनल में पहुंच गई. उन्होंने क्वार्टर फाइनल में पूर्व विश्व चैम्पियन चीनी ताइपे की निएन चिन चेन को 4-1 से हराया.

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    नई दिल्ली. टोक्यो ओलंपिक (Tokyo Olympics) में भारत का एक और मेडल पक्का हो गया है. महिला मुक्केबाज लवलीना बोरगोहेन (Lovlina Borgohain) वेल्टरवेट कैटेगरी (64-69 किग्रा) के सेमीफाइनल में पहुंच गई. इसके साथ उनका कम से कम ब्रॉन्ज मेडल पक्का हो गया. उन्होंने शुक्रवार को क्वार्टर फाइनल में पूर्व विश्व चैम्पियन चीनी ताइपे की निएन चिन चेन को 4-1 से हराया. लवलीना ओलंपिक मेडल जीतने वाली एमसी मैरीकॉम (MC Marykom) के बाद देश की दूसरी महिला मुक्केबाज होंगी. मैरीकॉम ने 2012 के लंदन ओलंपिक में कांस्य पदक जीता था. वहीं, पुरुष वर्ग में 2008 के बीजिंग गेम्स में विजेंदर सिंह (Vijender Singh) ने देश को ब्रॉन्ज मेडल दिलाया था.

    लवलीना पूर्वोत्तर राज्य असम से ओलंपिक खेलों तक जाने वाली पहली महिला बॉक्सर हैं. उनसे पहले शिवा थापा (Shiva Thapa) भी ओलंपिक में खेल चुके हैं. पिछले साल कोरोना संक्रमण की शिकार हुई लवलीना यूरोप में अभ्यास दौरे पर नहीं जा सकी थी. रैफरी ने जैसे ही विजेता के रूप में उनका हाथ उठाया, वह खुशी के मारे जोर से चीख पड़ीं.

    लवलीना की दो बड़ी बहनें किकबॉक्सिंग की चैम्पियन रही हैं
    लवलीना के लिए ओलंपिक तक का सफर आसान नहीं रहा. वो भी छोटे शहरों और गांवों से आने वाले खिलाड़ियों की तरह आर्थिक तंगी का सामना और सामाजिक बंधनों को तोड़ते हुए यहां तक पहुंचीं है. लवलीना का जन्म असम के गोलाघाट जिले में 2 अक्टूबर 1997 को हुआ था. उनके पिता टिकेन छोटे से व्यापारी थे और अपनी बेटी के शौक को सपने को पूरा करने के लिए उन्हें काफी संघर्षों का सामना करना पड़ा. लवलीना की दो बड़ी जुड़वां लिचा और लीमा हैं.

    दोनों किकबॉक्सिंग खेलती थीं. उन्हें देखते हुए ही लवलीना ने भी इस खेल में हाथ आजमाने शुरू किए. दोनों बहनें तो किकबॉक्सिंग की नेशनल चैम्पियन बनीं. लेकिन लवलीना को तो बॉक्सिंग भी पसंद था.

    मोहम्मद अली की कहानी ने बदली लवलीना की जिंदगी
    लवलीना के बॉक्सिंग में आने की कहानी भी काफी दिलचस्प है. पिता एक दिन अखबार में लपेट कर मिठाई लाए थे. उस अखबार में दिग्गज मुक्केबाज मोहम्मद अली (Muhammad Ali) की एक तस्वीर थी. इसके बाद बेटी ने पिता से मुक्केबाज के बारे में पूछा. पिता ने लवलीना को मोहम्मद अली के फर्श से अर्श तक पहुंचने की कहानी सुनाई. इसके बाद लवलीना की पूरी जिंदगी बदल गई और किकबॉक्सिंग छोड़ उनके मुक्केबाज बनने का सफऱ शुरू हुआ.

    Tokyo Olympics: लवलीना ने किक बॉक्सिंग से की थी करियर की शुरुआत, 2012 से बॉक्सिंग को अपनाया

    लवलीना ने किकबॉक्सिंग छोड़ मुक्केबाजी शुरू की
    लवलीना की मुक्केबाजी प्रतिभा को सबसे पहले राष्ट्रीय कोच पोडम बोरो ने उनके स्कूल में स्पोर्ट्स अथॉरिटी द्वारा आयोजित ट्रायल के दौरान देखा था. 2012 में, लवलीना बॉक्सिंग एकेडमी में शामिल हो गईं और पोडम बोरो की निगरानी में ट्रेनिंग शुरू की. 5 साल बाद उन्होंने एशियन चैम्पियनशिप में ब्रॉन्ज मेडल जीता. यहीं से उनका करियर बदला और उन्होंने एक-एक कर सफलता की सीढ़ियां चढ़ना शुरू कीं.

    अगले ही साल 2018 में, उन्होंने नई दिल्ली में हुई इंडिया ओपन इंटरनेशनल बॉक्सिंग में अपना पहला अंतर्राष्ट्रीय स्वर्ण पदक जीता. इस उपलब्धि ने उन्हें 2018 राष्ट्रमंडल खेलों में भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए चुना. उसी साल, लवलीना ने मंगोलिया में उलानबटार कप में रजत पदक जीता, उसके बाद सिलेसियन चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीतकर अपनी काबिलियत साबित की. दोनों ही मेडल उन्होंने 69 किग्रा वेल्टरवेट वर्ग में जीते थे.

    Tokyo Olympics, Boxing: लवलीना बोरगोहेन ने पक्का किया भारत का दूसरा मेडल, सेमीफाइनल में पहुंचीं

    ओलंपिक से पहले मां का किडनी ट्रांसप्लांट हुआ
    टोक्यो ओलंपिक से पहले कुछ महीने लवलीना के लिए काफी मुश्किलों भरे थे. हर खिलाड़ी अपनी ट्रेनिंग में जुटा था. लेकिन उनकी मां का किडनी ट्रांसप्लांट होना था और वे इसके लिए उनके साथ थीं. उन्हें काफी वक्त तक बॉक्सिंग से दूर रहना पड़ा. मां की सर्जरी होने के बाद वो दोबारा रिंग में लौटीं. लेकिन कोरोना की दूसरी लहर के कारण उनकी ट्रेनिंग काफी प्रभावित हुई. कोचिंग स्टाफ के सदस्यों के संक्रमित होने के कारण उन्हें अकेले ही अभ्यास करना पड़ा. उन्होंने वीडियो कॉल पर ट्रेनिंग की. लेकिन लवलीना ने हिम्मत नहीं हारी और बाधाओं को पार कर टोक्यो की उड़ान भरी.

    टोक्यो ओलंपिक में प्री क्वार्टर फ़ाइनल में लवलीना को बाई मिला था, जबकि जर्मनी की खिलाड़ी को हराकर वो क्वार्टर फ़ाइनल में पहुंची थीं और अब मीराबाई चानू के बाद उन्होंने टोक्यो गेम्स में देश के लिए दूसरा मेडल पक्का किया.

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