Dhyanchand Special : पेले, ब्रैडमैन, जॉर्ड्न, अली और ध्यानचंद...फिर भी नहीं भारत रत्न!

विमल कुमार@Vimalwa | News18Hindi
Updated: August 29, 2019, 1:08 PM IST
Dhyanchand Special : पेले, ब्रैडमैन, जॉर्ड्न, अली और ध्यानचंद...फिर भी नहीं भारत रत्न!
मेजर ध्यानचंद को भारत रत्न देने की मांग लंबे समय से की जा रही है. (फाइल फोटो)

हॉकी (Hockey) के जादूगर मेजर ध्यानचंद (Major Dhyanchand) का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है, लेकिन पूरी दुनिया जिस खिलाड़ी के पराक्रम से अभिभूत है उसे अब तक भारत-रत्न से सम्मानित नहीं किया जा सका है.

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फुटबॉल-पेले
क्रिकेट- डॉन बैडमैन
गोल्फ-जैक निकलस
बास्केटबॉल-माइकल जॉर्डन

बॉक्सिंग- मोहम्मद अली

ये वो नाम हैं जो उन खेलों की पहचान बन गए जिन्हें वो खेलते थे. कहतें हैं खेल से बड़ा कोई खिलाड़ी नहीं, लेकिन हर खेल के इतिहास में कम से कम एक ऐसा असाधारण खिलाड़ी जरूर आता है जिससे उस खेल की पहचान को नया आयाम मिलता है. ये वो दिग्ग्ज होते हैं जिनको पैमाना मान लिया जाता है और आने वाली पीढ़ी की महानता को उसी के आधार पर आंका जाता है. हॉकी (Hockey) में ये नाम मेजर ध्यानचंद (Major Dhyanchand) का है. ऐसा शायद भारत जैसे मुल्क में संभव हो कि पूरी दुनिया जिस खिलाड़ी के पराक्रम और शौर्य से अभिभूत है उसे भारत-रत्न से सम्मानित करने में अब तक हिचकिचाहट हो रही है.

दरअसल, ध्यानचंद (Dhyanchand) की अनदेखी करने की शुरुआत उन्हीं के शहर झांसी से होती है. झांसी अब भी भारत के उन शहरों में से है जहां जिंदगी अब भी इत्मिनान से चलती है. ध्यानचंद के घर पहुंचने के बाद एकबारगी यकीन नहीं होता कि हॉकी के महानतम खिलाड़ी का घर है. यूं तो ये किसी आम मध्यमवर्गीय भारतीय के घर जैसा ही है. लेकिन फर्क सिर्फ इतना है कि इसमें हर कोने में ध्यानचंद की याद बसी है. उनके सुख, उनके दुख और उनके जज्बात की यादें..
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भारत को पहली बार 1928 में ओलिंपिक गोल्ड (Olympic Hockey Gold) दिलाने में अहम भूमिका निभाने वाले ध्यानचंद (Dhyanchand) ने कामयाबी की हैट्रिक बनाई. 1932 में भी भारत को गोल्ड मिला और 1936 में जब कप्तान बने तो तानाशाह हिटलर (Hitler) की टीम को उन्हीं के सामने धूल चटाई. कहा जाता है कि बर्लिन में ध्यानचंद ने हिटलर को अपनी जादूगरी से इस कदर मंत्रमुग्ध किया कि आधुनिक इतिहास के इस सबसे क्रूर तानाशाह के दिल में भी, कुछ देर के लिए ही सही, उदारता की लहरें उठने लगी थीं. बेटे अशोक कुमार के मुताबिक- हिटलर ने उन्हें जर्मनी से खेलने का न्यौता दिया जिसे पिताजी ने ठुकरा दिया.

हॉकी (Hockey) के जादूगर मेजर ध्यानचंद (Major Dhyanchand) का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है, लेकिन पूरी दुनिया जिस खिलाड़ी के पराक्रम से अभिभूत है उसे अब तक भारत-रत्न से सम्मानित नहीं किया जा सका है.
मेजर ध्यानचंद का जन्म 29 अगस्त 1905 में इलाहाबाद में हुआ था. (फाइल फोटो)


कहते हैं आंकड़े कभी भी महानता की पूरी कहानी बयां नहीं करते, लेकिन सच ये भी है कई मर्तबा असाधारण आंकड़े किसी खिलाड़ी की अनूठी पहचान भी बन जाते हैं. मसलन क्रिकेट में ब्रैडमैन का 99.96 का बल्लेबाजी औसत. बहरहाल बात हॉकी के जादूगर की हो रही है. 1932 में भारत ने 37 मैचों में 338 गोल किए जिनमें से 133 गोल अकेले ध्यानचंद ने किए. करीब 15 साल बाद ध्यानचंद जब रिटायरमेंट की ओर बढ़ रहे थे, तो उन्होंने एक युवा टीम के साथ ईस्ट अफ्रीका का दौरा किया. 42 मैचों में 61 गोल कर वो उस दौरान भी दूसरे सबसे कामयाब खिलाड़ी थे. ये साफ था कि बढ़ती उम्र का भी उनके कौशल और काबिलियत पर ज़्यादा असर नहीं पड़ा. 1935 में ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के दौरे में भारतीय टीम ने 43 मैचों में 584 गोल किए उनमें से 201 गोल ध्यानचंद के नाम थे. ऐसा हैरतअंगेज खेल देखकर क्रिकेट के महानतम बल्लेबाज सर डॉन ब्रैडमैन भी दद्दा के मुरीद हो गए थे.

आज भी ध्यानचंद की ही याद में हर साल खेल दिवस मनाया जाता है लेकिन अफसोस इस बात का है अब भी इस महानतम खिलाड़ी को भारत-रत्न से नवाजा नहीं गया है।

हॉकी से निकलता था जादू, भारत की गोल मशीन को देख हिटलर से लेकर ब्रैडमैन तक थे हैरान

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First published: August 29, 2019, 1:08 PM IST
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