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बजरंग पूनिया की कहानी: गरीबी के कारण खुराक नहीं मिली, पिता का सपना रह गया था अधूरा

बजरंग पूनिया

बदहाली के दौर से गुजरने के बावजूद बजरंग ने अपने हौसले को पस्‍त नहीं होने दिया और अब हर तरफ उनकी चर्चा हो रही है.

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65 किग्रा फ्री स्टाइल में खेलने वाले भारतीय स्टार पहलवान बजरंग पूनिया ने पिछले एशियन गेम्स (इंचियोन- 2014) में सिल्‍वर मेडल जीता था, लेकिन इस बार युवा पहलवान ने अपने मेडल का रंग बदल दिया है.

उन्‍होंने 18वें एशियाई खेलों के पहले दिन शानदार प्रदर्शन करते हुए पुरुषों की 65 किलोग्राम फ्रीस्टाइल स्पर्धा के फाइनल में जापान के दाइजी ताकातानी को 11-8 से मात देते हुए गोल्‍ड मेडल अपने नाम किया. जबकि अपनी गोल्‍ड मेडल बाउट से पहले बजरंग ने उज्बेकिस्तान के खासानोव सिरोजिद्दीन को 13-3, ताजिकिस्तान के फेजिएव अब्दुलकोसिम को 12-2 और मंगोलिया के एन बाटमागनाई बाचुल्लु को 10-0 से हराया.

जिद से जीता जहां...
शोहरत और कामयाबी कभी भी आसानी से हासिल नहीं होती है. यकीनन इसके लिए ना सिर्फ कड़ी मेहनत करनी पड़ती है बल्कि गरीबी, असुविधा जैसे तमाम विपरीत हालातों से लड़ते हुए खुद का मनोबल ऊंचा रखना पड़ता है. ऐसी है कहानी है 24 साल के पहलवान बजरंग पूनिया की.

हालांकि उन्‍हें कुश्‍ती विरासत में मिली है. दरअसल, उनके पिता बलवान पूनिया भी अपने समय के नामी पहलवान रहे हैं, लेकिन गरीबी के कारण उनका ख्‍वाब अधूरा रह गया. हालात कुछ ऐसे थे कि जरूरी डाइट तक के लाले पड़ जाते थे. यकीनन पिता का अधूरा ख्‍वाब बेटे बजरंग की जिद बन गया और उन्‍होंने अपना एकमात्र लक्ष्‍य देश के लिए मेडल जीतना बना लिया.

गरीबी अभी भी अड़चन पैदा कर रही थी और पिता के पास अपने पहलवान बेटे को घी पिलाने के लिए पैसे नहीं होते थे. बेटे की रूचि देखकर बलवान ने बस के बजाए साइकिल से चलने का फैसला किया, ताकि बेटे की डाइट को बेहतर किया जा सके. इस बदहाली के दौर से गुजरने के बावजूद बजरंग ने अपने हौसले को पस्‍त नहीं होने दिया और अब हर तरफ उनकी चर्चा हो रही है.

दिल्ली के छत्रसाल स्टेडियम में कुश्ती का ककहरा सीखने वाले बजरंग के लिए उनकी मां ओमप्यारी ने चूल्हे की कालिख सहकर  शुद्ध दूध भिजवाया है. हालांकि अब इस परिवार के दिन होनहार पुत्र के कारण बहुर गए हैं. बलवान के दो ही बेटे हैं. एक बजरंग और बड़ा बेटा हरेंद्र. हरेंद्र उनके साथ तीन एकड़ खेती में हाथ बंटाता है.

योगेश्‍वर हैं गुरु
पहलवानी के शुरुआती दौर में बजरंग ने अपनी मेहनत में कोई कसर नहीं रखी तो भगवान ने उनकी मदद के लिए चार बार ओलंपिक के मैदान में उतरने वाले पहलवान योगेश्‍वर दत्‍त को दूत के रूप में भेज दिया. यह युवा पहलवान पिछले काफी समय से योगेश्‍वर के अखाड़े में उन्‍हीं की देखरेख में ट्रेनिंग करता है. जबकि योगेश्‍वर के बीच गुरु और चेले का नहीं बल्कि पिता और बेटे जैसा रिश्‍ता है. जी हां, एशियन गेम्‍स 2018 में फाइनल में पहुंचने पर योगेश्‍वर ने ट्वीट करते हुए लिखा, ' फाइनल में पहुंचने पर बहुत-बहुत शुभकामनाएं बेटे बजरंग पूनिया. हिंदुस्‍तान की गोल्‍ड की उम्‍मीद.गो4गोल्‍ड.'

बजरंग का दम
इस खिलाड़ी ने वर्ल्‍ड चैंपियनशिप 2013 में ब्रॉन्‍ज मेडल जीता. इसके अलावा 2014 में एशियन और कॉमनवेल्‍थ गेम्‍स में सिल्‍वर मेडल अपने नाम किया. जबकि 2016 और 2017 में कॉमनवेल्‍थ चैंपियनशिप में गोल्‍ड जीतकर देश का नाम रोशन किया. 24 साल के इस भारतीय पहलवान ने एशियाई खेलों से पहले लगातार तीन स्वर्ण पदक अपने नाम किये थे. उन्होंने गोल्ड कोस्ट राष्ट्रमंडल खेलों में, जार्जिया में तबलिसी ग्रां प्री और इस्तांबुल में यासर दोगु अंतरर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता में खिताब जीता था.

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