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Sunday Special: भारतीय टेनिस का अगला लिएंडर पेस कौन?

News18Hindi
Updated: December 8, 2019, 7:49 AM IST
Sunday Special: भारतीय टेनिस का अगला लिएंडर पेस कौन?
लिएंडर पेस ने कह दिया है कि उनका करियर आखिरी पड़ाव पर है

लिएंडर पेस (Leander paes) के 30 साल के करियर में कई ऐसे खिलाड़ी आए, जिन्हें पेस का उत्तराधिकारी माना जा रहा था, लेकिन वे आंधी की तरह आए और चले गए. कोई भी पेस की जगह स्थिर नहीं हो पाया.

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  • Last Updated: December 8, 2019, 7:49 AM IST
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नई दिल्ली. आपके लिए भारत में टेनिस का मतलब क्या है? जवाब आपके मन में शायद लिएंडर पेस (Leander paes)  ही आ रहा होगा. हो भी क्यों ना? तीन दशक तक भारतीय टेनिस की बागडोर को जो उन्होंने संभाले रखा है. भारतीय टेनिस का मतलब सानिया मिर्जा से पहले लिएंडर पेस इसीलिए भी है, क्योंकि वो टेनिस के एमएस धोनी (MS Dhoni) हैं, नहीं... शायद उनसे भी बड़े. भारतीय टेनिस का एक दौर हैं पेस, जो अब अपने आखिरी पड़ाव पर हैं. जब भी पेस ने खराब प्रदर्शन किया, उन पर संन्यास का दबाव बनने लगा, लेकिन आलोचनाओं को एक तरफ रखकर उन्होंने खेलना जारी रखा. आज उनकी उम्र 46 की हो गई है. वो अभी भी खेल रहे हैं. टेनिस के कोर्ट पर भारत का झंडा बुलंद किए हुए हैं. लेकिन हर खिलाड़ी की जिंदगी में एक समय आता है, मैदान को अलविदा कहने का.
पेस की जिंदगी में भी वो समय नजदीक आ रहा है और 18 बार के ग्रैंड स्‍लैम विजेता ने अब आखिरकार कह दिया है कि वह अब नहीं खेल सकते और अब आगे आ रही  नई पीढ़ी को तराशने की जरूरत है. ओलिंपिक में भारत को मेडल दिलवाने वाले पहले और एकमात्र भारतीय टेनिस खिलाड़ी पेस ने नई पीढ़ी पर जोर दिया. उन्होंने कहा कि अब युवा टीम को तराशना भारतीय टेनिस (Indian Tennis) का मुख्य लक्ष्य होना चाहिए. जब युवा पीढ़ी आगे आ रही है, तो उन्हें भी आगे बढ़ जाना चाहिए. लेकिन यहां पर सबसे बड़ा सवाल ये आता है कि अगला लिएंडर पेस कौन होगा? भारत को आने वाले समय में अगला लिएंडर पेस मिलेगा भी या पेस अपने आप में इतिहास बनकर रह‌ जाएंगे.

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लिएंडर पेस ने अपना पिछला मुकाबला पाकिस्तान के खिलाफ डेविस कप में खेला था. (फाइल फोटो)


पहले जाने पेस का योगदान

भारतीय टेनिस में पेस (Leander paes)  का सबसे बड़ा योगदान रहा. टेनिस जगत में पेस ने दुनिया को भारत का दम दिखाया. पहले जूनियर यूएस ओपन और जूनियर विबंलडन का‌ खिताब अपने नाम किया. सिर्फ जूनियर में दुनिया के नंबर एक खिलाड़ी बने. 1996 में ओलिंपिक में ब्रॉन्ज मेडल, 18 ग्रैंड स्लैम, 44 डेविस कप के मुकाबले जीते, 30 साल लंबा करियर,सात ओलिंपिक खेलने वाले पहले टेनिस खिलाड़ी, डबल्स के नंबर एक टेनिस खिलाड़ी, ये सब पेस के करियर की उपलब्धि है. जिसके आस पास अभी तक कोई भारतीय पहुंच भी नहीं पाया.

भारतीय टेनिस में पेस की सबसे उपलब्धि ये है कि जब भी टेनिस को उनकी जरूरत पड़ी, वे सबसे आगे रहे. जहां बाकी ‌खिलाड़ियों ने अपने कदम पीछे किए, उन्होंने कदम आगे बढ़ाए और देश का झंडा बुलंद कर प्रतिनिधित्व किया. हाल ही में पाकिस्तान के खिलाफ डेविस कप (Davis Cup) के मुकाबले को लेकर जब रोहन बोपन्ना जैसे शीर्ष भारतीय खिला‌ड़ियों ने पाकिस्तान जाने से मना कर दिया था, उस समय पेस आगे आए और पाकिस्तान जाने के लिए हामी भरी. भारतीय टेनिस में पेस ही एक ऐसे खिलाड़ी नजर आते हैं, जिनके लिए डेविस कप हमेशा से ही प्राथमिकता रही. हालांकि इसके बाद मुकाबला तटस्‍थ स्‍थान पर हुआ. लेकिन टीम में उनके होने से ही टीम को एक अलग ही सपोर्ट मिलता है.

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लिएंडर पेस ने डेविस कप में 44 मैच जीते हैं (फाइल फोटो)
पेस के लंबे करियर के दौरान आए इतने खिलाड़ी
पेस ने 1996 में ओलिंपिक में पुरुष वर्ग का सिंगल्स कैटेगरी में मेडल जीतने के बाद पूरी तरह से डबल्स का रुख कर लिया था. पेस के तीन दशक लंबे करियर के दौरान कई ऐसे खिलाड़ी आए, जिन्हें पेस का उत्तराधिकारी माना जाने लगा था, लेकिन अब जब उनका मैदान से जाने का समय करीब आ रहा है, तब भी भारतीय टेनिस की उनके उत्तराधिकारी की तलाश जारी है. उनका उत्तराधिकारी बनने का मतलब सिर्फ बड़े खिताब जीतना ही नहीं, बल्कि लंबे समय तक भारतीय टेनिस की पहचान बनना, हर मुश्किल समय में भी सबसे आगे रहना और एक भरोसा होना है. ऐसा भरोसा कि उस खिलाड़ी के साथ रहने से टीम में जीत का जोश बना रहे और आज भी ये तलाश जारी है. फिर इसके बाद ये मायने नहीं रखता कि खिलाड़ी सिंगल्स का है या डबल्स का. पेस लंबे समय से पूरी फिटनेस के साथ लगातार पेशेवर टेनिस खेल रहे हैं.
पेस (Leander paes)  के लंबे करियर के दौरान रोहन बोपन्ना, युकी भांबरी, सोमदेव बर्मन, साकेत मायनेनी, प्रजनेश गुणेश्वरन, रामकुमार रामनाथन, सुमित नागल जैसे खिलाड़ी आए. इनमें से कुछ का संघर्ष पूरा हो चुका है और कुछ का अभी भी जारी है.

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लिएंडर पेस और महेश भूपति (फाइल फोटो)


सोमदेव और युकी में दिखी थी पेस की झलक
लिएंडर पेस (Leander paes) , महेश भूपति के बाद रोहन बोपन्ना भारतीय टेनिस की पहचान बने. हालांकि उनकी भी उम्र अब 39 साल के करीब हो गई है. युकी भांबरी और सोमदेव बर्मन ने जिस तरह से टेनिस जगत में कदम रखा था. ऐसी उम्मीद की जा रही थी कि वे पेस की जगह ले सकते हैं. लेकिन समय के साथ-साथ पेस अपने खेल से अपना कद तो बढ़ाते गए, लेकिन भांबरी और बर्मन अपनी लय को बरकरार नहीं रख पाए. बर्मन के करियर में हालांकि चोट हावी रही. उन्होंने 2010 में दिल्ली कॉमनवेल्‍थ गेम्स में सिंगल्स का गोल्ड और 2010 एशियन गेम्स में सिंगल्स और डबल्स का गोल्ड जीता. उन्होंने रोजर फेडरर और राफेल नडाल का भी सामना किया. मियामी मास्टर्स में मिलोस रोओनिक को हराकर तहलका मचा दिया, लेकिन इसके बाद 2012 में कंधे की चोट के  कारण बर्मन के करियर को झटका लगा.

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युकी भांबरी ने 2010 में यूथ ओलिंपिक का सिल्वर मेडल हासिल किया था


युकी भांबरी ने भी पेस की ही तरह टेनिस में एंट्री की थी. वह भी पेस की तरह जूनियर में नंबर एक पर रहे. 2008 में ऑस्ट्रेलियन ओपन जूनियर चैंपियनशिप का खिताब जीता था. जिसके बाद माना  जा रहा था कि भांबरी पेस के नक्शे कदमों पर चल रहे हैं. 2010 में यूथ ओलिंपिक का सिल्वर मेडल हासिल किया.इनका करियर धीरे- धीरे रफ्तार पकड़ रहा था. 2015 की शुरुआत उन्होंने एटीपी रैंकिंग में 315वें नंबर के खिलाड़ी से की थी और  नवंबर में वह करियर की सर्वश्रेष्ठ रैंकिंग 88वें स्‍‌थान पर आए. हालांकि साल का समापन उन्होंने 93वें रैं‌किंग पर  की. 2016 इनके लिए चोटों से प्रभावित रहा, जिसके कारण वह 500 से भी बाहर हो गए ‌थे. 2018 में भांबरी ने टॉप 100 में वापसी की. लेकिन नवंबर में फिर टॉप 100 से बाहर हो गए. भांबरी का फिलहाल करियर चोट के कारण ऊपर- नीचे हो रहा है.

साकेत और रामकुमार से भी हुई थी उम्मीद
लिएंडर पेस (Leander paes)  भले ही डबल्स के खिलाड़ी रहे हो, लेकिन पेस की भरपाई का मतलब सिर्फ जीत से ही नहीं, बल्कि ऐसे खिलाड़ी से है, जिस पर भरोसा किया जा सके. पेस के अलावा रोहन बोपन्ना और महेश भूपति का भी भारतीय टेनिस में एक अलग स्‍थान रहा. लेकिन बीते कुछ सालों में टेनिस में हुए विवाद के कारण भी पेस और बोपन्ना ही बने. लेकिन पेस का योगदान भारतीय टेनिस में इससे कहीं ज्यादा रहा.भारत को साकेत मायनेनी और रामकुमार रामनाथन से भी उम्मीद हुई थी. लेकिन अगर इन दोनों के करियर को देखा जाए तो ये पेस से अभी काफी पीछे हैं. साकेत की सिंगल्स में मौजूदा रैंकिंग 390 और डबल्‍स में 187 है. साकेत के लिए 2016 का साल शानदार रहा था. उन्होंने 2014 में इंचियोन में सानिया मिर्जा के साथ मिलकर मिक्‍स्ड डबल्स का गोल्ड जीता था, जो उनके करियर का बड़ा खिताब रहा. उन्हाेंने 2014 में डेविस कप में डेब्यू किया था.

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रामकुमार रामनाथन ने 42 मिनट में 6-0, 6-0 से मुकाबला जीता. (फाइल फोटो)


रामकुमार रामनाथन (Ramkumar Ramanathan) सोमदेव बर्मन के बाद एटीपी वर्ल्ड टूर के फाइनल में पहुंचने वाले पहले भारतीय बने थे. वें अभी भी अपने पहले खिताब की तलाश कर रहे हैं. उनके करियर  की सर्वश्रेष्ठ रैं‌किंग 111वीं है, जो उन्होंने पिछले साल हासिल की थी, लेकिन प्रदर्शन के गिरावट के कारण इस साल अभी उनकी रैंकिंग 190वीं है.

प्रजनेश और सुमित नागल पर अब जिम्मेदारी
भारतीय टेनिस में पेस के बाद जो नाम आते हैं. उनमें से कुछ अपने अंतिम पड़ाव की ओर बढ़ रहे हैं तो कुछ का करियर चोट से प्रभावित रहा. फिलहाल तो युवा टेनिस खिलाड़ियों में सुमित नागल (Sumit Nagal) और प्रजनेश ही भारतीय चुनौती पेश कर रहे हैं. प्रजनेश गुणेश्वरन टॉप रैंक के भारतीय ‌खिलाड़ी हैं. उनकी मौजूदा रैंकिंग 94वीं है.  प्रजनेश ने इसी साल ग्रैंड स्लैम में डेब्यू किया था. उन्होंने ऑस्ट्रेलियन ओपन के लिए क्वालीफाई किया था. जहां मुख्य ड्रॉ में उन्हें पहले ही राउंड में हारकर बाहर होना पड़ा. वहीं सुमित नागल ने इसी साल ग्रैंड स्लैम में रोजर फेडरर (Roger Federer) को पहले राउंड के पहले सेट में हराकर तहलका मचा दिया था. भले ही अभी इन युवाओं ने पेस की तरह अभी कोई बड़ी उपलब्धि हासिल न की हो, लेकिन उम्मीद की जा सकती है पेस के जाने के बाद कम से कम ये तो भारत को उनकी कमी महसूस नहीं होने देंगे. आने वाले समय में खुद को ऐसे स्‍थापित कर पाए , जिन पर पेस की तरह भरोसा किया जा सके. साथ ही दुनिया को भारतीय टेनिस का दम दिखाने के लिए हमेशा आगे रहेंगे.

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First published: December 8, 2019, 7:20 AM IST
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