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Tokyo Paralympics: बमों की आवाज में सुबह, खाने के लिए लंबी लाइन, जानिए वर्ल्‍ड चैंपियन धावक की कहानी

Tokyo Paralympics: बमों की आवाज में सुबह, खाने के लिए लंबी लाइन, जानिए वर्ल्‍ड चैंपियन धावक की कहानी

सालुम अगेजी काशफअली  की ‘स्टारगार्ट बीमारी’ के कारण आंखों की रोशनी चली गई थी. (@ParaAthletics twitter)

सालुम अगेजी काशफअली की ‘स्टारगार्ट बीमारी’ के कारण आंखों की रोशनी चली गई थी. (@ParaAthletics twitter)

तोक्यो, 26 अगस्त (भाषा) बचपन में सालुम अगेजी काशफअली तड़के बमों की आवाज से उठते थे तो उनके चारों तरफ मलबा और धुएं का गुब्बार होता था।

    टोक्‍यो. बचपन में सालुम अगेजी काशफअली (Salum Ageze Kashafali ) तड़के बमों की आवाज से उठते थे तो उनके चारों तरफ मलबा और धुएं का गुब्बार होता था. कांगो का यह बच्चा अधिकतर सोचता था कि यह काली लंबी रात कभी खत्म होगी या नहीं, क्या वह अन्य बच्चों की तरह कभी स्कूल जा भी पाएगा या नहीं, क्या उसे लंबी कतारों में बिना लगे भोजन मिलेगा और इसके बाद काशफअली और उनके परिवार का भाग्य चमका और उन्हें नॉर्वे में शरण मिली गई, जहां उन्होंने शीर्ष स्तर का फर्राटा धावक बनने का अपना सपना पूरा किया.

    काशफअली अब टोक्यो पैरालंपिक (Tokyo Paralympics) की पुरुष टी12 (दृष्टिबाधित के लिए) 100 मीटर दौड़ में अपनी शीर्ष रैंकिंग को सही साबित करने के इरादे से उतरेंगे. मौजूदा विश्व चैंपियन काशफअली ने इस दौरान पिछले अफ्रीका देश में अपने बचपन के दिनों को याद किया. उन्‍होंने ओलंपिक सूचना सेवा (ओआईएस) से कहा कि ऐसा समय भी था जब हमें जीवित रहने के लिए भी जूझना पड़ रहा था.

    शिविर में महीनों बिताने के बाद नॉर्वे में बनाया आशियाना

    उन्होंने बुरे दिनों को याद करते हुए कहा कि एक रात जब मेरा परिवार सो रहा था तो अचानक हम उठ बैठे और हर तरफ आग की आग थी क्योंकि कुछ बम फटे थे. दरवाजा खोलते ही हमने देखा कि लोग जमीन पर पड़े हुए हैं. आप मरने का इंतजार कर रहे थे. काशफअली का परिवार आखिरकार उस माहौल से निकलने में सफल रहा. उन्होंने शरणार्थी शिविर में महीनों बिताए और फिर नॉर्वे के बर्गन में अपना आशियाना बनाया. परिवार के नॉर्वे बसने के बाद काशफअली का जीवन पूरी तरह से बदल गया.

    स्‍टारगार्ट बीमारी के कारण छिन गई आंखों की रोशनी

    उन्होंने कहा कि नॉर्वे जाना लॉटरी लगने की तरह था. यह लाखों में एक को मिलने वाला मौका था, खाने के लिए भीख मांगने से सिर के ऊपर छत का सफर. आप जिस भी चीज की कल्पना कर सकते हो यह उससे बड़ी चीज थी. हालांकि किशोरावस्था में एक बार फिर काशफअली की जिंदगी में अंधेरा छा गया जब उन्हें ‘स्टारगार्ट बीमारी’ का पता चला, जिसके कारण उनकी आंखों की रोशनी चली गई थी. काशफअली ने कहा कि मैं शायद 13 साल के आसपास तक स्कूल नहीं गया. मैं पढ़ नहीं पाता था, मैं अपना नाम नहीं लिख पाता था. यह आसान नहीं था. धीरे धीरे चीजें सही हुई.

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    जूनियर स्‍कूल में पढ़ाते हैं गणित

    किशोरावस्था में पहला अक्षर और अंक सीखने वाले काशफअली अब जब ट्रैक पर पसीना नहीं बहा रहे होते तो जूनियर स्कूल में गणित सिखाते हैं. उन्होंने कहा कि मैंने हमेशा अपने पिता और मां से कहा कि अगर मुझे कभी भी स्कूल जाने का मौका मिला तो मैं शिक्षक बनना चाहूंगा. मैं पढ़ाना चाहूंगा. काशफअली की नजरें अब टोक्यो में अपना ही रिकॉर्ड तोड़ने पर टिकी हैं. उन्होंने कहा कि अब यहां टोक्यो में पहुंचकर पदक जीतने की स्थिति में होना, यह सभी खिलाड़ियों का सपना होता है.

    Tags: Sports news, Tokyo Paralympics, Tokyo Paralympics 2020

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