कुश्ती के लिए प्रसिद्ध पश्चिम महाराष्ट्र के पहलवान संकट में, करोड़ों रुपए का कारोबार भी प्रभावित

कुश्ती में शामिल अधिकतर खिलाड़ी गरीब परिवारों से हैं.

कुश्ती में शामिल अधिकतर खिलाड़ी गरीब परिवारों से हैं.

देश में कोरोना (Covid-19) की दूसरी लहर ने सबको परेशान किया हुआ है. लॉकडाउन के कारण खेल के मैदान भी पूरी तरह बंद हैं. ऐसे में गरीब खिलाड़ियाें को काफी परेशानी हो रही है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: April 28, 2021, 4:00 AM IST
  • Share this:
कोरोना (Covid-19) के कारण कुश्ती (Wresling) के मैदानों से सुनाई देने वाली दंड, बैठक और जांघों की आवाजें बंद हो चुकी हैं. पश्चिम महाराष्ट्र में पहलवानी के लिए प्रसिद्ध सांगली जिले में पिछले दो वर्षों से कुश्ती के मैदान बंद हैं. कुश्ती यहां का लोकप्रिय खेल है और इससे स्थानीय स्तर पर कई लोगों को रोजी-रोटी भी मिलती है. हर साल 15 से 20 करोड़ रुपए का कारोबार होता है. लेकिन, लगातार दूसरे साल भी कुश्ती से जुड़ी सारी गतिविधियां बंद होने से पहलवान खाली हाथ हो गए हैं और तंगी से गुजर रहे हैं.

इस बारे में यहां कुश्ती की एक बड़ी प्रतियोगिता "महाराष्ट्र केसरी' के विजेता रहे अप्पासाहेब कदम कहते हैं, "कुश्ती का पूरा खेल दो पहलवानों के शारीरिक स्पर्श और तेज सांस लेने से जुड़ा है. इसलिए, कोरोना के कारण सबसे बड़ा झटका कुश्ती के क्षेत्र में देखने को मिला है. फिर कुश्ती का खेल मुख्य रूप से गरीब बच्चों के लिए है. इसलिए चुनौती यह है कि वे इस परंपरागत खेल के लिए अपना बहुत कुछ दांव पर नहीं लगा सकते हैं.'

जिले में 60 से 70 कुश्ती के मैदान

सांगली जिले में विशेष तौर पर कुश्ती के लिए 60 से 70 मैदान हैं. जहां बीते कई महीनों से न कुश्ती के बड़े आयोजन हो रहे हैं और न ही प्रशिक्षण चल रहा है. हालांकि, इस दौरान कुछ पहलवान अपने व्यक्तिगत प्रयासों से पहलवानी का अभ्यास करते रहे हैं. लेकिन मैदानों पर बड़ी संख्या में लगने वाले ट्रेनिंग कैंप और नए-पुराने पहलवान, प्रशिक्षक पूरी तरह से गायब हैं. दो साल पहले सांगली जिले में बाढ़ के चलते कुंडल, पलूस देवराष्ट्र, बंबावडे और बोरगांव में कुश्ती के मैदानों पर कुश्ती की गतिविधियां बंद करनी पड़ी थीं. तब बाढ़ ने यहां कुश्ती से जुड़े पहलवान, संचालक और दर्शकों के मंसूबों पर पानी फेर दिया था. हालांकि, यह उम्मीद जताई गई कि फरवरी से मई महीने के दौरान जब जब मौसम कुश्ती के लिए अनुकूल रहेगा और गांव-गांव में जात्रा (मेलों) का आयोजन होगा, तो फिर कुश्ती के बड़े आयोजन भी होंगे.
पहलवानों को अतिरिक्त खुराक भी नहीं मिल रही

शिरोड गांव के एक पहलवान भरत पाटिल बताते हैं, "कुश्ती के मैदान दो साल के लिए बंद कर दिए गए हैं. इससे हम जैसे पहलवानों को बहुत नुकसान हुआ है. मंहगाई पहले से काफी बढ़ गई है. पहलवानों को अतिरिक्त खुराक चाहिए होती है. मुझे घर की भैंस का दूध तो मिल रहा है, पर बाकी कोई पौष्टिक चीज खरीदकर नहीं खा सकता हूं. सामान्य खाने के लिए ही मैं बड़े लोगों के खेतों में काम करता हूं, ताकि कुछ कमा सकूं और जिंदा रहने लायक भोजन कर सकूं.' सांगली में कुश्ती के कारोबार का पूरा एक कारोबार है. पहलवान खेल में इस उम्मीद से प्रवेश करते हैं कि वे कुश्ती प्रतियोगिता में जीतकर एक दिन इलाके के बड़े विजेता पहलवान के रुप में पहचाने जाएंगे और एक समय के बाद उनके नाम पर कई नए पहलवान उनके शिष्य बनें. इस तरह वे बाद में नामी प्रशिक्षक के तौर पर भी अपना करियर बना सकते हैं.

खिलाड़ियाें के पास काम भी नहीं, इसलिए परेशानी बढ़ी



हर वर्ष मई में जब कुश्ती की ज्यादातर खेल प्रतियोगिता समाप्त हो जाती हैं तो पहलवान अपने गांव चले जाते हैं और जून में जब कुश्ती प्रतियोगिता नहीं होती. यह ऐसा समय होता है जब पहलवान अपनी कमजोरियों पर कार्य करते हैं और अभ्यास के दौरान प्रतियोगिता में हुईं गलतियों से सबक लेकर खुद को बेहतर पहलवान बनाने की कोशिश करते हैं. ज्यादातर पहलवान कोरोना और उसके कारण लगाए गए लॉकडाउन से निजात पाने का इंतजार कर रहे हैं. ज्यादातर पहलवान निम्न-मध्यम वर्ग परिवारों से हैं. इसलिए वे अपनी पहलवानी छोड़कर इस महामारी के मुश्किल दौर में अपने और अपने परिवार की घर-गृहस्थी चलाने के लिए दूसरे काम-धंधे ढूंढ़ रहे हैं और परिजनों को अपना आर्थिक योगदान दे रहे हैं. वहीं, कुछ गिने-चुने पहलवान ही हैं, जिनकी आर्थिक स्थिति अच्छी है और जो कोरोना लॉकडाउन में भी पहलवानी पर पूरी तरह से ध्यान देकर अभ्यास कर रहे हैं.

दूसरी लहर ने पूरी उम्मीद तोड़ दी

सांगली में प्रतिवर्ष आयोजित महाराष्ट्र केसरी प्रतियोगिता में दूर-दूर से पहलवान सांगली आते हैं. लेकिन, यह प्रतियोगिता रद्द होने से सांगली और सांगली के बाहर राज्य के कई पहलवानों में कुश्ती को लेकर शिथिलता आई है. वहीं, सांगली में कुश्ती के सारे मैदान बंद होने और कई करोड़ रुपए की कमाई से हाथ धोने के कारण यहां के पहलवान तथा कारोबारियों में हताशा की स्थिति बनी हुई है. इस बारे में और अधिक जानकारी देते हुए कोल्हापुर में पहलवान रहे कुश्ती प्रतियोगिता के संचालक और प्रशिक्षक मौली जमादे बताते हैं, "गांव-गांव में कुश्ती के मैदान बंद होने से पहलवानों में एक तनाव पैदा हो गया है. उनकी सारी कवायद और कसरत भी एक ठहराव की स्थिति में आ गई हैं. छोटे गांवों में तक हर वर्ष यह देखने को मिलता था कि प्रशिक्षण के लिए प्रशिक्षण शिविर में सौ से अधिक बच्चे आया करते थे. बीच भी जब लॉकडाउन शिथिल हुआ था तब कुछ बच्चे सीखने आए भी, लेकिन उनकी संख्या पांच से तक तक थी, क्योंकि कोरोना का डर तो सबके मन में है ही कि कहीं वे बीमार न हो जाएं. अभी कोरोना की दूसरी लहर ने सारी उम्मीद तोड़ दी है.'

(डिस्क्लेमर: लेखक के विचार व्यक्तिगत हैं.)
अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज