किसानों ने शुरू किया पराली जलाना, काले कोहरे के लिए रहें तैयार

पिछले दो सालों की तरह इस साल भी नहीं मिलेगी कोहरे की काली चादर से राहत

पिछले दो सालों की तरह इस साल भी नहीं मिलेगी कोहरे की काली चादर से राहत

दिल्ली की जहरीली हवा के चलते कई देशों के राजनयिकों ने अपनी दिल्ली पोस्टिंग को सजा के तौर पर देखना शुरू कर दिया है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 11, 2018, 5:26 PM IST
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पंजाब में किसानों ने पराली जलाना शुरू कर दिया है. और इसी के साथ दिल्ली में हवा की क्वालिटी सबसे ख़राब के स्तर पर पहुंच गई है. यह साल का वह वक्त है जब दिल्ली में हवा सबसे ज्यादा प्रदूषित हो जाती है. ऐसे में फिर से लोगों के लिए यह चर्चा और परेशानी दोनों का ही सबब बन गया है. इस साल भी पिछले दो सालों वाले हालात में कोई ज्यादा बदलाव आने की संभावना नहीं है. और माना जा रहा है कि एक बार फिर से लोगों को श्वसन तंत्र और आंखों से संबंधित समस्याएं जकड़ने वाली हैं. पिछले दो साल से दिल्ली में पड़ने वाला यह काला कोहरा दुनिया भर में भी हेडलाइन बना रहा है. जहरीली हवा के चलते कई देशों ने इस दौरान दिल्ली में बैठे अपने राजनयिकों की दिल्ली पोस्टिंग को सजा के तौर पर देखना शुरू कर दिया है.

कैसे बनता है दिल्ली में यह कोहरा

मानसून के खत्म होने के बाद से दिल्ली सहित उत्तर भारत में हवा स्थिर हो जाती है. और सर्दियों के साथ ही स्थिर भी. ऐसे में जब पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान के इलाकों में किसान पराली जलाते हैं तो वह धुंआ कहीं न जाकर इसी वातावरण में रह जाता है और हवा के नमी के साथ भारी होने के साथ ही उत्तर भारत पर एक मोटी परत के तौर पर फैल जाता है.

पिछले कुछ सालों से कोहरे की इस परत में सर्दियों की शुरुआत में दिल्ली और उसके आस-पास के इलाकों के लोग जीने को मजबूर हैं. इस साल भी एयर क्वालिटी एंड वेदर फोरकास्टिंग एंड रिसर्च के अनुसार दिल्ली में हवा की क्वालिटी बेहद खराब हो चुकी है. हालांकि दिल्ली में खराब हवा का यह एक मात्र कारण नहीं है, बढ़ते वाहन और दूसरी वजहें भी हैं लेकिन आसपास के राज्यों में पराली का जलाया जाना दिल्ली के वायु प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण जरूर माना जाता है.
पहले क्यों नहीं होता था ऐसा



हर साल किसान हज़ारों एकड़ खेती की जमीन पर आग लगा देते हैं. ऐसा वे धान की फसल के कटने के बाद बची हुई पराली को खत्म करने के लिए करते हैं. लेकिन उनके ऐसा करने के बाद ज्यादातर उत्तर भारत पर काली धुंध की एक मोटी परत बिछ जाती है. पिछले साल इस धुंध की जो सैटेलाइट तस्वीरें आई थीं, उनमें साफ दिखता था कि पराली जलाने के तुरंत बाद ही उत्तर भारत को इस काले कोहरे ने अपनी जद में ले लिया था.

किसान पहले से ही पराली जलाते आए हैं. लेकिन हाल में यह चलन मशीनी खेती के चलते ज्यादा बढ़ा है. क्योंकि पहले पराली का दूसरे कृषि और घरेलू कामों में इस्तेमाल हो जाता था. लेकिन अब मशीनों से कटाई के चलते ऐसा नहीं हो पाता है.

लगातार हो रहे हैं इसे रोकने के प्रयास

फिलहाल पराली जलाए जाने पर बैन है और कई बार इस मामले में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल दखल दे चुका है लेकिन पराली जलाया जाना बिना किसी रुकावट के जारी है. पिछले साल नवंबर में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने राज्यों को इस समस्या के समाधान के लिए सुझाव मांगे थे. ट्रिब्यूनल चाहता था कि राज्य बताएं कि इसे कैसे रोका जा सकता है? ताकि किसानों को इंसेंटिव और इसके लिए इंफ्रास्ट्रक्चर असिस्टेंस देकर इसपर रोक लगाई जा सके. लेकिन तमाम प्रयास जो किसानों के पराली जलाने को रोकने के लिए किए गए किसी काम नहीं आए. लेकिन कोई भी प्रयास इस दिशा में कारगर नहीं रहा है.

हालांकि NGT इस तरह से पराली का जलाया जाना 2015 में बैन कर चुका है. लेकिन किसानों का कहना है कि अगली फसल के लिए खेतों को तैयार करने का यह उनके लिए सबसे सस्ता तरीका है. और ऐसा करने से केवल 15 दिन में यह खेत अगली फसल के लिए तैयार हो जाते हैं.

किसान पराली जलाना क्यों नहीं कर पा रहे बंद

इसे रोकने के लिए चाहे FIR भी कराई गई हैं और जुर्माना भी लगाया गया है लेकिन इससे लगाने की इससे भी कोई खास फायदा नहीं मिला है. NGT ने पहले से ही पराली जलाने वाले किसानों पर 2,500 से 15,000 तक का जुर्माना लगा रखा है. तारन जिले 4 किसानों को धारा 188 के तहत गिरफ्तार भी किया गया था. जबकि 22 दूसरे किसानों से इस मामले में 55.000 रुपये का जुर्माना भी वसूल किया गया था लेकिन इससे कोई खास फायदा नहीं हुआ.

किसानों का कहना है कि अगर वे बची हुई पराली को खेतों से खुद हटाएं तो ऐसा करने में उन्हें 5 हज़ार रुपये प्रति एकड़ का खर्च आएगा.

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