Chandrayaan-2 में ऐसा क्या है, जो लैंडिंग होते ही दुनिया भर में जम जाएगी भारत की धाक

Chandrayaan-2 landing: 22 जुलाई को श्रीहरिकोटा से रवाना हुआ चंद्रयान2 की सफलता भारत को स्पेस पॉवर के तौर पर बड़ी छलांग दिलाने वाली है. चार महीने पहले इजराइल ने भी ऐसी ही कोशिश की थी लेकिन उसका मिशन फेल हो गया था.

Sanjay Srivastava | News18Hindi
Updated: September 6, 2019, 10:42 PM IST
Chandrayaan-2 में ऐसा क्या है, जो लैंडिंग होते ही दुनिया भर में जम जाएगी भारत की धाक
चंद्रयान का लेंडर विक्रम
Sanjay Srivastava
Sanjay Srivastava | News18Hindi
Updated: September 6, 2019, 10:42 PM IST
नईदिल्ली. चंद्रयान-2 जब कुछ घंटे बाद चांद के दक्षिण छोर की सतह पर उतरेगा तो पूरी दुनिया इस पर निगाह टिकाए होगी. सबसे ज्यादा टकटकी दुनिया की सबसे बड़ी स्पेस एजेंसी नासा की होगी. जिसने चंद्रयान-2 को स्पेशल मिशन बताया है. चार महीने पहले इजराइल का बेयरशीट लेंडर चांद की सतह के करीब पहुंचकर वहां ढेर हो गया था लेकिन भारत के चंद्रयान-2 के लेंडर विक्रम के साथ ऐसा नहीं होने वाला. आगे हम यही जानेंगे, जिससे आप भी महसूस करने लगेंगे कि भारत का ये मून मिशन ना केवल अब तक का सबसे अलग मिशन है बल्कि खास भी.

भारत के चंद्रयान-2 मिशन की शुरुआत 2007 में हुई. तब ये कागजों पर थी. एक साल तक चंद्रयान-2 का नक्शा बनता रहा. एक साल बाद जब चंद्रयान-2 के आर्बिटर, लेंडर और रोवर के डायग्राम फाइनल हुए, उसके बाद इस प्रोजेक्ट को एक के बाद एक झटके लगने लगे. 2016 में सरकार की पहल पर इसे फिर रिशेड्यूल करके शुरू किया गया.


22 जुलाई को जब जीएसएलवी एमके 3 एम1( GSLV MK III M1) लेकर उड़ा तो देशभर की सांसें अटकी हुईं थीं. उसके बाद कई चरणों में चंद्रयान-2 आगे बढ़ता रहा. ये सफर करीब 45 दिनों का माना गया. चंद्रयान ने पहले पृथ्वी की कक्षा में परिक्रमा की फिर चांद के आर्बिट में पहुंचा. अब वो घड़ी आ गई, जिसका पिछले कुछ दिनों से इंतजार किया जा रहा था.

चार महीने पहले इजराइल ने काफी तैयारी के बाद अपने मून मिशन में लेंडर बेयरशीट को चांद पर उतारने की कोशिश तो इसकी लैंडिंग फ्लॉप साबित हुई. एक तो इजराइली लेंडर के मोटर की स्पीड कम नहीं की जा सकी और दूसरे इसके एक सेंसर ने काम करना बंद करना दिया. नतीजतन बेयरशीट चांद पर धड़ाम से गिरा और उसने काम करना बंद कर दिया.

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दो-तिहाई मून मिशन इसलिए हो गए नाकाम
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मून मिशन का सबसे अहम पक्ष इसकी सॉफ्ट लैंडिंग मानी जाती है. ये परफैक्ट तभी होती है, जब चांद के तापमान, वातावरण और ग्रेविटी से तालमेल बिठाते हुए बहुत ही हौले से हो. लेकिन ऐसा होता नहीं. इसका सक्सेज रेट केवल 37 फीसदी है यानि दो तिहाई मून मिशन इसलिए नाकाम हो गए, क्योंकि उनकी सॉफ्ट लैंडिंग परफेक्ट नहीं हो पाई.

अप्रैल में सॉफ्ट लैंडिंग में पेचिदगी के चलते इजराइल का लेंडर बेयरशीट धड़ाम से गिर गया था


सबसे बड़ी चुनौती है ये भी 
सबसे बड़ी चुनौती होती है चांद की सतह, अगर कोई यान चंद्रमा पर उतर रहा है तो वो अगर वहां उबड़-खाबड़ जगह पर उतरा या गड्ढों में चला गया तो सारी मेहनत ही बेकार हो जाएगी. तो ये कैसे सुनिश्चित किया जाए कि इसे सपाट और अनुकूल सतह पर उतारा जाए. पथरीली पहाड़ियों सरीखी जगह से दूर रखा जाए. सही बात ये है कि नासा और दुनिया की तमाम अन्य स्पेस एजेंसियां मुख्य तौर पर चंद्रयान-2 की लैंडिंग में इसी फैक्टर को देखने वाली हैं. अगर ये सही तरीके से हुई तो दुनिया में हमारी ये लैंडिंग ही धाक जामा देगी.

ये 15 मिनट होंगे चंद्रयान-2 की जिंदगी के लिए अहम
जब चंद्रयान-2 की लैंडिंग चांद पर आधी रात के बाद हो रही होगी, तो इसके सामने कई चुनौतियां होंगी, चंद्रयान के लेंडर को अपनी स्पीड 1.6 किलीमीटर प्रति सेकेंड से जीरो पर लानी होगी. धूल के बवंडर को उठने से रोकना होगा. अनुकूल सतह देखनी होगी. अन्यथा सारा काम बिगड़ जाएगा. ये सारा काम 15 मिनट में होना है. यही 15 मिनट चंद्रयान2 की जिंदगी के साथ इसरो के सपनों को पूरा करने के लिए सबसे जरूरी हैं.

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क्या क्या होगा 15 मिनट में? 
अब देखते हैं कि इन 15 मिनट में चंद्रयान रिमोट सेंसिंग पर होगा या नहीं. दरअसल लैंडिंग से एक घंटे पहले ही बेंगलुरु में यूआर राव सेटेलाइट सेंटर के कंट्रोल रूम में बैठे वैज्ञानिक उसे जरूरी कमांड दे देंगे. आखिरी के 15 मिनट में चंद्रयान2 आटोमेटेड मोड पर होगा यानि तब जो कुछ भी होगा वो ये यान खुद करेगा. उसी दौरान चंद्रयान लेंडर की पांच में चार मोटर बंद हो जाएंगी, केवल पांचवीं सेंट्रल मोटर काम करेगी, जो उसे हौले हौले नीचे लाएगी. चार मोटर बंद हो जाने धूल का गुबार नहीं उठेगा. लेकिन ये अभी आधा काम ही है. असली काम सेंसर्स को करना होगा.

जब लेंडर विक्रम सॉफ्ट लैंडिंग कर रहा होगा तो इसका असली काम इसके सेंसर करेंगे


कैसे सेंसर इस्तेमाल किये गये हैं 
लेंडर विक्रम में ऐसे आधुनिक ऑनबोर्ड सेंसर इस्तेमाल किए गए हैं, जो रिवर्स गेयर सेंसर के तौर पर काम करेंगे. ये सेंसर आजकल नई मॉडल की कारों में इस्तेमाल किए जा रहे हैं. ये सेंसर तुरंत जगह की स्कैनिंग और इमेजिंग करेंगे. फिर खुद उनका एनालिसिस करके फैसला लेंगे कि कौन सी जगह उतरने के लिए अनुकूल है. सच बात ये है कि इसरो ने दूसरों की नाकामियों से नसीहत लेकर इसे अपनी ताकत बनाया है. हालांकि इसरो खुद मानता है कि सॉफ्ट लैंडिंग की प्रक्रिया में एक सेंकेड की देरी भी बहुत भारी बैठेगी.

चांद पर लैंडिंग के बाद करीब पांच घंटे बाद रोवर प्रज्ञान बाहर निकलेगा और जानकारियां जुटाना शुरू कर देगा


तब फिर कंट्रोलिंग वैज्ञानिकों के हाथ में होगी
आप सोचिए कि इन सारे अहम फैक्टर्स के साथ जब चंद्रयान-2 के लेंडर विक्रम की सॉफ्ट लेंडिंग होंगी तो वाकई कितनी खास होगी और दुनिया में हमारी तकनीक की धाक जमा देगी. लैंडिंग होते ही लेंडर विक्रम की कंट्रोलिंग तुरंत बेंगलुरु में कंट्रोल रूम में बैठे वैज्ञानिकों के हाथों में आ जाएगी. इसके कुछ घंटों बाद विक्रम से रोवर प्रज्ञान का निकलना और चांद पर घूमने लगना और भी अलौकिक होगा.

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First published: September 6, 2019, 9:26 PM IST
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