COVID-19: कोरोना को मात देने वाली मोबाइल टीम, जानिए 7 दिन तक लगातार 24 घंटे कैसे करती है काम
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COVID-19: कोरोना को मात देने वाली मोबाइल टीम, जानिए 7 दिन तक लगातार 24 घंटे कैसे करती है काम
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मोबाइल टीम (Mobile Team) के सामने मरीजों को बचाने के साथ ही खुद को बचाने की सबसे ज्यादा चुनौती होती है. यही टीम है जो सबसे पहले कोरोना मरीजों (Corona Patients) के सम्पर्क में आती है. थोड़ी सी लापरवाही होने पर ही जान पर बन सकती है.

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  • Last Updated: April 26, 2020, 9:59 PM IST
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नई दिल्ली. कोरोना (COVID-19) को मात देने के लिए डॉक्टरों (Doctors) सहित तमाम लोग जुटे हुए हैं, लेकिन एक ऐसी टीम भी है जो महीने भर में सिर्फ सात दिन काम करती है. यह वो टीम है जो कोरोना के खतरे के सीधे संपर्क में रहती है. इस टीम का नाम है मोबाइल टीम (Mobile Team). इसके काम करने का तरीका दिलचस्प है. दिन-रात में कभी भी इन्हें सैंपल लेने के लिए कॉल आती है और ये ड्यूटी करने चल देते हैं.

कोरोना मरीजों की जांच के लिए तीन टीमें बनाई जाती हैं. जिनमें ए टीम और बी टीम के अलावा तीसरी टीम होती है मोबाइल टीम. ए और बी टीम कोरोना की जांच करने वाली प्रयोगशालाओं (लैब) में शिफ्ट में काम करती हैं. जबकि मोबाइल टीम की जिम्मेदारी घूम-घूम कर कोरोना के संदिग्धों के सैंपल लाने की है.

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मोबाइल टीम की जिम्मेदारी घूम-घूम कर कोरोना के संदिग्धों के सैंपल लाने की है




एस एन मेडिकल कॉलेज, आगरा (SN medical college) की मोबाइल टीम में शामिल अरुण शर्मा बताते हैं कि लैब में काम करने वाले ट्रेंड कर्मचारियों को ही इस टीम में लिया जाता है. इसके अलावा भी इन्हें सैंपल लेने के दौरान सावधानी बरतने की ट्रेनिंग दी जाती है. एक जिले के लिए हर हफ्ते एक नई मोबाइल टीम बनाई जाती है.
10 से 12 घंटे पहननी होती है पीपीई किट
पीपीई किट (PPE) में सैंपल लेने वाली यह टीम करीब 10 से 12 घंटे तक किट पहने रहती है. इन्हें जिला अस्पताल सहित, लैब और अन्य कई जगहों पर सैंपल लेने जाना होता है. किट में ये लोग पसीने से लथपथ रहते हैं, बाहर की हवा नहीं मिल पाती. यहां तक कि पूरा शरीर भी जकड़ जाता है. ये लोग 24 में से करीब 20 घंटे रोजाना काम करते हैं.

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पीपीई किट पहन कर काम करने वाले ये लोग पसीने से लथपथ रहते हैं


मरीजों के साथ-साथ खुद को बचाने की होती है चुनौती
मोबाइल टीम के सामने मरीजों को बचाने के साथ-साथ खुद का बचाव करने की भी सबसे ज्यादा चुनौती होती है. यही टीम है जो सबसे पहले कोरोना मरीजों के संपर्क में आती है. थोड़ी सी लापरवाही होने पर जान पर बन सकती है. इतना ही नहीं इलाज के लिए जबरन ले जाये जाने के दौरान अक्सर मरीज इनके साथ दुर्व्यवहार भी करते हैं.

7 दिन तक ड्यूटी फिर 14 दिन तक क्वारंटाइन रहती है टीम
इस टीम में कम से कम तीन कर्मचारी होते हैं जो लगातार सात दिन तक काम करते हैं. इन्हें अलग एक होटल में ठहराया जाता है. जहां से ये ड्यूटी पर जाते हैं और फिर यहीं लौट आते हैं. इसके बाद इन सभी को 14 दिन के लिए क्वारंटाइन में रखा जाता है. इसकी व्यवस्था सरकार करती है. इन 14 दिनों में इन लोगों की कम से कम दो बार कोरोना की जांच की जाती है. नेगेटिव पाए जाने पर इन्हें घर भेज दिया जाता है. लेकिन पॉजिटिव आने पर इन्हें इलाज के लिए आइसोलेटेड वार्ड में भर्ती करा दिया जाता है. 21 दिन के इस पूरे शेड्यूल के दौरान इन्हें अपने परिवारवालों से मिलने नहीं दिया जाता है.

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