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मिर्ज़ा ग़ालिब की जयंती पर फिर उठी स्मारक बनाने की मांग

मिर्ज़ा ग़ालिब की जयंती पर फिर उठी स्मारक बनाने की मांग

मिर्जा गालिब (फाइल फोटो).

मिर्जा गालिब (फाइल फोटो).

आगरा में पत्रकार ब्रज खंडेलवाल ने शहर के काला महल क्षेत्र में मिर्ज़ा ग़ालिब का स्मारक बनाने की मांग उठाई. ब्रज खंडेलवाल ने कहा कि आगरा की विरासत में दर्द भी है और दवा भी है लेकिन आम जन मानस रोज़ी-रोटी के अलावा कुछ नहीं सोच पा रहा है.

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    ब्रज मंडल हेरिटेज कंजर्वेशन सोसाइटी के अध्यक्ष पंडित सुरेंद्र शर्मा ने ग़ालिब जयंती समारोह में बोलते हुए कहा कि आगरा की साहित्यिक और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने के लिए ठोस कदम उठाये जाएं. सूर, नज़ीर, ग़ालिब की ये भूमि नयी पीढ़ी को सुलह कुल और समरसता के मूल्यों को सृजित करने की प्रेरणा दे सकती है. पत्रकार ब्रज खंडेलवाल ने एक बार फिर काला महल क्षेत्र में मिर्ज़ा ग़ालिब स्मारक की मांग उठाई.

    ब्रज खंडेलवाल ने कहा कि आगरा की विरासत में दर्द भी है और दवा भी है लेकिन नेताओं की बेबफाई ने इस कदर आम जन मानस को झकझोर दिया है कि रोज़ी रोटी से अलावा वे कुछ नहीं सोच पा रहा है. न शहरवासी अपनी विरासत को लेकर फ़क़्र महसूस करते हैं न ही कोई नई सांस्कृतिक इबारत आने वाली नस्लों के नाम लिख पा रहे हैं. घटिया सड़क छाप साहित्य और अश्लील गीत, संगीत और कमर मटकाऊ नाच को नव सांस्कृतिक उत्थान का नाम दिया जा रहा है. ग़ालिब, नज़ीर की ये भूमि कभी समृद्धशाली साहित्यिक और सांस्कृतिक केंद्र हुआ करती थी लेकिन आज एक विशाल मरुभूमि में तब्दील हो चुकी है.

    श्रवण कुमार सिंह, सामाजिक कार्यकर्ता ने राजनीति पर तंज कसते हुए ग़ालिब को याद किया,  ‘मुक़द्दर के मारे कभी जीता नहीं करते.’ ये आगरा का दुर्भाग्य है की इतनी सांस्कृतिक समृद्धि होते हुए भी यहां की भाषा में न मिठास है न शिष्टाचार. हर कोई गालियां देते हुए बात करके वाणी प्रदूषण फैला रहा है.

    सामाजिक कार्यकर्ता राहुल राज ने आगरा की शान कह कर मिर्ज़ा ग़ालिब को याद किया. उन्होंने कहा कि 'दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है’ की तर्ज पर आगरावासियों को ग़ालिब जैसे फनकार की भाषा शैली और आपसी सहृदयता रखने की बात कही. उन्होंने कहा कि राजनीति ने जहर घोल रखा है, इसे प्यार और अमन से ही दूर किया जा सकता है.

    एडवोकेट दीपक राजपूत ने उनकी मशहूर शायरी, हम को उन से वफ़ा की है उम्मीद, जो नहीं जानते वफ़ा क्या है, से शहर की विरासत को संरक्षित करने का संदेश दिया. चतुर्भुज तिवारी ने आगरा की साहित्यिक संस्कृति के पन्नो में धूमिल हो चुके ग़ालिब को ढूंढने की कोशिश करते हुए उनकी मशहूर शायरी, ‘हम वहां हैं जहां से हम को भी, कुछ हमारी ख़बर नहीं आती’ से जोड़ने की कोशिश की.

    गोष्ठी में मिर्ज़ा ग़ालिब की रचनाओं का पाठ किया गया और केक काटकर बांटा गया. जुगल किशोर, चतुर्भुज तिवारी, पद्मिनी ताज महल, अमित कोहली, अजय राठौर आदि ने भी कार्यक्रम में भाग लिया. एक प्रस्ताव में मांग की गई कि भगवान टाकीज चौराहे का नाम मिर्ज़ा ग़ालिब सर्किल कर दिया जाए और विश्वविद्यालाय में मिर्ज़ा ग़ालिब शोध पीठ स्थापित की जाए.

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    Tags: Agra news, Up news in hindi

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