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आगरा के लोहा मंडी में कभी बनते थे शाही हथियार ,एशिया से लेकर यूरोप तक के आते थे ख़रीददार

आगरा

आगरा लोहा मंडी में कभी बनते थे शाही हथियार

लोहामंडी में कभी शाही हथियार बनाए जाते थे.ये इतने शानदार होते थे कि इनकी मांग एशिया ही नहीं, यूरोप तक थी.

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    आगरा का लोहा मंडी बाजार के बनने की कहानी उतनी ही दिलचस्प है जितनी कि यहां के बने हथियारों की .लोहामंडी में कभी शाही हथियार बनाए जाते थे.ये इतने शानदार होते थे कि इनकी मांग एशिया ही नहीं, यूरोप तक थी. यूरोप से कारोबारी इन्हें खरीदने के लिए आते थे . बात मुगल बादशाह अकबर के शासन काल की है. अब लोहा मंडी में समय के साथ साथ कृषि उपकरण रोजाना उपयोग होने वाले यंत्र वह किचन में प्रयोग किए जाने वाले सामान बनाए जाते हैं.
    अकबर के सेनापति मानसिंह गड़िया लोहार लेकर आए थे आगरा
    लोहा मंडी को बसाने के पीछे आगरा के मशहूर इतिहासकार राज किशोर शर्मा राजे बताते हैं कि मेवाड़ के राजा महाराणा प्रताप और अकबर की सेनाओं के बीच वर्ष 1576 में हल्दीघाटी का युद्ध हुआ था .अकबर की सेना के उस वक़्त सेनापति राजा मान सिंह थे. अकबर के आदेश पर युद्ध के बाद गढ़िया लुहारों को मान सिंह अपने साथ सैकड़ों की संख्या में गढ़िया लुहारों को आगरा ले आए.मानसिंह ने इन लोहारों को जिस जगह पर बसाया था. वह जगह लोहा मंडी कहलाई .
    उस समय लोहा मंडी बाजार में बनते थे हथियार एशिया तक थी मांग.
    गढ़िया लोहारों के बारे में कहा जाता है कि लोहे के हथियार बनाने में बेहद कुशल कारीगर थे. युद्ध के दौरान गड़िया लोहार बेहद सटीक और मजबूत हथियार बनाते थे. जिस वजह से उन हत्यारों की मांग एशिया से लेकर पूरे यूरोप तक की इन लोहारों को जो कोई भी राजा जीत लेता था अपने साथ ले जाता था और अपने सेना के लिए इन लोहारों से हथियार बनवाता था .

    अंग्रेजों के आने से बदला लोहा मंडी का व्यवसाय.
    इतिहासकार राज किशोर राजे ने अपनी किताब तवारीख -ए- आगरा में लिखते है कि लोहामंडी का जिक्र मुगल दौर में आगरा आए फ्रांसीसी यात्री बर्नियर ने भी किया है. उसने लिखा है कि यहां बने हथियारों की बात ही कुछ और थी. ये यूरोप तक पसंद किए जाते थे .लेकिन समय के साथ यहां का व्यापार बदला , भारत में अंग्रेजों के आने के बाद लोहामंडी का स्वरूप बदल गया.बंदूकें आ जाने से लोहे के हथियारों की जरूरत पहले जैसी नहीं रह गई. यहां लोहे की जाली, दरांती तवा, बाल्टी ,कृषि उपकरण ,जंजीर,तसले आदि सामान बनने लगे. घनी आबादी के बीच अब सामान उतारने में होती है बेहद दिक्कत.लोहा मंडी के व्यापारी तरुण जैन बताते हैं कि लोहामंडी में लोहे का बड़ा-बड़ा सामान अभी भी बाहर से मंगवाना पड़ता है. जिसके लिए ट्रांसपोर्टेशन की जरूरत पड़ती है. यहां का एरिया बेहद घनी आबादी में है जिस वजह से बड़े वाहन अब इस मंडी में आ नहीं पाते.जिसकी वजह से यहां लेबर भी महंगी हो गई है रात में बड़ी गाड़ियां को इस बाजार में प्रवेश की अनुमति मिलती है.

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